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Magazine - Year 1952 - Version 2

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(1)गायत्री भारतीय धर्म की आधार शिला है। मनुष्य के लौकिक और परलौकिक जीवन को पूर्णतया आनन्द मय बना देने की शक्ति गायत्री में है। आत्म कल्याण का इससे बढ़ कर और कोई उपाय नहीं। गायत्री की अलौकिक विशेषताओं के कारण ही उसे भूलोक की कामधेनु, अमृत निर्झरिणी, ज्ञान गंगा, पारस मणि, तरण तारिणी, ब्रह्म ज्योति और ईश्वरीय वाणी कहा है। प्राचीन काल में हम इसी महाशक्ति के द्वारा जगद्गुरु चक्रवर्ती शासक और स्वर्ण सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे। आज हम इसी महाशक्ति से विमुख होकर दीन हीन बने हुए हैं। इस तथ्य को हमें भली प्रकार समझ लेना चाहिए।

(2) पश्चिम के देशों ने भौतिक विज्ञान की उन्नति करके संसार पर अपनी बहुमुखी प्रभुता स्थापित की है। चिर प्राचीन भारतीय अध्यात्म विज्ञान की शक्ति वर्तमान भौतिक विज्ञान की अपेक्षा असंख्य गुनी अधिक है। और उसी के द्वारा मनुष्य को सच्ची सुख शान्ति एवं पूर्णता की प्राप्ति हो सकती है। इस लुप्तप्राय ब्रह्म विद्या का पुनरुत्थान करना ही हमारे इस गायत्री मा अभियान का एक मात्र उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति में हाथ बटाना और भाग लेना प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का पवित्र कर्त्तव्य है।

(3) ‘अखण्ड ज्योति’ के तत्वावधान में अ. भा. गायत्री संस्था का जो संगठन है, वह देश भर की जागृत आत्माओं को एक सम्बन्ध सूत्र में बाँधने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस माध्यम द्वारा जो प्रयोग, अन्वेषण, तप, साधन तथा प्रशिक्षण का कार्य हो रहा है, उसके अब तक के छुटपुट परिणाम बहुत ही उत्साहवर्धक और आशाजनक रहे हैं। भविष्य बहुत ही उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि चिर प्राचीन भारतीय सूक्ष्म शक्ति विज्ञान एवं दर्शन के पुनरुत्थान में भगवान इस गायत्री संगठन को भी निमित्त बना रहे हैं। यह हम सब के लिए बड़ी ही प्रसन्नता की बात है।

(4) इस गायत्री संगठन द्वारा आत्म विद्या के प्रेमियों को समय-समय पर कुछ परामर्श दिये जाते हैं और कुछ कार्य सौंपे जाते हैं। संवत् 2009 के नववर्षारंभ में निम्न लिखित परामर्श इस मार्ग के पथिकों को दिये जा रहे हैं। इन की एक-एक पंक्ति को आवश्यक समझकर विशेष मनोयोग पूर्वक ध्यान दिया जाना चाहिए।

(5) नव वर्षारंभ की नवरात्रि चैत्र सुदी 1 बुधवार तदनुसार 26 मार्च से आरंभ होकर नवमी गुरुवार ता. 3 अप्रैल को समाप्त होंगी। गायत्री उपासना के लिए यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण समय है। इस समय में की हुई साधना अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसलिए इस वर्ष संध्या की ऋतु बेला में साधारण साधना की अपेक्षा कुछ न कुछ अधिक साधना करनी चाहिए।

(6) 9 दिन में 24 हजार का एक छोटा अनुष्ठान हो सकता है। प्रतिदिन 2667 मंत्र (25 मालाएं) जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। प्रायः 4 घन्टे में इतनी माला आसानी से जपी जा सकती हैं। यदि एक साथ इतने समय लगातार बैठना कठिन हो तो अधिकाँश भाग प्रातः काल पूरा करके शेष भाग सायंकाल को पूरा कर लेना चाहिए।

(7) जिन सज्जनों ने गायत्री उपासना के क्षेत्र में अब तक प्रवेश नहीं किया है, उनके लिए इस नवरात्रि से प्रारम्भ करना एक बहुत ही शुभ मुहूर्त है। जो लोग नियमित साधना न कर सकते हों वे सुविधा के समय मौन मानसिक जप कर सकते हैं थोड़ी सी साधना भी श्रद्धा बढ़ाती है और परीक्षा के लिए की हुई थोड़ा उपासना भी सन्तोषप्रद परिणाम उत्पन्न करती है।

(8) नव रात्रियों में जप ही चलता रहेगा। दशमी शुक्रवार 4 अप्रैल को साधना की समाप्ति होगी। उस दिन हवन करना चाहिए। ब्राह्मण या कन्याओं को भोजन, प्रसाद वितरण गायत्री साहित्य का दान आदि दक्षिणाओं के साथ अनुष्ठान को समाप्त कर देना चाहिए।

(9) इन नौ दिनों में जिससे जितनी तपश्चर्या बन पड़े उतना ही उत्तम है। (1) ब्रह्मचर्य (2) उपवास। यह दो तप प्रधान हैं। जो लोग केवल एक समय फलाहार पर नहीं रह सकते वे दो बार फल दूध ले सकते हैं। जिसके लिए यह भी कठिन है वे दोपहर को बिना नमक का एक अन्न से बना हुआ भोजन और शाम को दूध लेकर अपना उपवास चला सकते हैं।

(10) उपरोक्त दो प्रधान व्रतों के अतिरिक्त नवरात्रि में अन्य तितीक्षाएँ भी उत्तम हैं (1) भूमि शमन (2) चमड़े के जूतों का त्याग (3) शृंगार सामग्रियों का त्याग (4) पशुओं की सवारी का त्याग (5) अपना भोजन, जल, वस्त्र धोना, हजामत आदि शारीरिक कार्य स्वयं करना (6) प्रतिदिन कुछ समय मौन आदि संयम नियमों को भी यथासंभव पालन करने का प्रयत्न करना चाहिए।

(11) जो साधक अपनी नवरात्रि तपश्चर्या की पूर्व सूचना हमें दे देंगे, उनके साधन का संरक्षण, उनकी भूलों का परिमार्जन, आवश्यक पथ प्रदर्शन एवं तपश्चर्या का परिपोषण हम करते रहेंगे।

(12) नव रात्रियों में हमारा केवल जल के आधार पर पूर्ण निराहार व्रत होता है और उन दिनों हमारा अधिकाँश समय एकान्त में व्यतीत होता है। इसलिए उन दिनों कोई सज्जन मथुरा हमसे मिलने न आयें। उन दिनों केवल अत्यन्त आवश्यक पत्रों के ही उत्तर दिये जा सकेंगे।

(13) नवरात्रि में गायत्री तपश्चर्या की उष्णता से कच्चे सद्विचार पकते हैं, पाप एवं कुसंस्कार नष्ट होते हैं, आत्मबल एवं सतोगुण की वृद्धि होती है, शारीरिक एवं बौद्धिक शक्ति बढ़ती है तथा अन्य प्रकार के सत्य परिणाम उपलब्ध होते हैं। इसलिए नवरात्रि में गायत्री उपासना के लिए पाठकों से हमारा विशेष अनुरोध है। परीक्षा के रूप में इस ओर कदम बढ़ाने से सज्जनों को इससे आशा जनक सन्तोष मिलेगा।

(14) गायत्री उपासकों को यह जान कर बड़ी प्रसन्नता होगी कि सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ की प्रगति बहुत ही आशाजनक हो रही है। 125 करोड़ गायत्री महामंत्र का जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास, 125 हजार व्यक्तियों को गायत्री शिक्षण का जो महान संकल्प गत नवरात्रियों के अवसर पर माता की प्रत्यक्ष प्रेरणा से किया गया था, उसकी पूर्ति सैकड़ों ऋत्विजों द्वारा हो रही है।

(15) सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है। इतने विशाल संकल्प की कल्पना मात्र से मस्तक चकरा जाता है परन्तु उसकी पूर्ति के साधन माता स्वयं जुटा रही है। इस यज्ञ के पीछे प्रभु की प्रचण्ड प्रेरणा एवं महान योजना सन्निहित है। इसके सूक्ष्म परिणाम अत्यन्त ही महान होंगे। मनुष्य जाति की विश्वव्यापी कठिनाइयों का समाधान होने में इस महान यज्ञ द्वारा भारी सहायता मिलेगी। इस यज्ञ में भागीदार बनने के लिए सभी जागृत आत्माओं को हमारा सादर आमंत्रण है।

(16) प्रतीत होता है कि सहस्रांशु यज्ञ का 125 करोड़ जप, 125 लाख हवन, 125 हजार उपवास के संकल्प में से अधिकाँश भाग इसी वर्ष पूरा हो जायगा। किंतु 125 हजार (सवालक्ष) सज्जनों को गायत्री विद्या का समुचित ज्ञान करने वाला भाग बहुत पीछे है। यह ब्रह्मसंदीप भी यज्ञ का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है परन्तु यज्ञ के भागीदार ऋत्विजों ने इस ओर बहुत कम ध्यान दिया है। अब इस ओर भी पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। अन्यथा यज्ञ की पूर्णाहुति न हो सकेगी।

(17) ब्रह्मसंदीप के लिए गायत्री पुस्तकालयों की स्थापना आवश्यक है। गायत्री की 17 पुस्तकों का पूरा सैट 21) मात्र का है। जो सज्जन इतना भी खर्च नहीं कर सकते वे छोटी 10 पुस्तकें 3।॥) की ही मँगा लें। इतने मात्र से ही गायत्री पुस्तकालय स्थापित हो जाता है इन पुस्तकों को स्वयं पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना, प्रत्येक गायत्री उपवास का परम पावन कर्त्तव्य है। जैसे बिना आयुर्वेद पढ़े कोई व्यक्ति वैद्य नहीं बन सकता वैसे ही गायत्री साहित्य पढ़े बिना कोई व्यक्ति गायत्री महाशक्ति का पूरा रहस्य उपयोग विधान, और साधन नहीं जान सकता। जिन सज्जनों के गायत्री पुस्तकालय अभी तक अधूरे हैं उनसे प्रार्थना है कि आगामी नवरात्रि तक उन्हें पूरे कर लें और यथा सम्भव नये पुस्तकालय स्थापित करावें जिससे गायत्री प्रचार की अमर बेल अपनी शाखा प्रशाखाओं सहित फले फूले और सहस्रांशु यज्ञ का एक महत्वपूर्ण भाग अधूरा रहने का गतिरोध न रहे।

(18) आगामी गायत्री जयन्ती जेठ सुदी 10 (गंगा दशहरा) 3 जून को है। इस पुण्य अवसर पर 24 लक्ष हस्तलिखित गायत्री मन्त्रों की श्रद्धाँजलि माता के चरणों में अर्पित की जायगी। उस पुण्य योजना में प्रत्येक साधक को भाग लेना चाहिये। कापी साइज में सफेद कागज पर प्रतिदिन 24 मन्त्र लिखते रहा जाय तो उस पुण्य पर्व तक 2400 मन्त्र लिखे जा सकते हैं। जो इससे न्यूनाधिक लिख सकें वे वैसा करें। लेखन प्रारम्भ करते समय सबसे प्रथम अपना पूरा नाम और पता लिख कर क्रमाँक (सिलसिले का नम्बर) डालते हुए मन्त्र लिखने चाहिए जिससे गणना में सुविधा रहे। यह मन्त्र 3 जून से पूर्व मथुरा पहुँच जाने चाहिये। यदि साथ में कोई पत्र न हो तो खुले मुँह के बुक पोस्ट द्वारा तीन पैसे का टिकट लगाकर उन्हें भेजा जा सकता है। यह हस्तलिखित मंत्र गायत्री संस्था में चिरकाल तक सुरक्षित रहेंगे और उनका प्रदर्शन सदैव होता रहेगा इसलिए मंत्र सुन्दर लिपि में लिखने चाहिए।

(19) गत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 1 जुलाई का अखण्ड ज्योति का ‘गायत्री विशेषाँक’ निकलेगा उसमें गायत्री उपासना के ऐसे अनुभव रहेंगे जिनसे इस मार्ग के पथिकों का पथ-प्रदर्शन हो और उनके उत्साह एवं श्रद्धा-विश्वास में अभिवृद्धि हो। गायत्री उपासना से जिन सज्जनों को स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हों, या किन्हीं दूसरों को प्राप्त हुए लाभों का वृत्तांत विदित हो तो वह घटनाएँ सम्बन्धित व्यक्तियों का आधे शरीर का फोटो भी भेजने का प्रयत्न करना चाहिए। उस प्रकार के लेख यथासम्भव शीघ्र ही भेजने चाहिए ताकि फोटो ब्लॉक बनवाने और लेख संशोधन का कार्य समय पर पूरा हो सके।

(20) साधारणतया, साधना सम्बन्धी चमत्कारी अनुभव गुप्त रखें जाते हैं परन्तु सार्वजनिक हित, नये पथिकों का पथ-प्रदर्शन एवं माता की महिमा पुण्य प्रसार होने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में इस प्रकार के लेखों का प्रकाशन होने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जैसे कुपात्रों के सन्मुख उन्हें गुप्त रखना आवश्यक है वैसे ही सत्पात्रों के सन्मुख उन्हें प्रकट करना भी आवश्यक है। इसलिए गायत्री साधना के उत्साहपूर्वक अनुभवों को छिपाने की अपेक्षा प्रकाशित करना ही श्रेयस्कर समझ कर विशेषाँक के लिए अनुभव माँगे जा रहे हैं।

(21) “अखण्ड-ज्योति” में हर महीने गायत्री सम्बन्धी महत्वपूर्ण लेख और सूचनाएँ रहती हैं। माता का एक चित्र भी रहने लगा है। हर वर्ष गायत्री विशेषाँक निकलता है। इस प्रकार गायत्री उपासकों के लिए यह पत्रिका उनके लिए अत्यंत उपयोगी पथ-प्रदर्शक है। मूल्य के सस्तेपन और लेखों की उत्कृष्टता की दृष्टि से वह अनुपम आध्यात्मिक भोजन है। इसलिए गायत्री उपासकों को उसका ग्राहक अवश्य रहना चाहिए। 2॥) वार्षिक में उनके लिए यह अलभ्य वस्तु है। गायत्री प्रचार की दृष्टि से भी अखण्ड-ज्योति का प्रचार करना आवश्यक है। अ. भा. गायत्री संगठन में बँधे रहने के लिए तो यह एकमात्र संगठन सूत्र है।

(22) गायत्री मन्दिर की उपयोगिता एवं आवश्यकता विज्ञ सज्जनों से छिपी नहीं है। प्रसन्नता की बात है, उसके लिए अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुरूप सहायताएँ भेजी भी हैं। अब मन्दिर निर्माण का कार्य शीघ्र ही आरम्भ होने वाला है। वस्तुओं की महंगाई के कारण छोटा स्थान बनाने में भी बहुत पैसा लग जाता है। इसलिए माता जिनके अन्तःकरण में प्रेरणा दें वे इस पुण्य प्रयोजन के लिये अधिक उदारता, अधिक प्रयत्न एवं अधिक श्रद्धा का परिचय दें ताकि यह अखिल भारतीय गायत्री तीर्थ बनने में अनावश्यक विलम्ब न हो।

(23) गायत्री साहित्य की जितनी भी पुस्तकें हैं उनकी बिक्री का लाभ गायत्री संस्था के संचालन एवं सहस्रांशु यज्ञ सम्बन्धी आयोजनों में लगता है। पुस्तकों के लाभ की एक-एक पाई गायत्री प्रयोजन में खर्च होती है। इसलिए इन पुस्तकों को स्वयं मँगाना या दूसरों को प्रेरणा देना अप्रत्यक्ष रूप से गायत्री संस्था की सहायता करना है।

(24) प्रत्येक गायत्री उपासक को यह भली भाँति समझ लेना चाहिये कि (1) गायत्री के अक्षरों में सन्निहित 24 शिक्षाओं के अनुपम अपनी जीवन नीति निर्धारित करना और (2) साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाना यह दोनों ही कार्य आवश्यक हैं। इनमें पहला कार्य सर्व प्रथम होना चाहिए, दूसरा कार्य उसके पीछे है।

नोट- जिन सज्जनों को इस ओर रुचि हो और जो इन सूचनाओं में से कुछ भी अनुगमन करने के लिये प्रयत्नशील हों वे अपनी तैयारी संबंधी पूर्ण सूचना नवरात्रि से पूर्व दे सकें तो बहुत ही उत्तम हो। जवाबी पत्र भेजने और पूरा नाम पता स्पष्ट अक्षरों में लिखने का भी अनुरोध है।

—श्रीराम शर्मा, आचार्य।

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