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Magazine - Year 1948 - Version 2

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धर्म तर्क संगत होता है

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प्राचीन काल में महर्षियों ने जिस धर्म को मोक्ष प्राप्ति का अनन्य साधन बताया था, वही धर्म आज के मानव के समक्ष एक भूलभुलैया के रूप में आकर उपस्थित हो गया है। कोई धर्म को जाल कहकर संतोष प्राप्त करता है तो दूसरा धर्म को मनुष्य मनुष्य में वैमनस्य और घृणा के भावों के जागरण करने का एक साधन कहने में भी नहीं चूकता। साराँशतः आज का मनुष्य धर्म को भयावने और घृणित रूप में देखता है। अब आप विचारेंगे कि क्या सचमुच ही धर्म ऐसी वस्तु है ? मैं इसके उत्तर में आप से कहूंगा, यह वास्तव में धर्म का दोष नहीं है, अपितु यह दोष हमारी भ्रमात्मक बुद्धियों का है, जिसके कारण हम वास्तविक धर्म क्या है ? यह समझने में असमर्थ रहते हैं। वास्तविक धर्म वही है जो भगवान मनु ने धर्म शास्त्र में लिखा है-

“यस्तर्केणनुसंधत्ते स धर्मोवेदनेतरः”

अर्थात् जो तर्क की कसौटी पर पूर्ण उतरे वहीं वैदिक धर्म है। संसार में कोई भी व्यक्ति इस बात को समझे बिना धर्म के पालन में समर्थ नहीं हो सकता-परिवर्तनशील प्रकृति साम्राज्य में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जो उत्पन्न होकर जीर्ण न हो और जीर्ण होकर पुनर्नवीनता पाने के लिये प्रलय की ओर न जाती हो। धर्म के नियम भी इस संसार से बाहर हैं। संसार के परिवर्तन के साथ धर्म के नियमों का परिवर्तन न होना अनिवार्य है। उदाहरणार्थ समझिये “जिस कर्म का परिणाम सुख है वही कर्म धर्म है” इस धर्म की परिभाषा को मानकर चलने से हमें ज्ञान होगा कि धर्म के नियमों में भी परिवर्तन आता ही रहता है। किसी नियम के पालन करने का परिणाम जब तक सुख है तभी तक वह धर्म की गणना में है और उसी समय तक उसका पालन भी उचित है, परन्तु जब उसका परिणाम सुख से दुख में परिणत होता दिखाई देने लगे तो वही पाप बन जाता है। जैसे झूठ बोलना पाप है परन्तु जिस सत्य कथन से महान अनर्थ होता हो तो वह धर्म कहने के योग्य नहीं। लोकमान्य तिलक जी ने गीता रहस्य में लिखा है कि-

“यदि हम अपने घर में अकेले पड़े हों और उस समय कोई डाकू आकर हमसे पूछे कि धन कहाँ है तो उस समय का सत्य भाषण कभी भी सत्य भाषण अथवा धर्म में सम्मिलित नहीं हो सकता।” इसी प्रकार पवित्रता आदि भी ले लीजिये। प्रातः काल स्नान करना धर्म है परन्तु निमोनिया से पीड़ित के लिये वही अधर्म हो जाता है। इतना ही नहीं, जिस विवाह प्रथा में विश्व आज विश्वास करता है और जिसको लोक और परलोक का साधक समझता है वह प्रथा श्वेतकेतु के पूर्व कहाँ थी? किन्तु क्या? आज संसार को कोई भी विवेक बुद्धि रखने वाला जन विवाह प्रथा को तोड़कर ऋतुदान पर्यन्त पुरुष स्त्री सम्बन्ध रखने की पूर्व प्रथा का जारी रखना धर्म या उचित बना सकता है? उत्तर में कहना होगा कि नहीं। इतिहासों या पुराणों में देखो श्रीराम पिता की आज्ञा पालन करने पर बड़े त्यागी व मर्यादा पुरुषोत्तम माने गये, परन्तु प्रहलाद तो पिता की आज्ञा भंग करने पर ही परम भक्त माने गये। एक अक्षर भी प्रदान करने वाले गुरु का सामना करना अन्य अवसरों पर भले ही महापाप हो परन्तु महाभारत के युद्ध में तो भगवान् कृष्ण ने यही उपदेश दिया था कि “हे अर्जुन! इस समय गुरुओं पर प्रहार न करके तू युद्ध से मुख मोड़ेगा तो तेरा सारा क्षात्र धर्म मिट्टी में मिल जायगा। शास्त्रकारों ने साफ तौर पर लिखा है कि “देश, काल पात्र व प्रवृत्ति, अनुसार धर्म से अधर्म और अधर्म से धर्म तथा अर्थ से अनर्थ और अनर्थ से अर्थ किया जा सकता है और किया जाता है।”

अब वह दोहराने की आवश्यकता नहीं कि- “लौकिक धर्म किसी एक बात पर नहीं रहता।”

उसके लिए परिस्थिति के अनुसार आगे पीछे के कई विचार करने पड़ते हैं। मनुजी लिखते है कि-

“श्रुतिः, स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।

एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षार्द्धमस्य लक्षणम्।।”

अर्थात् वेदों के वचन, धर्मशास्त्रों के कथन, श्रेष्ठों के चलने और अपनी आत्मा की स्वीकृति ये चार धर्म की कसौटियां हैं। यानी धर्म संबंधी जब कोई जटिल समस्या उपस्थित हो तो वेदों को पढ़िए, धर्म शास्त्रों को देखिए इनसे भी समस्या हल न हो तो इतिहास के पृष्ठ उलटिये और देखो ऐसी समस्या आने पर हमारे पूर्वजों ने क्या किया था ? इस पर भी यदि मन का संदेह निरस्त न हो तो अपनी अन्तरात्मा की पुकार सुनिए और देखिए कि अपनी अन्तरात्मा उसे धर्म कहती है या अधर्म कह रही है। बस अन्तिम धर्म की यही कसौटी है इस पर जो पूर्ण उतरे उसे करो और जो इस कसौटी पर अपूर्ण उतरे उसे कभी करने का साहस न कीजिए नहीं तो धर्म के स्थान पर अधर्म होगा और कर्ता को अपार दुःख सागर में डुबा देगा।

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