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Magazine - Year 1950 - Version 2

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नारी जाति के उत्थान की आवश्यकता।

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(श्री अगर चन्द जी नाहटा, बीकानेर)

नारी शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि की जननी है। भूमि के बिना बीज की कोई उपयोगिता नहीं, इसी प्रकार पुरुष रूप बीज नारी रूप भूमि के बिना व्यर्थ सा है। फल प्राप्ति के लिए दोनों का सबल, स्वस्थ, एवं समान योग्य होना नितान्त आवश्यक है। परन्तु आज के भारतीय पुरुष-समाज के साथ नारी की तुलना करने पर वह जोड़ी समान प्रतीत नहीं होती। इसका कारण वर्षों से पुरुषों का समाज में अत्यधिक महत्व रहा है, इससे नारी अपेक्षित नहीं, यही प्रतीत होता है। नारी में शक्ति की कमी नहीं, परन्तु वह पराश्रित रहने के कारण अपना वास्तविक गौरव भुलाये बैठी है। इसी को पुनः जागृत करने की परमावश्यकता है।

त्यागी महात्माओं की बात जाने दीजिए पर साधारण गृहस्थ समाज में, सुखी जीवन-यापन में नारी का बड़ा भारी हाथ रहता है। योग्य-नारी के आगमन से घर चमक उठता है। और अयोग्य-नारी के उपस्थित होने पर वह कलह एवं अशान्ति का अखाड़ा बन जाता है। साधारणतः प्रत्येक स्त्री पुरुष की योग्यता एवं विचारों में तारतम्य रहता ही है। पर वह इतना अधिक हो जाय कि बात-बात में एक दूसरे से अनबन बढ़ने लगे तो उस घर को लड़ाई का मैदान की समझना चाहिए। बहुत बार यह अनुभव हुआ है कि आज के वातावरण में पला हुआ युवक चाहता है कि स्त्री नवीन सभ्यता के ढाँचे में ढल जाए, पर पत्नी वैसे वातावरण में न पलने व शिक्षित न होने के कारण उस बात को पसन्द नहीं करती। अतः परस्पर में अनबन रहती है। कई व्यक्ति स्त्रियों के साथ जबरदस्ती भी करते हैं। उससे जबरन मनचाहा कार्य करवाया जाता है। करना तो उसे पड़ता ही है, पर उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। मन दुर्बल हो जाता है। आशाएँ और उत्साह विलीन हो जाते हैं। अतः दोनों के विचारों में साधारणतः समानता होनी जरूरी है। अन्यथा सारा जीवन क्लेश दायक और भार रूप हो जाता है। इसके लिए नारी जाति में शिक्षा के प्रचार की बहुत आवश्यकता है। जिससे वह स्वयं अपना भला बुरा सोच समझ सके और कर्तव्य निर्धारण कर सके।

शिक्षा की उपयोगिता जीवन के प्रत्येक पल में होने पर भी वर्तमान शिक्षा में सुधार की आवश्यकता प्रतीत होती है। आज की शिक्षित कन्याएं बड़ी फैशन प्रिय हो गई हैं अतः खर्च बहुत बढ़ जाता है वे घर वालों के प्रति अपना कर्तव्य भी बिसार देती हैं अतः जिस शिक्षा से वह सुगृहिणी बनें उसी की आवश्यकता है।

वर्तमान में हमारी मातृ-जाति बड़ी हीन दशा में देखी जाती है। इधर देश के बंटवारे और साम्प्रदायिकता के नग्न नृत्य से नारी जाति को जो महान यातनाएं भुगतनी पड़ी व पड़ रही हैं। उससे शिक्षा लेकर उसे शिक्षित एवं सबल बनाना परमावश्यक हो गया है। नारी की आशा तथा अवलम्बन सब पुरुषों पर ही निर्भर है। अतः हमारा कर्तव्य है कि उसके उत्थान में पूरा सहयोग देकर सही अर्धांगिनी होने की अधिकारिणी बनाएं। अन्याय और अत्याचार को रोक कर उसे समान स्थान दें। नारी जाति मातृ-स्थानीया होने से पूज्य है इसे कभी न भूलें, उसका उचित आदर करें।

साधारणतया हमारे यहाँ कन्या का जन्म पिता के लिये बड़ा दुखद समझा जाता है क्योंकि वह पराया घर बसाती है। उसके लिये वर ढूंढ़ने व विवाह करने में एवं उसे दहेज देने में बड़ा अर्थ व्यय करना पड़ता है। वास्तव में दहेज प्रथा समाज के लिए अभिशाप बन चुकी है। बिना वर के पिता को राजी किये कन्या का विवाह करना कठिन हो गया है अतः वर्तमान समाज व्यवस्था में सुधार करना परमावश्यक है। उसके पराये घर बसाने की बात कह कर अनादर करना सर्वदा अविचार पूर्ण है क्योंकि हमारे घर में पुत्र-वधु आती है वह पराये घर से आने पर भी हमारा घर बसाती है यह तो बराबरी का सौदा है। विधवा बहिनों के प्रति तो हमें अधिक सहानुभूति रखना चाहिए एवं उन्हें समाज सेवा के योग्य बनाने का प्रयत्न करना चाहिये वे चाहें तो समाज का बड़ा कल्याण कर सकती हैं।

हमारे बच्चों के भविष्य निर्माण में मातृ जाति का प्रधान हाथ रहता है इस दृष्टि से भी उनको योग्य बनाना हमारे समाज एवं देश को उन्नत बनाना है। बाल्यकाल के संस्कार माता द्वारा पड़ते हैं और जन्म भर उनका प्रभाव हमारे जीवन में रहता है अतः यदि संस्कारदात्री को ही विचार शील बना लिया जाय तो मूल के सुदृढ़ हो जाने पर फल फूल रूप हमारे बच्चों का जो कि भावी राष्ट्र के कर्णधार हैं आदर्श पुरुष होना अवश्यंभावी है। आशा है पुरुष समाज अपने ही हित का दीर्घ-दृष्टि से विचार कर नारी के उत्थान में पूर्ण सहयोग देगा।

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