मैस्मरेजम द्वारा निद्रा
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मैस्मरेजम द्वारा निद्रा (प्रो. धीरेन्द्र नाथ चक्रवर्ती बी.एस.सी.) गत अंक में मैस्मरेजम- विधि से निद्रा लाने के विषय में कुछ बताया गया है। इस प्रकार की निद्रा लाने के लिये और भी कई उपाय हैं। जिनका कुछ परिचय इस अंक में कराया जा रहा है। जिस व्यक्ति पर प्रयोग करना है उसे आराम कुर्सी पर लिटा दो और सामने एक साधारण कुर्सी पर आप बैठ जाओ। दोनों कुर्सियों के बीच में बहुत थोड़ा अन्तर होना चाहिए। साधक के दाहिने हाथ की उंगलियों को अपने बाँए हाथ में पकड़ लो और उसकी आँखों पर अपनी निगाह जमाओ तथा दृढ़ संकल्प करो कि पात्र को निद्रा आ रही है। साधक को हिदायत करनी चाहिए कि वह बिना पलक मारे एकाग्रता पूर्वक तुम्हारी आँखों की ओर देखता रहे। उसे यह भी समझा देना चाहिए कि जब पलक भारी हो जायं, निद्रा आने लगे तो वह आंखें बन्द कर ले। कुछ देर तक तुम्हारी आँखों की ओर देखने के उपरान्त उसके लिए आंखें खोले रहना असंभव हो जायगा और निद्रित होकर आंखें बन्द कर लेगा। दूसरा तरीका पास देकर निद्रित करने का है। साधक को मुलायम बिछौने पर सीधा चित्त लिटा दो और उससे कहो कि अपना समस्त शरीर बिलकुल ढीला कर दे। जब शरीर पूरी तरह से शिथिल हो जाय तो आदेश करो कि वह नाक की बजाय मुँह से साँस ले। इसके पश्चात तुम निद्रा लाने का संकल्प करते हुए सिर की ओर से पाँवों की तरफ पास करो। पासों की विस्तृत क्रिया का वर्णन अगले अंक में किया जायगा। पास करने से दस-पन्द्रह मिनट के अन्दर साधक निद्रित हो जायगा। हिप्नोटिज्म विधि से निद्रित करने का एक और भी तरीका है। पात्र को ठीक प्रकार बिठाओ। उसकी आँखों से कुछ ऊपर की तरफ मस्तिष्क के निकट अंगूठी का नगीना, चमकदार काँच की गोली या इसी प्रकार की कोई चमकीली चीज ले जाओ ओर साधक को आदेश करो कि इस वस्तु पर अपनी दृष्टि जमावें। साथ ही उसे दृढ़ तथा मधुर शब्दों में उस पर संकल्प प्रकाश करते हुए कहो- “अब तुम्हें निद्रा आ रही है। पलक भारी हो रहे हैं। तुम्हारी आँखें बन्द हो रही हैं। तुम गहरी, गाढ़ी, शान्त, मीठी निद्रा में प्रवेश कर रहे हो।” इस क्रिया से भी कुछ ही देर में पात्र सो जायेगा। एक और चौथा तरीका यह है कि पात्र को शिथिल करके कुर्सी पर बिठा दो तुम उसके दाहिनी ओर बिलकुल पास खड़े हो जाओ। अपना बाँया हाथ उसकी बगल में से पीछे होता हुआ गर्दन से कुछ नीचे रीढ़ की हड्डी पर लगाओ और दाहिना हाथ ललाट के ऊपर रखो। अपने मन में भावना करो कि दाहिने हाथ द्वारा शक्ति संचार करके पात्र को में निद्रित कर रहा हूँ। शक्ति संचार की भावना दृढ़ होते ही दाहिने हाथ में कुछ कम्पन सा शुरू हो जायगा। पात्र के मस्तिष्क को छूता हुआ यह कम्पन कुछ देर जारी रहने दो। साधारण पात्र इसी क्रिया से निद्रित हो जाते हैं। कदाचित कोई पात्र स्थूल चेता और उस पर सफलता न मिले तो मधुर कंठ से ‘ॐ’ की ध्वनि करनी चाहिए। ध्वनि में ‘ओम्’ शब्द का उच्चारण नहीं किया जाता वरन् ‘ओं’ शब्द को भौंरा के शब्द से मिलाकर एक प्रकार का गुञ्जन उत्पन्न करते हैं। काँसे के पात्र में चोट लग जाने के बाद वह कुछ देर तक झनझनाता रहता है। उसी प्रकार ‘ओं’ शब्द से तुम्हारा कँठ झनझनाता रहना चाहिए। यह ध्वनि और कम्पन निश्चय ही निद्रा लाने में समर्थ होते हैं। पात्र गहरी निद्रा में गया या नहीं इसके लिए निम्न प्रकार से परीक्षा करनी चाहिए। उसका हाथ जहाँ पड़ा हुआ है वहाँ से धीरे से कुछ ऊंचा उठाओ और छोड़ दो। यदि वह निद्रित है तो हाथ निर्जीव वस्तु की तरह झट नीचे गिर पड़ेगा किन्तु यदि साधारण निद्रा में है तो हाथ को भारीपन के साथ ही ऊपर जाने देगा और पटकने पर धीरे और सावधानी के साथ नीचे गिरने देगा। गहरी निद्रा की दूसरी परीक्षा यह है कि पात्र की पुतलियाँ ऊपर चढ़ जाती हैं। आँख के पलक उठाकर देखे जायं तो पुतलियाँ सामने न होकर ऊपर चढ़ी हुई मिलेंगी और बीच का स्थिर न होकर घूमता सा प्रतीत होगा। तीसरी परीक्षा साँस की है। यदि पात्र निद्रित हो तो उसकी साँस गहरी और भारी होगी तथा तेज चलती होगी। हृदय की धड़कन तथा नाड़ी की चाल स्वभावतः बढ़ गई होगी। शरीर की उष्णता के बारे में भी यही बात है। पहले की अपेक्षा पात्र का शरीर गरम गरम होगा। कुछ लोग सुइयाँ चुभो कर या पात्र पर तीव्र आघात करते परीक्षा करते हैं। इससे दर्शकों की प्रतीति बढ़ती है पर पात्र को हानि पहुँचती है। हम इस प्रकार की परीक्षा करने को घोर विरोध करते हैं और अपने अनुयायियों को ऐसा न करने की सलाह देते हैं। गहरी निद्रा लाने का प्रयोग गहरे मानसिक शब्दों संकल्पों का पात्र में प्रवेश किया जाता है। जिसके विचारों में परिवर्तन करना है, मानसिक विकास में कोई सहायता पहुँचाना है, या कोई पुराना कठिन रोग है उन्हें ही गहरी नींद में ले जाना चाहिये। सामयिक या छोटे रोगों के उपचार में या बालकों पर प्रयोग करते समय हल्की तन्द्रा करना ही काफी होगा। कोई वस्तु जितना उत्तम होती है अविचार पूर्वक प्रयोग करने से वह उतनी ही हानिकारक हो जाती हैं। मैस्मरेजम विद्या बहुत सूक्ष्म होने के कारण प्राणियों का बहुत हित करने का सामर्थ्य रखती है किन्तु उसका कोई अज्ञानता पूर्वक अनुचित रीति से प्रयोग करे तो अपने लिए यों दूसरों के लिए हानिकारक भी हो सकती है। आत्म विद्युत के दूसरे के शरीर में प्रवेश करके उसका हितकर प्रभाव डालना एक कुशल विद्युत-शिल्पी का कार्य है। यह एक कला और दर्शन है जिसका प्रयोग सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। साधारणतः शरीर में एक ही प्राण के धारण करने योग्य क्षमता होती है। उसमें मूल प्राण को परास्त करके दूसरा प्राण प्रवेश करे साथ ही उस शरीर के सुकोमल परमाणुओं का अनुचित आघात भी न पहुँचे, इसकी साधना उस जेबकतरों के अभ्यास से मिलती जुलती है जो बिना किसी प्रकार का धक्का लगाये चुपके से दूसरों की जेब का माल निकाल लेते हैं। पूरा अभ्यास किये बिना किसी अभ्यासी को प्रयोग करने के लिये उतावला नहीं होना चाहिये।

