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Magazine - Year 1952 - Version 2

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विश्व शान्ति का मार्ग

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(स्वामी श्री शिवानन्दजी सरस्वती)

जब हम किसी वस्तु से प्रेम करते हैं तो क्या इसलिए कि हम उससे युक्त होने की इच्छा को प्रकट करते हैं? वास्तव में सिद्धान्त तो यह है कि हम वह वस्तु स्वयं बनना चाहते हैं। परमात्मा की पूजा उपासना के अंतर्गत यही भाव है कि हम विशुद्ध, पवित्र और पूर्ण बन जावें, जैसा कि परमात्मा का स्वरूप है—’वह भूमा है,जो सुख है, सो सुख अल्प है, उसमें आनन्द ही कैसे—अन्तः भूमा में ही सुख है और उसी की प्राप्ति करनी चाहिये। ईश्वर का आनन्दमय, दिव्य-स्वरूप हम पाना चाहते हैं तो हमें अवश्य तद्गुणात्मक ही हो जाना चाहिये।’

श्री राम ने कहा था—”जो कोई मेरी शरण में आता है और अभय याचना करता है उसे मैं निर्भय कर देता हूँ—यह मेरा वचन है”। परन्तु कोई भी व्यक्ति रामजी के उस आदर्श का प्रतीक तब तक नहीं बन सकता, जब तक वह उनके गुणों की भक्ति न करे, उनको स्वयं के-जीवन में ग्रहण न करे। भगवान तो दया, सरलता और बुद्धि की ज्वलन्त-छटा थे। हमने क्या उन गुणों को अपने जीवन में ओत-प्रोत करने की चेष्टा की है। भगवान राम की पूजा का अर्थ, सच्चे शब्दों में उनकी सरलता, पवित्रता, सहिष्णुता और सद्चरित्र को हृदयंगम करना है।

भगवान् का नियम था कि सत्य मार्ग में कोई आपत्ति आ भी जाये तो सत्य से विचलित न होना। अपने-अपने स्वजनों का माया-मोह भी हमारे आदर्श को डगमगा न पावे, क्योंकि सत्य का शासन एक है, और वह है न्यायपरायणता।

जो राम के निकट प्रेम के उपहार समर्पण करता है, उसका हृदय विशाल, भावना पवित्र, स्वभाव सरल, विचार आदर्श और कर्म वासनारहित हो जाते हैं। वह राम-रूप-धर्म का प्रतिनिधि हो जाता है और शक्ति और विद्वत्ता का भी। राम का नाम तो अज्ञान, कामना और पाप के समूल को दग्ध कर देता है। ज्ञान हो या न हो, विधि या अविधिपूर्वक, रामनाम का उच्चारण करने से भक्त अमर और शान्ति को पाता और उसकी वर्षा चारों ओर करता रहता है।

योगक्षेम का उत्तरदायित्व भी उसके कन्धों पर छोड़ना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि हम महान है और योग सम्पन्न हैं। योग, जप, तप, व्रतादि-नियम भी बिना राम के निःसार में रमते हैं। राम का आदर्श परिपालन करना यही है कि हम उनके समान पवित्र-आचरण को अपने जीवन का दैनिक-अंग बनावें।

राम कोई महात्मा ही नहीं समझे जाने चाहिये और न कोई जीवकोटि से विकास को प्राप्त हुये महापुरुष ही। वे साक्षात विश्व के नियन्ता हैं। भक्त का राम दशरथ का ही पुत्र नहीं, अयोध्या का ही राजा नहीं, परंतु सर्वव्यापी राम है, परमात्मा और विभु राम है।

राम ने ही तो दस-विषयोन्मुखी इंद्रियों वाले राक्षस-मन का संहार किया था। अतः वे हमारे जीवन की परम-शक्ति हैं, उनकी पूजा विराट की पूजा ही है, क्योंकि वे स्वयं विराट-आत्मा थे। श्री रामजी की भक्ति एक साधारण मनोवृत्ति नहीं, जैसा कि आजकल के रँगे हुए मानव वर्ग का मत है। मैं निःसंकोच होकर कहना चाहता हूँ कि राम की भक्ति तीक्ष्ण-वैराग्य और सात्विक भाव के उदय होने का लक्षण है। हमको, अतः जो सात्विक-गुण श्रीराम के जीवन चरित्र में मिलते हैं, उनको ग्रहण करना चाहिए। यदि ऐसा न हुआ तो हम आवेश में आकर, थोड़े ही समय के उपरान्त उस महिमा को भूल जायेंगे। भगवद्भक्ति का तो यही दर्शन है कि मनुष्य जो भक्ति करता है, संयमी हो और सर्व शुद्ध आचारवान हो। उसके अनन्तर में सच्चा वैराग्य हो, जो कालान्तर में उसकी भक्ति को परिपक्व करेगा।

जब संसार की वस्तुओं से अत्यंत अनासक्ति हो जाती है, तब परमसिद्धि की प्राप्ति संभव होती है। अतः सर्वप्रथम इंद्रिय निग्रह ही शास्त्रीय भक्ति है। मन की कामनाओं को क्षत-विक्षत कर; ईश्वर का स्मरण करो। कष्ट भी आ जाये तो अपने पथ से विचलित नहीं होना। कष्ट ही हमारे जीवन पथ के कंटकों का निवारण करते हैं वे ही हमारी दृष्टि में अंजन का प्रलेप करते हैं। दुःख ही में तो भगवान स्मरण आते हैं उनकी भक्ति की भावना का श्रीगणेश होता है और आत्मदर्शन द्वारा दुःख निवृत्ति की चेष्टा का सूत्रपात होता है।

आज भी विश्व ‘शाँति-शाँति’ चिल्ला रहा है। परंतु इसका मूल्य ही क्या है? ‘बबूल का अंकुर और आम के लिए चिल्लाना’ कहाँ तक हास्यास्पद नहीं है। न सदाचार, न तप, न ज्ञान, न सात्विकता न धर्म और न कोई नियम केवल मात्र अपनी-अपनी ख्याति के लिए शाँति-शाँति का गंर्दब राग अलापते हैं। हमारे देश के वे महात्मा, जिन्होंने अहोरात्र भगवान के चरणों में अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया, वे ही शाँति के सच्चे नेता हो पाये और होते रहेंगे, क्योंकि उन्होंने श्री राम के आदर्श को अपने में हृदयंगम कर तदनुसार अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को आमंत्रित किया और वे अक्षरशः विश्वशाँति के लिए अपना उपहार दे पाये।

यदि आज भी मानव समाज विपरीत-पथ को त्याग कर हमारे आदर्श की चरण रजों का अनुसरण करे तो शाँति की तो कोई बात ही क्या—विश्व का दुरूह कार्य भी क्षणार्द्ध में सम्पन्न हो सकता है क्योंकि शाँति तो अपने अंदर ही है और उसकी खोज करने के लिए बारह देखना असफलता का प्रथम संकेत हैं। तब जो लोग शाँति के लिए बाहर की ओर भाग रहे हैं, वे असफलता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं पा सकेंगे। हमारा आश्वासन यही है कि वे लोग यदि श्री राम के समान आचरण करना प्रारम्भ कर दें और उनके जीवन के प्रत्येक आदर्श को अंगीकार करें तो हमारा मानव मण्डल समृद्ध और एक सूत्राबद्धित हो सकेगा और एक हृदयात्मवान हो पायेगा।

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