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Magazine - Year 1950 - Version 2

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मनुष्य आखिर अल्पज्ञ ही है

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(ले. पं. दुर्गाप्रसाद जी शास्त्री)

मनुष्य अल्पज्ञ है, उसका ज्ञान सीमित और एक देशीय है। ऐसा आर्ष ग्रन्थों का सर्वोपरि सिद्धान्त है। बड़े-बड़े विद्वानों ने भी यही माना है कि संसार का अपार सागर हिलोरें ले रहा है, और हम उसमें से एक साधारण सा ज्ञान प्राप्त करने के लिये जीवन पर्यन्त प्रयत्न करते हैं, तब भी हमारा ज्ञान अधूरा रह जाता है। कहते हैं कि न्यूटन यही कहा करता था कि ज्ञान के अपार सागर में मैं केवल कंकड़ियाँ चुन रहा हूँ। भारत के प्रमुख वैज्ञानिक उपनिषद्कारों ने भी यही लिखा है।

‘अविज्ञातं विजानताँ विज्ञातम विजानताम्।,

अर्थात्- बुद्धिमानों के लिये तो अज्ञात है और मूर्खों के लिये ज्ञात।

महाराजा भर्तृहरि जी ने लिखा है कि जब तक मैं मूर्ख रहा तब तक मैं उन्मत्त हाथी की भाँति मदान्ध रहा परन्तु ज्यों-ज्यों मेरे हृदय में ज्ञान का प्रकाश हुआ, त्यों ही त्यों मुझे अपनी अल्पज्ञता का ज्ञान होता गया। यों तो संसार का प्रत्येक मूर्ख यह समझता है कि संसार में जितनी बुद्धि है, उसके दो हिस्से मेरे पास हैं। और शेष तिहाई हिस्से में संसार अपनी गुजर कर रहा है। परन्तु जब उसकी बुद्धि के विपरीत आकस्मिक घटना घटित होती है तब वह त्राहिमाम्-त्राहिमाम् करके रोता है, और दिन-रात दुर्दैव को कोसता हुआ या अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करता है। बहुत संभव है कि लोगों का इस विषय में यह ख्याल हो कि लोगों की बुद्धि को इस प्रकार सीमा वाला बतलाकर मनुष्य को उत्साह हीन और नपुँसक कर देना है। इन विचारों से सहमत होकर बहुत संभव है कि मनुष्य के विचार तुच्छता की ओर लग जावें, जिससे पुरुषार्थ नष्ट होकर मनुष्य अपनी मनुष्यता से भी गिर सकता हैं जब कि मनुष्य ने रेल , तार, वायुयान, जलयान, बेतार के तार आदि निकाले, मनुष्य ने सृष्टि के रुख को ही बदल दिया, समुद्र पाट दिये, पहाड़ काट डाले, नदियों के बहाव को बदल दिया जंगल काट कर बड़े-बड़े शहर बसाये। विस्फोटक पदार्थों से संसार को चकाचौंध कर डाला, फिर मनुष्य की अल्पज्ञता की दिग्दर्शन कराना कहीं भूल का सन्देश तो नहीं है। हमारे विचार में यह सब कुछ ठीक है, मनुष्य अपनी वास्तविक शक्ति को न समझ कर छोटी श्रेणी को प्राप्त हो सकता है। परन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य अपनी सीमित शक्ति को कई गुना समझ कर भयंकर हानियाँ भी उठा सकता है। इसी प्रकार नैपोलियन यह कहा करता था कि असम्भव शब्द मूर्खों के कोष में मिलता है उसी नेपोलियन को न केवल राज्य करना ही किन्तु पेट भर रोटी मिलना भी असम्भव हो गया।

संसार भर पर विजय प्राप्त करने वाला सिकंदर अपनी अल्पज्ञता को समझ कर दोनों हाथ खाली करके संसार से विदा होता है। रोमन साम्राज्य के दाँत खट्टे करने वाला हार्निवल भी संसार की आकस्मिक घटनाओं से घबराता है। और अपनी अल्पज्ञता पर पश्चाताप करता है। सन् 1912 ई॰ में टाइटैनिक जहाज इतना विशाल तैयार हुआ था कि जिसकी लम्बाई 1000 फुट थी और जो समुद्रतल से 164 फुट ऊंचा था। इसके निर्माताओं का यह दावा था कि कि संसार की ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो इसको समुद्र में डुबा दे। जहाज न्यूयार्क को रवाना होता है, और 2358 मुसाफिर उसमें सफर करते हैं। मनुष्य के हाथ में जितने साधन थे उन सब विधाओं का प्रयोग किया जा चुका था। न्यूयार्क पहुँचने में केवल 24 घन्टे की देर थी जहाज रेल की गति से दौड़ रहा था। मुसाफिर शान्ति और निश्चय की नींद सो रहे थे, अधिकारियों के हृदय अभिमान से पूरित थे। परन्तु मनुष्य का अल्पज्ञान कुछ सोचता है, और ईश्वर कुछ करता है। एक बर्फ का पहाड़ आया और समुद्र में इधर से उधर निकल गया-तनिक सी ठेस लगने पर जहाज में इतना बड़ा सूराख हो गया कि अनेक प्रयत्न करने पर भी जहाज अपने को डुबाने से न बचा सका। यह है मनुष्य की अल्पज्ञता। जिसको मनुष्य नहीं समझ सकता कि एक मिनट के पश्चात् क्या होगा-और उसकी पीठ के पीछे क्या हो रहा है, अथवा 10 मील पर बैठे हुए उसके घर पर किस प्रकार की मंत्रणा की जा रही है। बड़े से बड़ा वैद्य और डॉक्टर जो बातों-बातों में बड़े बड़े रोगों का इलाज करता है यह भी नहीं जानता कि उसी क्षण उसके पेट के भीतर क्या हो रहा है अथवा उसके फेफड़ों में कौन सा रोग प्रवेश कर रहा है। हमने अनेक बार ऐसी घटनायें स्वयं देखी हैं कि जिन रोगियों को बड़े बड़े विद्वान डॉक्टर और वैद्यों ने ‘असाध्य’ कहकर परित्याग कर दिया, उसी को थोड़े दिन के पश्चात् आराम हो जाता है। ऐसे रोगियों की, जिनको डॉक्टर और वैद्य साध्य बताते थे मृत्यू हो जाती है। इसी प्रकार की आकस्मिक घटनायें हमको शिक्षा देती हैं कि मनुष्य का ज्ञान अल्प है, और उसको नहीं मालूम कि थोड़ी देर में क्या होने वाला है। जब हम यह देखते हैं कि एक खगोल विद्या का पंडित अपनी आँख में किरकिटी को भी नहीं निकाल सकता, तब वह कैसे कह सकता है कि मनुष्य का ज्ञान बहुत है।

संसार का प्रत्येक बड़े से बड़ा पराक्रमी बुद्धिमान और विज्ञान ज्ञाता इस बात को भली प्रकार जानता है कि भविष्य की उसको कुछ भी सूचना नहीं है, कि थोड़ी देर पश्चात् क्या होने वाला है। एक किसान अपनी हरी-भरी खेती देख कर अपने मन में गर्व करता है कि इस वर्ष मैं बहुत सारा धन प्राप्त कर सकूँगा परन्तु घन्टे भर के पश्चात् बड़े जोर से बादल गरजते हैं, बिजली कड़कती है, और ओले गिर जाते हैं। तथा उस किसान की आशा निराशा में परिणत हो जाती है। महाराज दशरथ, राम का राज्य होगा इस उत्साह में फूले नहीं समाते रात्रिभर आनन्दोत्साह होता है प्रातःकाल राम को वन जाने की सूचना मिलती है और महाराज मृत्यु शैया पर दिखाई देते हैं। बगीचे में खड़ा हुआ वक वृक्ष का पौधा बड़े से बड़े विज्ञानी को यह फटकार दे रहा है कि तुझ जैसे सहस्रों विद्वान इस धरातल पर आये और एक अंग की भी परीक्षा न कर सके।

रात्रि को शहर के लोग आनन्द से शयन करते हैं प्रातःकाल चार बज कर कुछ मिनट पर भूकम्प आता है-प्रातःकाल न नगर निवासियों का पता है और न नगर का। इस विषय में भी विज्ञान ज्ञाताओं ने बड़ी भारी छानबीन की है। परन्तु परिणाम कुछ नहीं।

महादेव गोविन्द रानाडे पूना के रहने वाले थे, वह बचपन में शरीर से बहुत ही निर्बल थे और सर्वदा गूँगों की भाँति चुपचाप बैठे रहते थे। उनकी इस दशा से उनके माता पिता बड़े दुःखी रहते थे। आखिर उन्हें पढ़ने के लिये पाठशाला भेजा गया, पढ़ने के पश्चात् जगत विख्यात विद्वान, न्यायप्रिय, प्रतिष्ठित, ऐश्वर्य वाले महापुरुष बने।

अकबर के पिता का नाम हुमायूँ था, जिस समय वह महा दुखी था उसी समय अकबर का जन्म अमरकोट में हुआ। कहते हैं, कि अकबर के जन्म के समय हुमायूँ के पास दास और दासियों को उपहार देने के लिए कुछ भी न था केवल उसके पास थोड़ी सी कस्तूरी थी, उस समय वही उसने लोगों को थोड़ी-थोड़ी बाँट दी। परन्तु वही अकबर तेरह वर्ष की अवस्था में शहंशाह बनकर गद्दी पर बैठा, कौन कह सकता है कि भविष्य में क्या होगा।

ज्योतिष के विद्वान किसी कल्पना के आधार पर कुछ कहते हैं, वे भी इन आकस्मिक घटनाओं के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकते। कहते हैं, कि बनारस में एक बड़े विद्वान ज्योतिषी ने ज्योतिष के नियमों के अनुसार अपनी कन्या का पाणिग्रहण संस्कार किया, प्रातःकाल वह महाशय गंगा स्नान करने गये कि अचानक उनका सीढ़ी से पैर फिसल गया और उनकी मृत्यु हो गई। ऐसी आकस्मिक घटनाओं के सम्बन्ध में संसार के सारे विद्वान अवाक् हैं, न कुछ कह सकते हैं न समझ ही सकते है। कि कल क्या होगा।

संसार के प्रत्येक विद्वान को समय समय पर यह अनुभव होता रहता है कि वह जो कुछ भी करता है उसमें कोई ऐसी महान शक्ति है जो समय समय पर विघ्न डाल देती है। कोई ऐसी शक्ति है जो उसके हाथ और कलम को रोक कर दूसरी जगह लगा देती है। कोई ऐसी शक्ति है जो करना कुछ होता है और कुछ करा देती है। आये दिन पग पग पर आकस्मिक घटनाएं घटती हैं और उसकी अल्पज्ञता का बोध करा देती है।

इन घटनाओं से एक महान शक्ति का ज्ञान होता है, जिसके द्वारा विश्व का सारा काम यथावत् रूप से चल रहा है, और जिसकी महिमा को मनुष्य सच्चे ज्ञान के बिना नहीं समझ सकता। जो उस शक्ति की महत्ता को नहीं समझा वह कितना ही ज्ञानी होने का दम क्यों न भरे सब निरर्थक है।

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