चंचल मन का नियंत्रण
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(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
अंग्रेजी में “ग्रास हौपर माइन्ट” एक विशेष अर्थ रखता है। टिड्डी कभी एक स्थान पर स्थिर होकर नहीं बैठती, क्षण क्षण में इधर से उधर कूदती फाँदती रहती है। एक पत्ती से दूसरी पत्ती पर जाती है। यही हाल कुछ लोगों के मन का होता है। अति चंचल मन ढुलमिल स्वभाव के व्यक्तियों को टिड्डी प्रकृति वाले व्यक्ति कह सकते हैं।
इच्छाशक्ति की निर्बलता से जिस मानसिक कमजोरी की सृष्टि होती है उसकी मूल वृत्ति चंचलता है। मन, इच्छा जनित शुभ वस्तु, उत्तम उद्देश्य पर स्थिर नहीं होता, पुनः पुनः नये प्रदेशों की ओर आकर्षित होता है।
मन की चंचलता से बड़ी कठिनाई यह होती है कि विकास नहीं हो पाता। विकास का नियम है-निरन्तर मन से एक ही दशा में काम लेना, पुनःपुनः अभ्यास करना। चंचल व्यक्ति दस पन्द्रह मिनट भी चित्त को एक स्थान पर एकाग्र नहीं कर पाता। विद्यार्थी, सिनेमा प्रिय, शौकीन, कवि, व्यापारी, यात्री, क्लर्क इत्यादि चंचलता के कारण सदैव यही शिकायत करते हैं कि अमुक पुस्तक या विषय समझ में नहीं आता, आध्यात्म कठिन विषय है इत्यादि। बालक सर्वदा अति चंचल रहते हैं। उनका मनोबल तथा एकाग्रता की शक्तियाँ अति अविकसित रहती है।
टिड्डी वृत्ति वाला व्यक्ति कभी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता, क्योंकि वह एक सुनिश्चित, सुकल्पित उद्देश्य पर तीव्रता से नहीं चल पाता। मध्य में आने वाले प्रलोभन, आलस्य, प्रमोद, अशान्ति इत्यादि उसे एकनिष्ठ नहीं रहने देते। उसकी इच्छाएं, वासनाएं और स्मृतियाँ निरन्तर कमजोर होती जाती हैं। मनुष्य के चित्त को विचलित करने वाले दुर्व्यसनों में फँसने वाले अनगिनत मानसिक विकार और भाव हैं। बड़े-बड़े विद्वान मनोवेग और निकृष्ट विकारों से उत्तेजित हो कर बड़े-बड़े अनर्थ कर डालते है, वर्षों का किया कराया क्षण भर में नष्ट कर देते हैं। तनिक से आलस्य या प्रमाद से इतनी भारी गलती हो जाती है कि आयु पर्यन्त वह ठीक नहीं हो पाती विकारमय स्वार्थी विचारों मुक्ति।
आपका मन दो प्रकार के विचारों में भटकता है। प्रथम तो बाह्य विषयों में दिलचस्पी लेता है। विषय नाना प्रकार के हैं। इनका सम्बन्ध हमारी पाँच इन्द्रियों से है। कामेच्छा, क्षुधा, पिपासा, सुन्दर वस्त्र, गृह सामाजिक प्रतिष्ठा, मान, सौंदर्य, शृंगार, यौवन इत्यादि में मन भटकता है। वह इनका गुलाम बनता है और उद्वेगों का शिकार बनता है।
दूसरे पदार्थ आन्तरिक हैं। आप शान्ति चाहते हैं। मन के अन्दर ईर्ष्या, द्वेष, भय, स्वार्थ, क्रोध, लोभ, इत्यादि वृत्तियाँ सदैव संघर्ष मचाती हैं। वृत्तियाँ चंचल रहती है। आप दिन प्रतिदिन तुच्छ प्रसंग, पुरानी कटु स्मृतियों के कूड़े करकट में फँसे रहते हैं।
उपरोक्त वृत्तियों से मुक्ति के लिए निम्न उपाय कीजिए।
(1) ऐच्छिक ध्यान :-
हम अपनी इच्छा को एक विशेष दिशा में संग्रह पूर्वक लगायें। निकम्मे खाली बैठें वरना मन को पुनः पुनः उसी कार्य में लगाये रहें। जब कोई अनिष्ट विचार मन में आवे तो उसे अपनी इच्छा शक्ति से उत्तम विचार में परिवर्तित कर देना चाहिए। मस्तिष्क की धारणा में इस प्रकार के आग्रह से निम्न मन स्तर बदल कर उच्च स्थिति प्राप्त हो सकती है। ऐच्छिक ध्यान मन की चंचलता से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय है।
(2) एकाग्रता की सिद्धि :-
जब आप मन को ढीला छोड़ते हैं तो बुरे विचार, प्रलोभन, बल पूर्वक मनः प्रदेश में घुस आते हैं। इसका कारण मनुष्य की बहिर्मुखी प्रवृत्ति होना है। ऐसे मन के लिए एकाग्रता का अभ्यास अमृतोमय उपाय है। चंचल मन को अपने उद्देश्य पर जमाइये। ऐसी वृत्ति कीजिए कि नेत्र चाहे खुले हुए हों, अन्दर से आपका मन एक निश्चित स्थान, उद्देश्य, पात्र, परिस्थिति में एकाग्र रहे।
गीता में निर्देश है “जिस प्रकार अविचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र के प्रति नाना नदियों के जल विशाल समुद्र को अपनी हलचल से विचलित नहीं कर सकते वैसे ही स्थिर चित्त वाले महान आत्मा को संसार की हलचल उद्वेलित नहीं कर सकती मनोनियम के परिपूर्ण ज्ञान से मुक्त हो कर वह पूर्ण शान्ति में निवास करता है।”
(3) प्राणायाम :-
प्राणायाम के अभ्यास से बुद्धि विकसित होती है और मन शान्त स्थिर होता है। आन्तरिक आनन्द प्राप्त होता है। प्राणायाम करने वाला सुखी रहता है। प्राणायाम से मन को अपने आधीन कर लीजिए। अनैच्छिक ध्यान ही हमारे लक्ष्य चिंतन में, ध्येय की प्राप्ति में बाधा डालती है। अतः प्राणायाम द्वारा इस विक्षेप को दूर करना चाहिए।
(4) निरन्तर अभ्यास :-
हमारा मन अभ्यास का क्रीत दास है। अतः आप नीरस विषय जिनसे मन भागता है अपने मानसिक नेत्रों के सन्मुख रखिये। आँखें बन्द कर उन्हीं को अपनी कल्पना द्वारा प्रस्तुत करने की कोशिश कीजिए। भावना को बार-बार दुहराने से मन में उत्तेजना इच्छा शक्ति के रूप में बदल जायेगी। एक समय में एक ही बात, स्थान, वस्तु, तत्व के ऊपर विचार करने का अभ्यास कीजिए। प्रारंभ में शुष्क तथा नीरस वस्तु के ऊपर चित्त को एकाग्र करना कठिन प्रतीत होता है। कालान्तर में मन स्वयं एक तत्व पर लगने लगता है।
(5) मौन का महत्व :-
चंचलता दूर करने के लिए चुप रहना, वाणी का उपवास बड़े महत्व का है। इसके द्वारा हम अपनी आत्मा और विश्व के वास्तविक स्वत्व को पहचानने में सफल हो सकते हैं। वास्तविक एकाग्रता कोलाहल पूर्व वातावरण में नहीं, शान्त और मौन वातावरण में ही हो सकती है।

