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Magazine - Year 1941 - Version 2

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आत्म शक्ति का विकास

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(ले.—श्री आचार्य भद्रसेनजी, अजमेर)

गत लेख में बतलाया जा चुका है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना है, क्योंकि आत्मा महान् तथा दिव्य शक्तियों का भण्डार है। सुख और शान्ति का आगार है। हम अपने आत्म स्वरूप तथा उसके सच्चे आनन्द को भूल कर ही संसार के क्षणिक सुखों में आसक्त होकर उनकी प्राप्ति के लिये साँसारिक विषयों में भटक रहे हैं। यदि हम अपने महान् आत्मा की थोड़ी सी भी झाँकी प्राप्त कर लें, यदि इसके शताँश आनन्द का भी आस्वादन कर लें, तो यह ध्रुव सत्य है कि फिर हमें साँसारिक विषयों का क्षणिक सुख बिलकुल नीरस प्रतीत होने लगेगा, जिसने मधु के स्वाद को नहीं चखा, वह गुड़ की मिठास में ही आनन्द मानता है और उसकी प्राप्ति के लिये उचित−अनुचित तरीके से रात-दिन प्रयत्न करता है। किन्तु जो मनुष्य एक बार मधु के माधुर्य का आस्वादन कर लेता है वह फिर गुड़ में आसक्त नहीं होता। उसे गुड़ का माधुर्य मधु के माधुर्य के सामने बिलकुल तुच्छ प्रतीत होने लगता है। अतः सच्चे सुख और शान्ति के अभिलाषी का परम कर्तव्य है कि वह अपने आत्म-स्वरूप को साक्षात करे। अर्थात् अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करे। आत्म शक्तियों के विकास के यों तो हमारे ऋषि, मुनि, योगी, महात्माओं ने बहुत से उपाय बतलाये हैं। किन्तु मेरे विचार में आत्मिक शक्तियों के विकास के मुख्यतया दो ही साधन हैं। वे हैं...........

“आत्म चिन्तन” तथा “प्रभुभक्ति”

दूसरे शब्दों में जिसे ‘योग“ और “भक्ति” के नाम से भी कहा जा सकता है। तथा जिसे योगी लोग “राज योग“ और ‘भक्ति योग“ के नाम भी पुकारते हैं। योग दर्शन के “तज्जपस्तदर्थं भावेनम्” इस सूत्र का भाष्य करते हुए महर्षि व्यास लिखते हैं—”प्रभु प्राप्ति और आत्म साक्षात्कार अभिलाषी का कर्तव्य है कि वह स्वाध्याय अर्थात् प्रभु भक्ति से योग को प्राप्त करे और योग से प्रभु भक्ति में स्थित हो। क्योंकि “प्रभु भक्ति” तथा योग अर्थात् आत्म चिन्तन इन दोनों की सहायता से ही भक्त के हृदय में अपने आत्मा तथा परमात्मा का प्रकाश होता है। तात्पर्य यह है कि आत्म साक्षात्कार के दूसरे शब्दों में अपनी आत्मिक शक्तियों के विकास के दो ही मुख्य साधन हैं “आत्म चिन्तन” तथा “प्रभु भक्ति”। इस लेख में हम-”आत्म चिन्तन “ पर प्रकाश डालेंगे। आत्म चिन्तन का अर्थ है अपने आत्म स्वरूप का चिन्तन करना। अर्थात् मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? हम भौतिक जगत से मेरा क्या सम्बन्ध है? मेरे अन्दर कौन-2 सी दिव्य शक्तियाँ निहित हैं। इन बातों का सर्वदा चिन्तन करते रहना ही “आत्म-चिन्तन” कहलाता है। इस प्रकार चिन्तन करते रहने से आत्मा की सोई हुई दिव्य तथा महान शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं। जितना-2 हम अपने आत्म-स्वरूप का मनन करते हैं, उतनी-2 हमारी आत्मिक शक्तियाँ विकसित होती जाती हैं और एक दिन हम महान तथा दिव्य शक्तियों के स्वामी बन जाते हैं। संसार में आज तक जितने भी ऋषि, मुनि, योगी, यति आदि महापुरुष हुए, हैं वे सब अपनी महान शक्तियों के विकास से ही महान तथा उच्च बने हैं। इसलिये यदि हम उच्च तथा महान बनना चाहते हैं, तो हमें भी आत्म चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिये। अपने आत्मा को प्रेम से समझा कर उसे निज स्वरूप का बोध कराना चाहिये। यों तो आत्मा को जागृत करने के तपश्चर्या आदि अनेक साधन हैं। किन्तु जितना शीघ्र आत्मा को प्रेम से समझाने से अर्थात् आत्मा की अद्भुत शक्तियों का “आत्मचिन्तन” द्वारा उसे बोध कराने से हमारा आत्मा जागृत हो सकता है, उतना कठोरता के साधनों से नहीं। जगाता रास्ते पर सोए हुए मनुष्य को सिपाही भी है और घर में सोए हुए बालक को माता भी। किन्तु दोनों के जगाने में महान् अन्तर है। सिपाही जब रास्ते पर सोए हुए मनुष्य को “हंटर” मार कर जगाता है, तो वह मनुष्य जाग तो जाता है, किन्तु उसके शरीर में आलस्य और तन्द्रा ज्यों की त्यों बनी रहती है। उसमें न स्फूर्ति होती है, न उत्साह। इतना ही नहीं प्रत्युत सिपाही के चले जाने पर वह मौका पाकर फिर सो जाता है। किन्तु जब माता बच्चे को प्रेम से लोरियों देकर जगाती है, तो बच्चा आलस्य को छोड़ तत्काल उठ बैठता है। उस समय उसके शरीर में स्फूर्ति और उत्साह होता है और वह एक बार जाग जाने पर फिर नहीं सोता। इसी प्रकार जब हम अपने आत्मा को तपश्चर्या आदि कठोर साधनों से जगाया करते हैं, तो वह जाग तो अवश्य जाता है, किन्तु उसके अन्दर वह स्फूर्ति, आनन्द और उत्साह नहीं होता, जैसा कि प्रेम से आत्मचिन्तन द्वारा जगाने से होता है। इतना ही नहीं प्रत्युत सिपाही के हन्टर से जागे हुए मनुष्य की तरह तपश्चर्या आदि कठोर साधनों के अभाव में आत्मा के पुनः खो जाने की भी आशंका बनी रहती है। इसलिए हमें अपने आत्म को “आत्म चिन्तन “ द्वारा अर्थात् माता की तरह प्रेम की लोरियों देकर ही जगाना चाहिये, कठोरता के साधनों से नहीं। इतना ही नहीं प्रत्युत यदि हमारा आत्मा कभी किसी बुराई में भी फँसने लगे, तब भी उसे प्रेम से ही समझाना चाहिये। कि . . “ऐ मेरे प्रिय आत्मन्! ऐसा कुत्सित कर्म तेरे लिये योग्य नहीं। तू महान है, तू ज्ञानवान् है और दिव्य शक्तियों का निधान है। फिर तू ऐसा कुत्सित कर्म क्यों करता है”

आत्मा को इस प्रकार समझाने से जहाँ मनुष्य की आत्मिक शक्तियों का विकास होता है, वहाँ वह बार-2 समझाते रहने से बुराइयों और पापों से बच जाता है। प्राचीन समय में हमारी विदुषी माताएं अपने बच्चों को जहाँ अपनी उपदेश भरी प्रेममयी लोरियों से भौतिक निद्रा से बेदार करती थीं। वह उनको सोई हुई आत्मा को भी जागृत बना दिया करती थीं। वे बच्चे बाल्यकाल से ही अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करते हुए आगे चल ऋषि, मुनि, महात्मा और योगी बनते थे। महारानी मन्दालसा जब अपने बच्चों को जगाती तथा खिलाती थी, तो वह उनको इस प्रकार से लोरियों दिया करती थी। ----

शुद्धोऽसि बुद्धोसि निरज्जशोप्ति संसार माया परिवर्जितोऽसि। संसार स्वप्न त्यग मोह निद्रा मन्दालसा पुत्र मुवाच वाच्यम्॥

“हे बच्चे ! तू शुद्ध, पवित्र और निर्मल है। तू ज्ञान का भण्डार और अज्ञान से सर्वथा दूर है। तू संसार को मोहनी माया अर्थात् विषय भोगों से सर्वथा परे है। तुझे संसार का कोई भी विषय अपनी ओर नहीं खींच सकता। इसलिये हे प्रिय पुत्र! तू इस क्षण भंगुर संसार के क्षणिक विषयों की लालसा को छोड़कर, संसार की मोह रूपी निद्रा से जाग और अपने आत्मस्वरूप का साक्षात् कर।”

पाठक देखें कि हमारी प्राचीन विदुषी माताओं की लोरियों में आत्म जागृति के कितने उच्च भाव भरे होते थे। यही कारण है कि भंदालसा स्वयं महारानी होती हुई भी उसने अपने दोनों राजकुमारों को अपनी उपदेश भरी प्रेममयी लोरियों देकर पूर्ण योगी और महात्मा बना दिया था। दूसरी ओर आज कल की हमारी अशिक्षित माताएं हैं कि जो अपने बच्चों के होने पर शादी विवाह का प्रलोभन, या भूत प्रेम और चूहे बिल्ली का डर दिखाना ही अपना कर्तव्य समझती हैं। यही उनकी लोरियों का सार है। यही कारण है कि आज आर्य संतान बाल्यकाल से ही विषय लम्पट, भीरु और कायर बन रही है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि जिन विचारों के वातावरण में रहता है, वह वैसा ही बन जाता है। जैसे विचारों का वह अहर्निश चिन्तन करता है, वही विचार उसके जीवन के अंग बन जाते हैं। यदि मनुष्य के विचार दीन, हीन तथा मलीन हैं, तो वह अवश्य ही दासता प्रिय, दीन अवस्था वाला तथा मलीन विचारों वाला बनेगा और यदि उसके विचार उच्च तथा पवित्र हैं, तो वह अवश्य ही उच्च, पवित्र तथा महान बनेगा। संसार की कोई भी शक्ति उसे उच्च तथा महान बनने से नहीं रोक सकती। इस लिये हमें अपने विचारों को सदा उच्च तथा महान बनाना चाहिए। अपने आत्मा की दिव्य शक्तियों का चिन्तन करना चाहिये। दूसरे शब्दों में अपनी आत्मा को मीठी तथा उदात्त लोरियों देकर उसे ऊँचा उठाना तथा जागृत करना चाहिये।

जिज्ञासु पाठक पूछेंगे कि प्राचीन काल में तो माताएं बच्चों को लोरियों देकर उनकी आत्माओं को जागृत किया करती थीं, तब कहीं जाकर वे बच्चे बड़ी आयु में आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों को विकसित किया करते थे किन्तु आज तो परिस्थिति इसके सर्वथा विपरीत है। जैसे कि ऊपर वर्णन कर आये हैं। अतः इस समय हम किस के पास जाकर अपनी आत्मा को जागृत करने वाली मधुर लोरियों को सुनें? यह बात सत्य है आजकल की हमारी भौतिक माताएं हमें वह अमृत-रस भरी पवित्र लोरियों नहीं सुनाती। किन्तु हमारी सभी आध्यात्मिक माता जगत्-जननी हमें अहर्निश अपने वात्सल्य प्रेम से हमारे हित के लिये लोरियों दे रही है। हमारी उस दिव्य माता ने अपने अमृत-मय पुत्रों को अपने पवित्र वेद ज्ञान में ऐसी प्रेम-मई दिव्य रस भरी लोरियों दी हैं कि जिनका यदि हम प्रतिदिन प्रेम से ज्ञान करे और उन्हें अपने जीवन चरितार्थ करें तो हम अवश्य अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास कर उच्च तथा महान बन सकते हैं। प्रभु की उन दिव्य लोरियों को हम फिर कभी पाठकों को सुनाएंगे, प्रेमी पाठक इसके लिये ज्योति के आगामी किसी अंक की प्रतीक्षा करें।

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