तुम पापी नहीं पुण्यात्मा हो
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हम पापी हैं, पापी हैं, ऐसा कहने मात्र से कोई पुण्यात्मा नहीं बन जाता। पुण्यात्मा होने के लिए तो अन्तःकरण को शुद्ध बनाने की आवश्यकता होती है, आत्मा को अनुभव करने की आवश्यकता होती है। अपने को पहिचानने की आवश्यकता होती है। मनुष्य जाति की उन्नति का यही साधन है। यदि ईश्वर ने हमें पुण्यात्मा बनाया है तो हमें अपने को पापी क्यों समझना और कहना चाहिए। ये विचार तो क्षुद्र हैं, संकुचित हैं। हृदय पवित्र बनाइए, आप पवित्र ही हैं। विचार का बड़ा प्रभाव पड़ता है। यदि अपने आपको पापी समझते रहोगे तो पापी ही बने रहोगे पर यदि पुण्यात्मा समझना आरम्भ करोगे तो पुण्यात्मा हो जाओगे। एक शेर का बच्चा अपने जन्म काल से बकरियों के समूह में रहते रहते अपने को बकरी समझने लगा, घास खाने लगा और बे-बे बोलने लगा। एक बार एक शेर ने उसे देख लिया, उसे शेर के इस व्यवहार से दुख हुआ, वह उसके पास आया और बोला, तू शेर होकर बकरियों सा व्यवहार क्यों करता है, इस पर उस शेर ने अपने को शेर होने से भी इन्कार कर दिया। तब वह शेर उस बकरी बने शेर को पानी के पास ले गया और उसे उसकी परछाँई पानी में दिखाकर स्वरूप ज्ञान कराया तब कहीं उसने अपनी शेर वृत्ति का अवलम्बन किया। शेर के बच्चे की तरह भ्रम में पड़े हुए मनुष्यों! उठो, अपने को क्यों पापी समझते हो, अपने शुद्ध चैतन्य निष्पाप ब्रह्म स्वरूप को समझो। अंधेरे में खड़े होकर अँधेरा अँधेरा कहने से कभी अँधेरे का नाश नहीं होगा धीरे से दिया सलाई जला दो, सब अँधेरा भाग जायगा।
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