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Magazine - Year 1941 - Version 2

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परलोकगत आत्माएँ कैसे सहायता करती हैं?

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(लेखक—परलोकतत्व के आचार्य श्री. बी. डी. ऋषि, बम्बई)

परलोक विद्या का प्रचार यद्यपि दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, किन्तु फिर भी लोग अभी तक इसका उपहास करते हैं और उसकी सत्यता में सन्देह करते हैं। जिन लोगों ने परलोकगत आत्माओं से बातचीत की है, वे जब अपने अनुभव प्रकट करते हैं, तो उचित है कि अविश्वासी लोगों को उन पर विश्वास करना चाहिये। यूरोप और अमेरिका में आज परलोक विद्या प्रसारक कितनी ही संस्थाएँ हैं, किन्तु भारत जो संसार का आध्यात्मिक गुरु था, वहाँ परलोक विद्या का उपहास किया जाये, यह कितना आश्चर्य कारक है, इसे पाठक स्वयं अनुभव करें। हम समय-समय पर अपने अनुभव बताते रहे हैं। साथ ही परलोक विद्या की आवश्यकता पर भी जोर देते रहे हैं। आज हम बम्बई के एक पारसी सज्जन श्री पेस्टनजी डी0 महालक्ष्मी वाला की पुस्तक में से उनके कुछ अनुभव बताते हैं। यह पुस्तक अंगरेजी में लिखी गई है। पुस्तक का नाम है “्नस्रक्द्गठ्ठह्लह्वह्द्गह्य द्बठ्ठ स्श्चद्बह्द्बह्लह्वड्डद्यद्बह्यद्व” श्री महालक्ष्मी वाला लिखते हैं कि सन् 1921 में मैं अमेरिका गया था, वहाँ मुझे एक आत्मा का साक्षात्कार हुआ। मैं सेनफ्रांसिस्को में अपने एक पारसी मित्र से मिलने गया था, यह मित्र महाशय अपनी विपरीत स्थिति के कारण शान्त और एकान्त जीवन व्यतीत करते थे। हम दोनों एक मीडियम (माध्यम) के घर गये। माध्यम जब बैठ गई, तो उसने दो तीन चुटकी सूँघनी सूँघी और तुरन्त बेहोश हो गई इसके थोड़ी देर बाद ही मैंने देखा कि उनके पास एक लम्बा अधेड़ उम्र का अमेरिकन खड़ा है। उसने मेरे पारसी मित्र को सम्बोधन कर कहा—”प्रणाम; अब आप की आँखें कैसी हैं?” मालूम हुआ कि यह आत्मा एक डॉक्टर की थी, जो अपने जीवन काल में आँख के डॉक्टर थे और मेरे मित्र की आँखों की चिकित्सा करते थे।

मेरे मित्र ने उन्हें उत्तर दिया—”पहले से अच्छी हैं”।

आत्मा ने फिर कहा-”मैंने जो नुस्खा दिया है, उसे नियमित रूप से व्यवहार करते रहें। मैं अब भी आपकी चिकित्सा में सहायता किया करता हूँ”।

इसके बाद आत्मा ने मेरी ओर संकेत कर पूछा—”आपके सामने कौन बैठे हैं?

मेरे मित्र ने उत्तर दिया-’यह मेरे मित्र हैं, बम्बई से आये हैं।”

“मुझे आप से मिलकर प्रसन्नता हुई -कहिये कैसे हैं?” यह कह कर वह आत्मा विलीन हो गई। इसके थोड़ी देर बाद ही एक पारसी लड़की की आत्मा आई और वह एक स्टूल पर बैठ गई। 50-60 वर्ष पहले पारसी बच्चे जैसे कपड़े पहना करते थे, वैसे कपड़े वह आत्मा पहने हुई थी। यह लड़की मेरे मित्र की बहन थी। उसने मेरे मित्र को सम्बोधन कर कहा-”भाई, अब आपकी तबियत कैसी है। पिता जी आपके लिये बड़े चिन्तित रहा करते हैं।” मेरे मित्र के पिता ने अपने वसीयतनामे में मित्र को कुछ भी नहीं दिया था। मेरे मित्र ने उत्तर दिया-’पिता जी से कहना कि मेरी चिन्ता न करें।”

लड़की ने फिर कहा—”वे अब भी चिन्ता किया करते हैं।” इसके बाद लड़की ने मेरी ओर संकेत कर पूछा—”यह नये आदमी कौन हैं?”

मेरे मित्र ने उत्तर दिया-”मेरे एक मित्र हैं—”बम्बई से आये हैं।” यह सुनकर उस लड़की ने मुझे पारसी ढंग से नमस्कार किया।

पाठक इस घटना से इतना अवश्य समझ लेंगे, कि मरने के बाद भी आत्माएँ अपने परिजन और इष्ट मित्र, पड़ौसी और ग्राहकों से सम्बन्ध रखती हैं। उनके दुःख-सुख में उनकी सहानुभूति रहती है, यह बात उक्त डॉक्टर की आत्मा के आगमन से सिद्ध हो जाती है।

आगे यही महाशय लिखते हैं कि सन् 1925 के सितम्बर मास की 3 सरी तारीख को मैं एक प्रयोग में बैठा था। एक सादा कागज पर हस्ताक्षर और तारीख डाल कर उसे ट्रम्पेट के पास रख दिया गया। थोड़ी देर बाद ट्रम्पेट से आवाज़ आई-”महिला और सज्जनों, प्रणाम। मैं इधर से जा रहा था, आप लोगों को यहाँ देख कर मैं यहाँ आ गया हूँ। मेरा नाम है डॉक्टर पील्वेस।” यह डॉक्टर सन् 1922 में परलोक सिधारे थे। आप परलोक विद्या के बड़े हिमायती थे। इन्होंने अपने जीवन काल में परलोक विद्या सम्बन्धी अनेक पुस्तकें लिखी थीं। मेरी उनसे अमेरिका में लास एंगिल नगर में मरने के एक वर्ष पहले भेंट हुई थी। जब उन्होंने अपना नाम डॉक्टर ‘पील्वेस’ बताया, तो मैंने उन्हें याद दिलाया, कि आपको मेरे मिलने की याद है? उन्होंने उत्तर में कहा—हाँ ! हाँ ! मुझे याद आता है। आज आप से फिर मिल कर मुझे बड़ा आनन्द हुआ। अच्छा मैं आपके पास एक चिन्ह छोड़ जाऊंगी, जिससे आप जान लेंगे कि मैं डॉक्टर पील्वेस ही बोल रहा हूँ।” इसके बाद प्रयोग समाप्त हो गया। ट्रम्पेट के पास कागज रखा था, उसे देखा गया, तो उस पर लिखा गया था—

जे. एम. पील्वेस एम. डी.

इसके बाद यह हस्ताक्षर उनकी लिखी किताब के चित्र पर, जिस पर उनके हस्ताक्षर थे, मिलाया गया। यह हस्ताक्षर बिलकुल उससे मिलते थे, यह महालक्ष्मी वाला की पुस्तक से कुछ अवतरण दिये गये हैं। पाठकों ने सीरो का नाम सुना होगा। यह महाशय सामुद्रिक शास्त्र, हस्तरेखा शास्त्र के बड़े विद्वान थे। आपने हस्तरेखा के सम्बन्ध में अनेक पुस्तकें लिखी हैं। साथ ही आप ज्योतिष भी जानते थे। आपकी अनेक भविष्यवाणियाँ सत्य सिद्ध हुईं। आपने एक पुस्तक “ञ्जह्ह्वद्ग त्रद्धशह्यह्ल ह्यह्लशह्द्बद्गह्य” नामक लिखी है। उसमें उन्होंने लिखा है कि परलोक गत आत्माओं से बातचीत करना केवल संभव हो नहीं है, किन्तु ऐसी बातचीत का व्यवहारिक रूप से भी बड़ा मूल्य है। सन् 1896 की बरत है कि मिस्टर सीरो पश्चिम अमेरिका में यात्रा कर रहे थे, कि उन्हें तार मिला कि ‘आपके पिता मरणासन्न हो रहे हैं। शीघ्र आइये, पिता को देखे हुए मिस्टर सीरो को 15 वर्ष हो गये थे। इसलिये तार पाते ही वह इंग्लैण्ड के लिये रवाना हो गये। उनके पिता मृत्यु शैय्या पर पड़े हुए अपने पुत्र के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे, पुत्र को देखकर उन्होंने कहा—”बेटा मैं तुम्हीं से बात चीत करने के लिये ही अब तक जीवित हूँ। मुझे तुम से परिवार सम्बन्धी कुछ आवश्यक बातें कहनी हैं। यह बातें मुझे बहुत पहले तुम्हें बता देनी चाहिये थीं। देखो कुछ कागजात लन्दन के एक सालिसीटर के पास हैं, उन्हें तुम ले लो। इस समय मुझे सालिसीटर का नाम और पता याद नहीं आता। जरा मेरा सिर ऊँचा करो-शायद याद आ जाये। बेटा, क्षमा करना, मैंने इस काम के लिये बड़ी ढील की। यह कह कर सीरो के पिता का स्वर्ग-वास हो गया। थोड़े दिन में यह सब बात विस्मृत हो गई। तीन वर्ष बाद इंग्लैंड के एक स्टेशन से मिस्टर सीरो कहीं जा रहे थे, किन्तु गाड़ी तीन घण्टे लेट थी। उन्होंने समाचार पत्र में पढ़ा कि आज सन्ध्या को इसी नगर में परलोक विद्या का प्रयोग होगा, सीरो तुरन्त उस प्रयोग में सम्मिलित होने चले गये। इसके बाद प्रयोग में सीरो के पिता की आत्मा माध्यम के द्वारा बोलने लगी। सीरो ने कहा कि पिताजी मुझे कैसे विश्वास हो, कि आप मेरे पिता हैं। पिता ने कहा—बेटा, आज तुम्हें देख कर मुझे हर्ष हो रहा है। मरने के समय तुम जैसे क्षीण दिखते थे, उसमें अब अच्छे दिखाई पड़ते हो। अपनी माता से कहना कि, आज पिताजी से बात की। तुम्हारी बहन परलोक में अच्छी तरह है। अच्छा अब तुमसे काम की बातें करता हूँ। तुम्हें याद होगा कि जब मैं मृत्यु शैय्या पर पड़ा था तो मेरा गला बन्द हो गया और मैं तुम्हें सालिसीटर का पता नहीं बता सका। तब से मैं यही सोच रहा था, कि तुम्हें उसका पता कैसे बताऊँ। प्रभु का धन्यवाद है, कि उसने आज यह अवसर दिया। अच्छा स्टेण्ड नगर की एक तंग गली में जाना, गली का नाम याद नहीं आता। वहाँ डेबिड एण्ड सन्स सालिसीटर रहते हैं, उन्हीं के पास अपने परिवार के कागजात पत्र हैं। उन्हें तुम ले लो और मुझे इस उपेक्षा के लिये क्षमा करना।” यह कह कर वह आत्मा चली गई। बाद में वह सब कागजात पत्र मिस्टर सीरो को मिल गये। यह परलोक विद्या के अनुभव ऐसे लोगों के हैं जो परलोक विद्या के व्यवसायी नहीं हैं, किन्तु साधारण लोग हैं। यह जब अपना अनुभव इस प्रकार प्रकट करते हैं तब अन्य लोगों को भी उनके अनुभव से लाभ उठाना चाहिये।

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