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Magazine - Year 1948 - Version 2

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शास्त्र और धर्म की विवेचना

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वह समय चला गया जब ‘शास्त्र’ शब्द से तो ग्रन्थ सम्बोधित किये जाते थे, उन्हें किसी “अलौकिक” या ‘ईश्वरीय’ शक्ति की देन कह कर उनके प्रति समाज में लोकोत्तर श्रद्धा का आविर्भाव किया जा सकता था। साधारणतः आज संसार में जितने ‘शास्त्र-ग्रन्थ’ हैं उन्हें किसी न किसी ‘मानव बुद्धि’ से ही उत्पन्न हुआ समझा जाता है। एक शास्त्र का ही एक वाक्य है कि “शास्त्र को पुरुष उत्पन्न करते हैं, पुरुष को शास्त्र नहीं।” कुछ लोग शास्त्रों के सम्बन्ध में कहते हैं कि वहाँ बुद्धि की गति नहीं है किन्तु वे यह भूलते हैं कि यहाँ बुद्धि की गति है, वहाँ नहीं है, इस बात का निर्णय भी बुद्धि द्वारा ही किया जाता है। बुद्धि की कोई निश्चित सीमा नहीं है। यदि कहा जाय कि शास्त्राकार ऋषियों की बुद्धि हमारी बुद्धि से अच्छी थी तो इसका निर्णय भी हमारी अपनी बुद्धि ही करती है, विचार का खण्डन भी विचार ही करता है। कहा गया है कि कोई अपनी छाया और बुद्धि को नहीं नाप सकता इसलिये किसी के सम्बन्ध में निर्णय करने के लिए बुद्धि ही सर्वोपरि साधन है।

गीता में कहा गया है कि कार्य-अकार्य का निर्णय करने के लिए शास्त्र प्रमाण हैं। किन्तु प्रश्न यह है कि किस शास्त्र द्वारा निर्णय किया जाय किससे नहीं? प्रत्येक मत और विचार धारा के लिये अलग-अलग शास्त्र हैं। यहूदियों के लिए बाइबिल का पूर्वार्ध ‘आल्डटेस्टामेन्ट’ अपौरुषेय है तो ईसाइयों के लिये उसका उत्तरार्ध ‘न्यूटेस्टामेंट’ ब्रह्मवाक्य है। जैनियों के लिये जैनागम-सुत्त, बौद्धों के लिये ‘त्रिपटिक’ और इसी प्रकार हिन्दू आदि अन्य धर्मावलम्बियों के लिए अपने धर्म-ग्रन्थ सर्वश्रेष्ठ हैं। हिन्दुओं में भी फिर अनेक मत-मतान्तर हैं। कोई वैदिक धर्मावलम्बी हैं तो कोई सनातनी। फिर वेदानुयायिओं में भी बड़े मतभेद हैं। कोई ऋग्वेदी हैं, कोई अथर्ववेदी, कोई सामवेदी हैं तो कोई युजर्वेदी। यहाँ तक कि अन्य तीन अथर्ववेद को बहुत अपवित्र मानते हैं और उसे वेदों की पंक्ति में से ही उठा दिया है तथा ‘त्रिवेदी’ ही भारत में मान्य रह गई । ऋक् और यजुर्वेद के अनुयायी सामवेद को भी अपवित्र मानते हैं जब कि गीता में उसकी श्रेष्ठता दिखाने के लिये कहा गया है कि ‘वेदों में सामवेद मैं ही हूँ।’ कहने का तात्पर्य यह कि विभिन्न शास्त्रों के मत और विचार धारा इतनी परस्पर विरोधी है कि कौन मान्य है कौन अमान्य इसका निर्णय बुद्धि द्वारा ही किया जा सकता है। इसलिये विभिन्न शास्त्रों में मत विशेष प्रतिपादित करते समय स्थान-स्थान पर ‘बुद्धि’ को भी महत्व दिया गया है। गीता का द्वितीय अध्याय तो एक मात्र ‘बुद्धि’ की महिमा से ही भरा हुआ है। अन्य स्थानों पर भी गीता में ‘बुद्धि’ शब्द का प्रयोग केवल ‘आत्मा’ और ‘अहं’ शब्द को छोड़ कर सबसे अधिक स्थानों पर किया गया है। गायत्री मंत्र में भी भगवान से शास्त्र नहीं माँगा गया है। वहाँ भी भगवान मुझे सद्बुद्धि दे, ऐसी प्रार्थना की गई है। क्यों कि सद्बुद्धि मिलने पर अनेक शास्त्रों का निर्माण किया जा सकता है। शास्त्र के अन्धानुयाइयों की ओर से कहा जाता है कि शास्त्रों में जो परस्पर विरोध है, उसका निराकरण शास्त्रों की ही पद्धति से करके ‘शास्त्रीय’ सिद्धान्त का निर्णय करना चाहिये। किन्तु यह निर्णय भी तो मानव-बुद्धि द्वारा ही किया जायेगा। महाभारत में एक स्थान पर कहा गया है।

तर्कोऽप्रतिष्ठः, श्रुतयोविभिन्नः, नैको ऋषिः यस्य वचः प्रमाणं। धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाँ, ‘महाजनो’ येन गतः स पन्थाः।

अर्थात् तर्क की कोई सीमा नहीं है, श्रुतियाँ (चिरकालीन परम्परा से सुनी हुई बात) अनेक प्रकार की और परस्पर विरोधी हैं, अतएव किसी भी ऋषि का वचन प्रमाण नहीं माना जा सकता। धर्म का तत्व तो मनुष्य के हृदय में (जहाँ से उसे बुद्धि की प्रेरणा मिलती है) छिपा हुआ है। ‘महाजन’ (पूरे समाज का बहुमत) जिस मार्ग पर चले वही सच्चा मार्ग है। यहाँ महाजन का अर्थ महापुरुष इसलिये नहीं किया जा सकता कि ऊपर कहा गया है कि किसी भी ऋषि का वाक्य प्रमाण नहीं। क्या ऋषि भी महापुरुष नहीं होते? इसीलिये यहाँ ‘महाजन’ का अर्थ समाज का बहुमत या ‘जनता’ कहा गया है जो आज की गुजराती भाषा में प्रयोग किया जाता है।

साराँश यह है कि कोई ग्रन्थ कितना ही पूजनीय हो और उसकी कितनी भी प्रतिष्ठा बताई गई हो, जब उसमें विचार-विरोध उत्पन्न होता है तो अंत में निर्णय के लिये बुद्धि की ही शरण लेनी पड़ती है। ‘बुद्धि’ ‘शास्त्र’ से ऊपर है क्योंकि ‘बुद्धि’ ‘शास्त्र’ का निर्माण करती है, शास्त्र ‘बुद्धि’ का निर्माण नहीं करता। बुद्धिहीन के लिये शास्त्र का मूल्य उतना ही है जितना अंधे के लिए दर्पण का। क्योंकि जिस प्रकार अंधा दर्पण में अपना मुँह नहीं देख सकता उसी प्रकार बुद्धिहीन विवेक-विचार से ‘शास्त्र’ को पढ़ और जाँच सकता।

जब बिना बुद्धि की कसौटी पर खरा उतरे कोई ‘शास्त्र’ प्रमाण नहीं हो सकता तो ‘शास्त्रों’ में प्रतिपादित ‘धर्म’ का भी बुद्धि की कसौटी पर खरा उतराना आवश्यक है ‘महाजनो येन गतः स पंन्थाः, के अनुसार आज के मानव-समाज का यह निश्चित मत है कि जिससे समाज का कल्याण हो, मानवता का विकास हो, अच्छे ज्ञान और विज्ञान की उन्नति हो तथा संसार के समस्त जन-समुदाय को सुख मिले, वही धर्म है।

ऋषियों और शास्त्रकारों ने अपने अपने समय और परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न शास्त्रों में धर्म का प्रतिपादन किया है। उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार अनेक तत्व की बातों का चयन अपने ग्रन्थों में किया है। उनमें से आज के समय और परिस्थितियों के अनुकूल पात्र के अनुसार सामग्री निकालना और आवश्यकता के अनुसार उन्हें बदलना मनुष्य की बुद्धि काम है।

परिस्थितियों और उपयोग के अनुसार ग्रहण, किये जाने के कारण ‘धर्म’ कोई एकान्तिक अत्यान्तिक, अटल, अचल और अपरिवर्तनीय वस्तु नहीं है। ऊपर धर्म की ‘लोकोपकारी’ आदि जो परिभाषायें बताई गई हैं उसके अनुसार हम देखते हैं कि समाज के प्रत्येक सदस्य का धर्म एक नहीं हो सकता। फौजी सिपाही का धर्म एक होगा तो किसी का दूसरा, अध्यापक का तीसरा और दुकानदार का चौथा होगा। एक ही आदमी का धर्म अच्छे दिनों में एक होगा तो बुरे दिनों में दूसरा। किस अवस्था में किस व्यक्ति का क्या धर्म है? इसका निर्णय अच्छी बुद्धि द्वारा ही ठीक-ठीक किया जा सकता है। एक कथा है कि जब ऋषि लोग इस लोक से जाने लगे तो मनुष्यों ने उनसे पूछा कि अब हम लोगों को कठिनाई के समय सच्चा मार्ग कौन दिखायेगा? तब ऋषियों ने उनको तर्क दिया और कहा कि भविष्य में यही तुम्हारा ऋषि होगा। इस कथा का यही तात्पर्य है कि युग और परिस्थिति के अनुसार अपनी बुद्धि द्वारा अपना कर्तव्य निश्चित करो। अंध विश्वास के साथ पुरानी परम्परा की लकीर पीटना छोड़ दो।

उपरोक्त व्याख्या के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मानव-कल्याण के लिये समय-समय पर कवियों और आत्म पुरुषों ने जो सत्य वाक्य संग्रहीत किये हैं वे शास्त्र हैं किन्तु प्रत्येक स्थिति में उन पर अमल करते समय हमें बुद्धि को ही प्रधानता देनी चाहिये। क्योंकि ‘यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं?’

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