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Magazine - Year 1948 - Version 2

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दवादारु का फंदा

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(महात्मा गाँधी)

हम लोगों की कुछ ऐसी आदतें पड़ गई हैं कि जहाँ कहीं जरा भी दर्द हुआ कि तुरन्त वैद्य, डॉक्टर या हकीम के घर दौड़े जाते हैं और यदि ऐसा न भी करें तो उस समय अपना पड़ोसी या अन्य कोई जिस दवा के लेने की सलाह देता है उसे तुरन्त ले लेते हैं। हमें कुछ ऐसा विश्वास सा हो गया कि बिना दवा के रोग मिट ही नहीं सकता। परन्तु यह एक बड़ा भारी बहम है और इस बहम से जितने लोग दुखी हुए हैं और होते हैं उतने और कारणों से न हुए और न होंगे। मतलब यह कि यदि हम यह समझ लें कि दर्द किसे कहते हैं तो कुछ समाधान हो सकता है। दर्द का अर्थ है दुःख और रोग का भी अर्थ यही है इस लिए दर्द के मिटाने का उपाय करना तो योग्य है पर उसके लिए दवा का उपयोग करना व्यर्थ है। यही नहीं, किन्तु ऐसा करने से बहुत बार नुकसान उठाना पड़ता है। हमारे घर में कचरा पड़ा हुआ है और उसे बाहर फेंक देने के बजाय हम ढक दें तो उसका जैसा असर होगा ठीक वैसा ही असर रोग मिटाने कि लिए ली गई दवा का होता है। इस कचरे को ढक देने का परिणाम यह होगा कि वह सड़कर अधिक हानि पहुँचावेगा। सिवा इसके उस परके ढक्कन को सड़ जाने से कचरा और भी ज्यादा सड़ जायगा। तब हमें दुगुने कचरे के निकाल फेंकने की चिन्ता करनी पड़ेगी। ठीक ऐसी ही दशा दवा लेने वाले की होती है। कचरा ढक देने के बजाय यदि बाहर फेंक दिया जाय तो घर पहले के जैसा ही साफ-सुथरा हो जाय। प्रकृति शरीर में रोग, कष्ट आदि पैदा कर सूचित करती है कि शरीर में कचरा इकट्ठा हो गया है। प्रकृति ने स्वयं भी कचरे निकालने के शरीर में कई रास्ते बना रक्खें हैं और जब जब शरीर में कोई रोग या कष्ट हो तो समझना चाहिए कि अब प्रकृति ने शरीर में से कचरा निकलना शुरू किया है। कोई मनुष्य हमारे घर का कचरा साफ करने लगता है तो हम उसका बड़ा उपकार मानते हैं और जब तक वह कचरा साफ करता रहता है तब तक कुछ तकलीफ भी होती है तो चुपचाप सह लेते हैं। उसी भाँति प्रकृति जब तक हमारे शरीर में से कचरा निकाल कर उसे साफ न कर दे तब तक यदि हम चुप रहें-प्रकृति के विरुद्ध कोई दवा वगैरह न करें- तो शरीर निरोग होकर दुःखों से छुटकारा पा जाय। मान लीजिए कि हमें सरदी हो गई। उस समय दवा लेने या सौंठ वगैरह के खाने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें जानना चाहिए कि हमारे शरीर में जो कचरा इकट्ठा हो गया है उसे बाहर निकाल फेंकने के लिए प्रकृति आई है, उस समय उसे रास्ता देना चाहिए। ऐसा करने से हम बहुत थोड़े समय में ही साफ-निरोग-हो सकेंगे। यदि उस समय प्रकृति को अपना काम न करने देकर उसका सामना करने के लिए खड़े हो जायं तो उसके लिए दुगुना काम बढ़ जायगा। एक तो कचरा दूर करना और दूसरा हमारे साथ लड़ना। इसके विपरीत चाहे तो प्रकृति को उल्टी सहायता दी जा सकती है, हमें चाहिए कि जिस कारण से कचरा इकट्ठा हुआ है उस कारण को ही दूर कर दें, जिससे कचरे का बढ़ना रुक जाय। इसके लिए उस समय खाना बन्द कर देना चाहिए, ऐसा करने से कचरा न बढ़ेगा। इसके सिवा खुली हवा में योग्य कसरत करते रहने से भी कचरा शरीर के द्वारा निकलता रहेगा। शरीर को निरोग रखने के इस सुनहरी नियम को प्रत्येक मनुष्य अपने आप ही प्रमाणित कर सकता है। परन्तु उस समय अपने मन की स्थिरता रखना बहुत ही आवश्यक है। जिस मनुष्य की ईश्वर पर सच्ची श्रद्धा है वह तो हमेशा ऐसा करेगा ही। मन को स्थिर करने में ये विचार बहुत सहायक होंगे कि ऐसा कोई बीमा नहीं उतार सकता जो वैद्य या हकीमों की दवा लेने से रोग दूर हो ही जायगा, क्योंकि उनकी दवा लेने वाले भी बहुत से निरोग होते नहीं देखे जाते और यदि ऐसा होता हो तो फिर इन प्रकरणों के लिखने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ती और हम सब बड़े सुख से जिन्दगी का उपभोग करते हुए दिखाई पड़ते।

अनुभव तो यह कहता है कि जहाँ एक बार हमारे घर में श्रीमती बोतल देवी का प्रवेश हुआ कि फिर वे उस घर से बाहर निकलती ही नहीं। असंख्य मनुष्य ऐसे देखे जाते हैं जो जिन्दगी भर किसी न किसी रोग से जकड़े रहते हैं; और एक के बाद एक दवा बढ़ाते ही जाते हैं। वे प्रतिदिन वैद्य या हकीमों को बदला करते हैं और रोग मिटा देने वाले वैद्य की तलाश में निरंतर घूमा करते हैं और अन्त में स्वयं ख्वार होकर तथा औरों को ख्वार कर, तड़फ कर मर मिटते हैं। स्व. प्रसिद्ध जज स्टीवन हिन्दुस्तान में रह गये हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि जिन वनस्पतियों के सम्बन्ध में वैद्य लोगों को बहुत थोड़ा ज्ञान है उन्हीं वनस्पतियों को वे ऐसे शरीर में पहुँचाते हैं जिसे उन वनस्पतियों का उन वैद्यों से भी बहुत थोड़ा ज्ञान है। वैद्य लोगों को जब इस बात का पूरा पूरा अनुभव हो जाता है तब वे भी इसी भाँति कहने लगते हैं। डॉक्टर मेजेन्दी ने कहा है कि ‘वैद्यक महा पाखण्ड है।’ सर एस्टली ने लिखा है कि ‘वैद्यक शास्त्र केवल अटकल पर रचा गया है।’ सर जान फोनर बझ ने कहा है कि ‘अच्छे डाक्टरों के रहने पर भी बहुत से मनुष्यों को कुदरत ने ही निरोग किया है।’ डॉक्टर बेकर को कहना है कि ‘लाल बुखार से जितने रागी मरते हैं उससे अधिक रोगी उसकी दवा से मरते हैं।’ डॉक्टर फरोथ कहते हैं कि ‘डॉक्टरी की अपेक्षा अधिक अप्रमाणिक धंधा भाग्य से ही कोई देख पड़ेगा।’ डॉक्टर थोमस वोटसल कहते हैं कि ‘बहुत से ऐसे आवश्यक प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमारा डाक्टरी धंधा नहीं दे सकता।’ डॉक्टर फ्रेंक का कहना है कि ‘इन दवाखानों के द्वारा हजारों मनुष्यों की हत्या होती है।’ डॉक्टर मेसन गुड़ कहते हैं कि ‘प्लेग, हैजा, महामारी आदि से जितने लोग मरते हैं उनसे अधिक मनुष्य इन दवाओं की बलि चढ़ते हैं।’ यह बात हम जगह जगह देखते हैं कि जहाँ जहाँ वैद्यों को वृद्धि हुई है वहाँ वहाँ रोग कम होने के बदले अधिकाधिक ही बढ़े हैं। जिन पत्रों को और 2 विषयों के विज्ञापन नहीं मिलते उन्हें दवाओं के बड़े बड़े विज्ञापन सहज में मिल जाते हैं। इंडियन-ओपीनियन में जब विज्ञापन लिए जाते थे और उसके संचालकगण जब लोगों के पास विज्ञापन लेने को जाते तथा दवा बेचने वाले उसमें दवाओं का विज्ञापन छापने के लिए बड़ा आग्रह करते और उसका चार्ज भी भरपूर देने का लालच दिखलाते। जिस दवा की कीमत एक पाई होती है उसका हम एक रुपया देते हैं। यदि ऐसी दवाओं के बना-लेने की कोशिश करना चाहें तो उसके बनाने वाले इस बात का पता भी नहीं पड़ने देते कि वह दवा किस तरह बनाई जाती है। ‘गुप्त दवाएं’ नाम की एक पुस्तक एक डॉक्टर ने इस अभिप्राय से प्रकाशित की है कि उसे पढ़ कर लोग भ्रम में न पड़े। उसमें उन्होंने लिखा है सालसा-परीला, फूट-सोंल्ट, सिरप वगैरह जो पेटेन्ट दवाएं हैं उनकी कीमत सवा दो रुपये से लेकर सवा पाँच रुपये तक दी जाती है, परन्तु इन दवाओं की मूल कीमत एक पैसे से लेकर चार पैसे तक होती है। इसे फैला कर देखें तो जान पड़ेगा कि हम लोग कम से कम छत्तीस गुणी कीमत देते हैं। मतलब यह कि इस हालत में तीन हजार पाँच सौ टके से पैंतीस हजार टके तक का नफा दिया जाता है।

इससे पाठक इतना तो विचर् सकेंगे कि रोगी को न तो डाक्टरों या वैद्यों के यहाँ दौड़े जाने की आवश्यकता है और न एकदम दवा लेने की, परन्तु दुःख है कि प्रायः लोग इतना धीरज नहीं रखते। साधारण लोग यह नहीं मान सकते कि सब ही डॉक्टर अप्रमाणिक-अविश्वासी- होते हैं और सब दवाएँ खराब ही होती हैं, ऐसे लोगों के लिये इतना कहना आवश्यक जान पड़ता है कि “जहाँ तक बन पड़े धीरज रक्खो, डाक्टरों या वैद्यों को जहाँ तक हो कष्ट न दो। डॉक्टर वगैरह को बुलाना ही आवश्यक जान पड़े तो किसी अच्छे समझदार अनुभवी को बुलाओ और उसी के कहे अनुसार चलो। दूसरे डॉक्टर या वैद्यों को तभी बुलाओ जब कि पहला डॉक्टर तुम्हें अन्य के बुलाने की सलाह दे। तुम्हारा रोग तुम्हारे डॉक्टर के हाथ में नहीं है, आयु अधिक होगी तो अवश्य आरोग्य लाभ करोगे और प्रयत्न करते रहने पर भर यदि तुम्हारी या तुम्हारे सगे-सम्बन्धी की मौत हो जाय तो समझना कि यह भी एक जिन्दगी का फेर-फार ही है।

इन निबन्धों के लिखने का यही कारण है कि पाठक इनमें कहे गये शरीर रचना, हवा, पानी, खुराक, कसरत, कपड़े, पानी और मिट्टी के उपचार, आकस्मिक कपड़े, बच्चों की सँभाल, गर्भ के समय स्त्री-पुरुषों का कर्तव्य और साधारण रोग आदि विषयों के सम्बन्ध में खूब विचार और मनन कर उन्हें उपयोग में लाने का यत्न करें।

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