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Magazine - Year 1941 - Version 2

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थूकने योग्य स्थान

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थूकने योग्य स्थान!

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(श्री मंगलचंद भंडारी ‘मंगल, देवास सीनियर)

वह भवन उस नगरी में अद्वितीय बना था, यों तो कितनी ही विशाल इमारतों से वह नगर सुशोभित था, पर इतना सुन्दर और भव्य दूसरा न था, देश विदेश से बहुमूल्य पत्थर मंगा कर उसमें लगाये गये थे, सैकड़ों कुशल कारीगरों ने वर्षों तक अपनी बुद्धि का सर्वोत्तम प्रयोग इसके बनाने में किया था, तब कहीं वह भवन बन कर तैयार हुआ था। जिस धनी पुरुष ने उसे बनवाया था, उसने उसकी सजावट में भी रुपया पानी की तरह खर्च किया। कीमती गलीचे, बहुमूल्य काँच, मखमल मढ़ी हुई कुर्सियाँ और रत्नजटित बन्दनवारों से सजे हुए कमरे आँखों में चकाचौंध करते थे। प्रशंसा सुन कर दूर दूर से लोग उस विशाल भवन को देखने आये। सेठ प्रसन्नता पूर्वक सब को दिखाता और लोगों के मुँह से अपनी प्रशंसा सुन कर बहुत प्रसन्न होता।

एक दिन दैवयोग से एक साधु उधर आ निकले, भवन की इतनी प्रशंसा सुनी तो वह भी उसे देखने के लिये चल दिये, वह साधु बड़े पहुँचे हुए थे, उनके ज्ञान−वैराग्य की बहुत ख्याति थी, लोग उन्हें देवता तुल्य पूजते।

सेठ ने सुना कि अमुक साधु मेरा भवन देखने आ रहे हैं तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई, दरवाजे पर अगवानी करने खुद पहुँचा और आदर से उन्हें साथ लिवा लाया, हँस हँस कर उसने भवन के सारे विभाग कार्य गृह, आमोद गृह, शयनागार, अट्टालिकाएँ और उपवन दिखाये, हर स्थान पर लगी हुई विशेषता प्राप्त वस्तुओं का भी परिचय कराया और बताया कि कितनी चातुरी, धन व्यय एवं कला का समन्वय करके यह विशाल भवन निर्माण कराया है।

साधु सेठ के मुँह से विभिन्न वस्तुओं का परिचय प्राप्त करके प्रसन्न होते जाते थे। सभी जगह उन्होंने बड़ी ही सजावट और सफाई देखी। उन्हें थूकने की जरूरत पड़ी परन्तु कोई उपयुक्त स्थान न देखकर उन्होंने उस इच्छा को दबाया। सेठ जब भवन के सम्पूर्ण विभाग दिखा चुका तो साधु ने पूछा—”श्रीमान्! इसमें उपासना गृह कहाँ है? आप जहाँ बैठ कर आत्म चिन्तन करते हैं, वह स्थान मेरे देखने में नहीं आया, कृपया उस स्थान को भी दिखाइये, उसे देखने के लिये मैं विशेष उत्सुक हूं।”

सेठ को कभी उपासना गृह की आवश्यकता प्रतीत न हुई थी, धन वैभव से चौंधिया जाने वाले अन्य अनेक नर-कीटों की तरह वे भी मनुष्य के असली अस्तित्व से अपरिचित थे। जब धन है तो ईश्वर से क्या प्रयोजन? जब सुख है तो आत्म चिन्तन से क्या लाभ? जब स्वस्थ हैं तो भविष्य की क्या चिन्ता! शक्ति के अहंकार में मनुष्य अन्धा हो जाता है। धन के मद में सेठजी की भी वैसी ही दशा थी। उपासना की भी कोई जरूरत है? इस प्रश्न पर कुछ सोचने की उन्हें कभी फुरसत नहीं मिली थी। साधु के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने लापरवाही से कहा-’वह तो मैंने नहीं बनवाया है।’

साधु सेठ के अज्ञान को शुरू से ही समझ रहे थे। मकान देखने और प्रश्न पूछने का उनका कुछ विशेष उद्देश्य था। इमारतें उन्होंने बहुत देखी थीं वे आज उसका तमाशा देखने नहीं आये थे, अपनी सहज उदारता का प्रसाद उस अज्ञ प्राणी को देने आये थे। उन्होंने बस यही ठीक अवसर समझा और बहुत देर से थूकने के लिये जो स्थान ढूंढ़ रहे थे उसे देख लिया। साधु गला खोल कर खासे और एक बड़ा सा डेला कफ सेठ के मुँह पर थूक दिया।

घृणित ! विभक्त ! बेशर्मी ! जंगलीपन ! अपराध ! चारों ओर से यही शब्द सुनाई पड़ने लगे। सेठ के नौकरों ने साधु को पकड़ लिया और उसे मारने को उद्यत हो गये। सेवक लोग दौड़े, तुरन्त ही जल लाया गया, उन्होंने उस थूक को धोया और स्नान कराया। स्नान करने के उपरान्त क्रोध कुछ शान्त हो चला था, साधु से बदला लेने के जो भाव उसके हृदय में जल रहे थे वे अब कुछ ठण्डे हो चुके थे। उसने सोचा इस हरकत की बाबत अपराध से एक बार पूछ क्यों न लिया जाए?

सेठ ने साधु को बुलाकर भवें तरेरते हुए पूछा-क्यों मेरे मुँह पर थूका था? साधु और अधिक नम्र बन गये, उन्होंने कहा—भगवन् ! मुझे बहुत देर से थूकने की इच्छा सता रही थी, आप मुझे सब विभाग दिखा रहे थे पर मैं थूकने का स्थान ढूँढ़ रहा था। जब आपने बताया कि इतने बहुमूल्य भवन का निर्माण करते हुए भी इसमें उपासना गृह नहीं बनवाया है तो मुझे लगा कि आपका मुँह ही थूक देने योग्य स्थान है। अस्तु मैंने थूक दिया।

सेठ के पूर्व संस्कार एक ठोकर खाकर जागृत हो उठे। सचमुच, जो मनुष्य बाहरी ठाट बाट में इतनी दिलचस्पी लाता है किन्तु आत्मचिन्तन से उदासीन है वह बहुत ही घृणित कर्म में प्रवृत्त है और उसका मुँह थूक देने योग्य ही स्थान है। धनपति अपनी गरीबी को समझ गया। उसने साधु के चरण पकड़ लिये और अपनी भूल सुधारने की प्रतिज्ञा कर ली।

शान्ति तो तुम्हारे अन्दर है। कामना रूपी डाकिनी का आवेश उतरा कि शान्ति के दर्शन हुए। वैराग्य के महामन्त्र से कामना को भगा दो, फिर देखो सर्वत्र शान्ति की शान्त मूर्ति।

*****

किसी भी अवस्था में मन को व्यक्ति मत होने दो, याद रक्खो परमात्मा के यहाँ कभी भूल नहीं होती और न उसका कोई विधान दया से रहित ही होता है।

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