कुसुम कली (कविता)
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(श्री लक्ष्मी) जीवन की मधुमय बेला में,
मैं शाँति-पाठ पढ़ने आई। बलिहार हो गये दीवाने,
लख कर मेरी कोमलताई॥ साथी ने अपने अंक बीच,
मेरी शुचि सुषुमा विखराई। मैं हँसी देख निज विभव मंजु,
विरदों ने गुण-गाथा गाई॥ दो दिन की चमक-दमक थी वह,
उस क्षण न समझ मैंने पाई। अन्तिम परिणाम निहार स्वयं,
विवरण पर अपने पछताई॥ मैं श्रेयहीन हो गई अन्त में,
हो अधीर, अतिशय रोई। सुख समय रही सबको होकर,
दुख में न बना अपना कोई॥
मैं शाँति-पाठ पढ़ने आई। बलिहार हो गये दीवाने,
लख कर मेरी कोमलताई॥ साथी ने अपने अंक बीच,
मेरी शुचि सुषुमा विखराई। मैं हँसी देख निज विभव मंजु,
विरदों ने गुण-गाथा गाई॥ दो दिन की चमक-दमक थी वह,
उस क्षण न समझ मैंने पाई। अन्तिम परिणाम निहार स्वयं,
विवरण पर अपने पछताई॥ मैं श्रेयहीन हो गई अन्त में,
हो अधीर, अतिशय रोई। सुख समय रही सबको होकर,
दुख में न बना अपना कोई॥

