शब्द की महान शक्ति
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प्रोफेसर डाबसन बहुधा कहा करते थे और अनेक विद्वानों का भी विश्वास है कि मनुष्य की प्राकृतिक और प्रारम्भिक बोली पद्य है, गद्य नहीं। इसके समर्थन रूप वे अपना अनुभव सिद्ध दृष्टान्त देते थे कि उन्होंने अनेक बार जर्मन भाषा की कविता फ्रेंच बालकों को और फ्रेंच भाषा की कविता जर्मन बालकों को सुनाई, तो उस भाषा का ज्ञान न होते हुए भी बालकों ने स्पष्ट रूप से बतला दिया कि कविता का तात्पर्य क्या था। इस दृष्टान्त के अंतर्गत पंचतत्वों की धारा बह रही है। मनुष्य मात्र का सम्बन्ध तत्वों से है और तात्विक धारायें चाहे किसी भी रीति से उत्पन्न की गई हों किन्तु अवश्य अपना प्रभाव दिखलाती हैं। पहिले यह देखना है कि वाक् शक्ति का पंचतत्वों से क्या संबन्ध है और तब यह अपने आप प्रकट हो जायगा कि कविता उच्चारण करने से किस प्रकार कविता का भाव समझ में आ जाता है।
विज्ञान बतलाता है कि ध्वनि एक प्रकार का कम्पन है। विविध प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करने के लिए कम्पन भी अनेक प्रकार के होने चाहिए। अनेक प्रकार के कंपन से आशय यह है कि एक मिनट या एक सेकेण्ड में भिन्न भिन्न संख्या के कम्पन होने चाहिये। यदि मोटी आवाज के लिए एक सेकेण्ड में 112 कम्पन होते हैं तो दूसरी आवाज के लिए इससे कम या अधिक कम्पन प्रति सैकिंड पैदा होना जरूरी है। कम्पन किसे कहते हैं? यह प्रत्यक्ष देखने के लिए एक ढोल पर डंका मारिए और ढोल की खाल को ध्यान से देखिए, खाल पर लहरें दौड़ती दीखेंगी। प्रति मिनट ऐसी लहरें कितनी पैदा होती हैं इसी पर ध्वनि का निर्माण अवलम्बित है। संगीत यन्त्रों का निरीक्षण करने पर आप को पता लगेगा कि यह कम्पन कभी हवा में पैदा किये जाते हैं, कभी तार में और कभी धातु की छोटी छोटी पत्तियों में, और इन कम्पनों की प्रति मिनट संख्या को बदलने के लिए सितार पर अंगुली चलाई जाती है, बाँसुरी के छेद बन्द किये जाते हैं इत्यादि।
हमारा कंठ भी संगीत यन्त्र से कम नहीं है और इसका निर्माण उन यन्त्रों से भी अधिक मनोरंजक है। इसका विशेष विवरण तो ध्वनि शास्त्र के आचार्यों का अथवा डाक्टरों का विषय है, किन्तु इतना बतलाये बिना तो काम भी नहीं चलेगा कि गला एक प्रकार की नली है जिसमें सितार अथवा वीणा के तार की भाँति दो मोटे तन्तु हैं जिनमें कम्पन उत्पन्न होता है। साधारणतया वे इतने नरम हैं कि इनमें किसी प्रकार का कम्पन उत्पन्न नहीं होता। किन्तु अपतत्व की धारा इन्हें कड़ा बना देती है और कम्पनशील भी कर देती है। कम्पन उत्पन्न करने वाली अपतत्व की धारायें केवल बाहर से ही नहीं आती हैं। वरन् आत्मा से भी मस्तिष्क में होती हुई आ सकती हैं और इस तरह से हम अपने विचार ध्वनि द्वारा प्रकट कर सकते हैं। संगीत यन्त्रों में अधिकतर आवाज गुँजाने के लिये एक पोला तूँबे के आकार का अथवा लम्बी हवा का बाक्स भी रहता है, हमारे मुँह और नाक का निर्माण उसी आधार पर है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि जब हमें खाँसी अथवा जुकाम हो जाता है तो हमारी ध्वनि भी विकृत हो जाती है मानो सितार का तुम्बा फूटा हो।
यह तो सच है कि ध्वनि का जन्मदाता अपतत्व ही है किन्तु दूसरे तत्वों की उपस्थिति ध्वनि को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। इस तरह से मनुष्य ने 49 भिन्न-2 स्वरों का अनुभव किया है। प्रथम सात स्वर हैं इनमें तीव्र और कोमल भी हैं, और एक एक स्वर के फिर भेद हैं। इन सब स्वरों से आठ राग बनते हैं, और एक एक भाग में अनेक रागनियां हैं। इस प्रकार ध्वनि के अगणित भेद हो गये हैं किन्तु ध्यान रहे इन सब का जन्म होता अपतत्व है। और उसकी शक्ति पर अथवा दूसरे तत्वों के मिश्रण पर भिन्न भिन्न ध्वनि का निर्माण अवलम्बित है।
प्रत्येक ध्वनि का तात्विक प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है। अनेक रोग इन प्रभावों से दूर किये जा सकते हैं और अच्छी वा बुरी प्रकृति भी बनाई जा सकती है। यदि कोई गीत अग्नि तत्व से रंगा हुआ है तो प्राण को वह लाल बना देगा। इसी प्रकार वायु नीला और सफेद, आकाश काला और पृथ्वी पीला रंग देती है। अग्नि से रंगा हुआ गीत गर्मी पैदा करता है, गुस्सा दिलाता है, नींद लाता है और भोजन पचाता है। आकाश से रंगा हुआ गीत डर पैदा करता है और भूलने की बान डालता है। गीतों द्वारा ऐसे ही प्रेम, शत्रुता, भक्ति, नीति और अनीति की ओर प्रेरणा होती है।
दूसरी ओर लीजिये। यदि हमारे उच्चारण किए हुए शब्द अग्नि से प्रभावित हैं तो इसकी गर्मी हमारे शरीर को जलायेगी, हमें दुबला और कमजोर बना देगी और अनेक रोग हमें आ दबायेंगे। यदि हमारे शब्द प्रेम, भक्ति, दया और नीति से भरे हुए हैं जिनसे सुनने वालों को प्रसन्नता सन्तोष होता है तो इन पृथ्वी और आपके प्रभाव से हम भी लोकप्रिय और सज्जन बन जायेंगे। वाक् शक्ति को सच्चे रास्ते पर रखना भी एक बड़े योगाभ्यास से कम नहीं है।

