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Magazine - Year 1940 - Version 2

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अपनी आन्तरिक बुराइयों और नीच वृत्तियों से डर कर भागने से काम न चलेगा। अपने इन आस्तीन के साँपों से धैर्य पूर्वक रक्षा करनी पड़ेगी और बुद्धिमानी के साथ उन्हें नष्ट करना पड़ेगा।

*****

अपनी बुरी इच्छाओं को शुरू होते ही रोको। सावधान! वे बढ़ने न पावें पापवृत्तियाँ थोड़े ही समय में इतनी बढ़ जाती है कि उनका सँभालना कठिन हो जाता है।

*****

बहुत जोड़ने की कोशिश मत करो। बहुत जोड़ने का अर्थ बहुत गंवाना है। रेशम के कीड़े और शहद की मक्खी को देखो। बहुत जोड़ने के फल स्वरूप उन्हें कितना गँवाना पड़ता है।

कहानी-

कल के लिये मत छोड़ो!

(श्री पं. हरिशंकर शास्त्री दुमदुमा)

लंका में राम-रावण का घोर युद्ध समाप्त हो चला था। दोनों ओर के हजारों योद्धा समरभूमि में अपना रक्त बहा चुके थे। रावण का परिवार इस युद्ध में नष्ट हो चुका था। आज रावण ने स्वयं अन्तिम युद्ध किया था पर वह भी मारा गया। श्रीराम के बाणों ने उसका उदर विदीर्ण कर डाला था। अवसान की अन्तिम घड़ियों में रावण मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ था।

उसके कर्म आसुरी थे, फिर भी वह पंडित था। वेदों का उसे ज्ञान था। राजनीति और धर्म ग्रन्थों का उसने परायण किया था। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ विद्वान् था। विद्वान होते हुए भी लोग पाप कर्मी हो जाते हैं, रावण भी अपने ज्ञान को कर्म से संबंधित न कर सका था। इसी से वह असुर था।

रावण का अन्तिम समय निकट जानकर राम ने लक्ष्मण को बुलाया और कहा- लक्ष्मण! अपने समय का सर्वश्रेष्ठ पंडित अब मर रहा है। तुम उसके पास जाकर नीति संबंधी कुछ शिक्षा प्राप्त करो।

लक्ष्मण जी प्रसन्नता पूर्वक चल दिये और रावण से नीति की शिक्षा देने की प्रार्थना की। किन्तु उसने कुछ उत्तर नहीं दिया। तीन बार लक्ष्मण ने वही प्रार्थना की किन्तु मौन के अतिरिक्त उन्हें कुछ उत्तर न मिला। निराश लक्ष्मण वापस लौट आये।

राम ने पूछा- कहो भाई! क्या शिक्षा प्राप्त की? लक्ष्मण ने कहा उसने कुछ भी उत्तर नहीं दिया है। राम ने सारी स्थिति जान ली। उन्होंने कहा कि तुम्हें व्यवहार नीति का ज्ञान होना चाहिए। तुम शत्रु की तरह युद्ध करने नहीं किन्तु उससे शिष्य की तरह विद्या पढ़ने गये थे। क्या तुमने शिष्य का सा आचरण रावण के साथ किया था? लक्ष्मण को अपनी भूल मालूम हो गई और वे लज्जित होकर पुनः रावण के पास पहुँचे।

अब की बार उन्होंने शिष्य की भाँति आचरण किया। रावण का पूजन करके, चरणों में सिर नवाया और उसकी प्रदक्षिणा की। धर्मशास्त्र ने इस विधान को गंभीर मनोवैज्ञानिक आधार पर स्थिर किया है कि शिष्य गुरु के सम्मुख विनम्र बन कर उन्हें संतुष्ट करते हुए विद्याध्ययन करें। क्योंकि बिना इसके वे विद्या का मर्म प्राप्त नहीं कर सकते।

लक्ष्मण के उचित आचरण से रावण संतुष्ट हुआ और उन्हें अधिकारी जानकर नीति की शिक्षा देने के लिए मृत्यु शैय्या पर से उठ बैठा।

धर्म और नीति की अनेक शिक्षा देने के उपरान्त उसने अपना सबसे मूल्यवान अनुभव बताना आरम्भ किया। रावण ने कहा- लक्ष्मण! मैं अपने जीवन में चार काम करना चाहता था। मेरा विचार था कि (1) लंका के आस-पास सौ योजन तक खारी समुद्र को मीठा कर दूँ। (2) सोने की लंका को सुगन्धित भी कर दूँ (3) स्वर्ग के लिये सीढ़ियां लगवा दूँ (4) मृत्यु को पूरी तरह वश में कर लूँ!

अपने बल वैभव के सम्मुख मुझे यह चारों काम बहुत सरल और तुच्छ प्रतीत होते थे। सोचता था कि जिस दिन चाहूँ उसी दिन इन्हें पूरा कर लूँगा। जिन देवताओं के अधिकार में उपरोक्त बातें हैं उन्हें किसी दिन पकड़ लाऊंगा और चारों ही बातें पूरी हो जायेंगी। अपने अभिमान के कारण इन कार्यों को छोटा समझ कर उपेक्षा की दृष्टि से देखता रहा और समय को टालता रहा।

आज मेरा अन्तिम समय आ पहुँचा है चारों में से एक भी बात पूरी न कर सका और अब मैं इस दुनिया से जा रहा हूँ मन के अरमान मन में ही रह रहे हैं। देखता हूँ कि उपेक्षा ,समय को टालना, अपनी शक्ति के गर्व में छोटे कामों को सरल समझना और जिस काम को आज कर सकते हैं उसे कल के लिए छोड़ना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी भूल है।

“यही भूल मुझे इस मृत्यु की घड़ी में दारुण दुःख दे रही है।”

यह कहते-कहते रावण के नेत्र बन्द हो गये।

लक्ष्मण उपदेशों को ग्रहण करके रावण के मृत शरीर का अभिवादन करते हुए वापिस लौट आये।

बात युगों पुरानी हो गई। आज रावण नहीं है और न लक्ष्मण ही मौजूद है पर रावण की अन्तिम वेदना आज भी विश्व में गूँज रही है और हमारे मानस तंतुओं पर झंकृत होकर यह प्रश्न उपस्थित करती है कि “कहीं हम भी आज के कामों को कल पर तो नहीं छोड़ रहे हैं?

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