गंगा और गायत्री
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संसार को तारने के लिए जब से जिसे गंगाजी इस प्रत्यक्ष जगत में हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में जीवात्मा का निस्तार करने वाली ज्ञान गंगा—गायत्री है। वृहन्नारदीय पुराण के अध्याय 6 में गंगा और गायत्री को लोक-परलोक के लिये परम कल्याण कारक बताया गया है देखिए—
गायत्री जान्हवी चो भे सर्वपाप हरेस्मृते।
एतयोर्भक्ति हीनोय स्तं विद्यात्पतितं द्विजाः॥60॥
हे द्विजों! गायत्री और गंगाजी ये दोनों सब पाप हरने वाली हैं। इनकी भक्ति से जो हीन है उसको पतित जानो।
गायत्री छन्दसाँ माता माता लोकस्य जाह्नवी।
उभेते सर्वपापानाँ नाशकारणताँ गते॥61॥
गायत्री वेदों की माता और लोक माता गंगाजी हैं ये दोनों सब पापों के नाश करने वाली हैं।
यस्य प्रसन्ना गायत्री तस्य गंगा प्रसीदति।
विष्णु शक्ति युतेतेच सर्व कामार्थ सिद्धदे ॥62॥
जिस पर गायत्री प्रसन्न हैं, जिस पर गंगा जी प्रसन्न हैं। ये दोनों विष्णु शक्ति सहित सब काम अर्थ देने वाली हैं।
धर्मार्थ काम मोक्षाणाँ फलरूपे निरंजने।
सर्व लोकानुग्रहार्थ प्रवर्तते महोत्तमे॥63॥
धर्म, अर्थ,काम, मोक्ष इनके फलरूप हुई ये दोनों (गंगा-गायत्री) सब लोक के अनुग्रह (कृपा) के अर्थ वर्तमान हैं।
अतीव दुर्लभानृणाँ गायत्री जाह्नवी तथा।
तथैव तुलसी भक्ति हरि भक्ति श्च सात्विकी॥64॥
गायत्री और गंगाजी मनुष्यों को अत्यन्त ही दुर्लभ हैं वैसे ही तुलसी की भक्ति और सत्व गुण वाली विष्णु भक्ति है।

