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Magazine - Year 1957 - Version 2

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प्रार्थना द्वारा अपना अभीष्ट सिद्ध कीजिए।

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(एक भक्त)

परमपिता परमात्मा की प्रार्थना इस संसार रूपी समुद्र में मनुष्य का सबसे बड़ा आश्रय है। इसके द्वारा हमारे मन में एक महान शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और उसके द्वारा हम बड़े-बड़े कठिन जान पड़ने वाले कामों को सहज में पूरा कर डालते हैं।

ईश प्रार्थना की प्रणाली केवल हिंदू धर्म अथवा भारत वर्ष की ही वस्तु नहीं है, वरन् सभी धर्मों और देशों के महापुरुषों ने इसका विधान किया है और इसे कष्टों तथा आपत्तियों से बचने का सर्वप्रधान साधन माना है। ईसाइयों में प्रार्थना का बड़ा महत्व है और कोई धार्मिक ईसाई प्रतिदिन बिना प्रार्थना किये नहीं रहता। मुसलमानों की नमाज भी ईश प्रार्थना के सिवा और कुछ नहीं और उनके ऊँचे दर्जे के फकीर रात-रात भर जागकर प्रार्थना करते रहते हैं। बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी सभी धर्मों में प्रार्थना का महत्व स्वीकार किया गया है। प्रार्थना किस प्रकार करनी अधिक उत्तम है और किस विधि से उसका प्रभाव शीघ्र ज्ञात हो सकता है इस संबंध में भगवत् भक्तों ने बहुत कुछ कहा है, उनमें से कुछ की चर्चा यहाँ की जाती है।

1- भगवान से हम जिस बात की या जिस वस्तु की प्रार्थना करते हैं उसकी तीव्र चाह हमारे मन में हो। यदि उस वस्तु के बिना हमारा काम अन्य किसी वस्तु से चल जाता दीखता हो तो समझना चाहिए कि उसकी तीव्र हमारे मन में नहीं है।

2- प्रार्थना के समय पूर्ण धैर्य की आवश्यकता है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद यह ख्याल करते रहना कि अभी फल प्रकट हुआ कि नहीं, अविश्वास का परिचायक है। बीज बोकर जल से सींचकर फिर तुरंत ही उसे उखाड़ कर देखा नहीं जाता कि बीज में अंकुर निकलने लगा या नहीं।

3- प्रार्थना का तार टूटना नहीं चाहिए। फल प्रकट होने तक यथासाध्य अनवरत प्रार्थना चलती रहे।

4- यह पक्का विश्वास मन में बना रहे कि प्रभु यहीं है और वे अवश्य हमारी प्रार्थना स्वीकार करके यह वस्तु हमको देंगे। जो कोई भी उनके सामने किसी वस्तु के लिए उपस्थित होता है उसे वे अवश्य उसकी माँगी वस्तु देते हैं। इसलिए हमें भी अवश्य देंगे।

5- किंतु प्रार्थना के समय प्रभु के सामने उस वस्तु का रोना रोने की आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना का रूप होना चाहिए, प्रभु के हृदय का मिलन, हृदय का एकीकरण प्रभु के रूप में तन्मयता। साराँश यह है कि हम जो वस्तु चाहते हैं उसके अभाव की ओर से मन को हटाकर वह वस्तु जिन प्रभु में वर्तमान है, उनका ध्यान करें। बजाय कि इसके कि हम इस बात का ध्यान करें कि ‘अमुक वस्तु नहीं है’ हम यह विचारते रहें कि हमारी चाही हुई वस्तु पूर्ण रूप से मौजूद है और वह हमको मिलेगी।

6- यह भी विचार करना चाहिए कि हम भी विश्व सृष्टा प्रभु के ही एक अंश हैं। तो वह वस्तु जिस प्रकार प्रभु में वर्तमान है उसी प्रकार हमारे अंदर भी मौजूद है। इसलिए हम भी चिंतन के द्वारा अपने लिए उस वस्तु का निर्माण कर सकते हैं। यह नियम है कि हमारे प्रत्येक विचार मन में उत्पन्न होने पर बाहर भी वैसा ही रूप धारण करते हैं। इसलिए हम प्रार्थना के समय यदि वस्तु के अभाव का अपनी दीनता का विचार करते रहेंगे तो इसका परिणाम आशाजनक नहीं हो सकता। इसके विपरीत प्रार्थना के समय हमको इस प्रकार के भाव रखने चाहिए। “हमें तो सब कुछ प्राप्त है, हमारा सब कुछ सुँदर है नाथ!” तुम्हारी कृपा से मैं बराबर सफल होता जा रहा हूँ। ऐसे विचारों से हमारा प्रभु से संयोग होता जाता है और करुणा सागर भगवान की तरफ से जो कृपा की लहरें हमारी ओर आती रहती हैं उनसे प्रतिकूल परिस्थितियाँ मिटने लगती हैं और हम अपने अभीष्ट के निकट पहुँचने लग जाते हैं।

7- प्रार्थना के पूर्व हमें यह भी विचार कर लेना चाहिए कि जिस वस्तु को हम माँग रहे हैं वह किसी दूसरे व्यक्ति के हित की विरोधी तो नहीं है। मान लो कि यह इच्छा उत्पन्न हुई है कि “हमारे अमुक शत्रु का विनाश हो जाय” और इस इच्छा की पूर्ति के लिए हम भगवान से प्रार्थना करने लगे तो इसकी पूर्ति के लिए भगवान का आश्रय मिल सकना असंभव है। प्रभु में किसी के प्रति शत्रुता अथवा द्वेष की कल्पना ही नहीं की जा सकती। उनकी दृष्टि में कोई भी पराया नहीं है। फिर वे द्वेष किससे करें? इसलिए किसी का अहित चाहने की प्रार्थना पर प्रभु कभी ध्यान नहीं दे सकते। अतः कभी हमारे मन में किसी के प्रति विरोध का भाव उत्पन्न भी हो तो उसको अन्य प्रकार से प्रकट करना चाहिए। हमको भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा यह विरोधी तो हमसे शत्रुता रखता है, उसका हृदय विशुद्ध हो जाय और वह हमसे प्रेम करने लगे।” ऐसा करने से उस प्रार्थना का परिणाम शुभ हो सकता है।

8- मन से यह धारणा निकाल देनी चाहिए कि भगवान हमारी प्रार्थना से दबकर (जैसे खुशामद से साँसारिक अधिकारी प्रसन्न हो जाते हैं) हमारा उद्देश्य पूरा कर देंगे। प्रभु का मंगलमय विधान तो निश्चित है। वह अनादिकाल से एक निश्चित क्रम से चल रहा है। वे इससे हेर-फेर नहीं करते। हाँ इतना अवश्य है कि जब वे हम पर कृपालु होते हैं तो हमारी मति को बदलकर सत्य और न्यायानुकूल मार्ग पर ला देते हैं।

9- प्रार्थना से पूर्व कुछ देर तक अपनी इच्छित वस्तु का प्रसन्नता पूर्वक स्मरण करते रहें और अपनी हृदय की भाषा में भगवान से उस संबंध में प्रार्थना करें। किसी के द्वारा सिखाई गयी भाषा में प्रायः कुछ कृत्रिमता आ जाती है, जिससे प्रभु के साथ संयोग होने में देर लगती है। इसलिए अपनी स्वाभाविक भाषा का प्रयोग करना ही उचित है।

10- हमें अपनी इच्छापूर्ति की अवधि और उसके ढंग के संबंध में कुछ न कहना चाहिए। हमारी इच्छित वस्तु कब मिलेगी और किस प्रकार मिलेगी इसे सर्वथा प्रभु की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए।

11- जहाँ तक अधिक से अधिक संभव हो, हम प्रार्थना करते रहें, पर यह बात प्रभु के अतिरिक्त और किसी पर प्रकट होनी उचित नहीं।

अगर हम इस विधि से प्रार्थना करेंगे तो हमको उसका परिणाम शीघ्र ही दिखलाई पड़ने लगेगा। इतना ही नहीं हमारे हृदय, मन, प्राण में प्रभु की दिव्य ज्योति भरने लगेगी। तब हम प्रार्थना के असली स्वरूप भगवत् प्रेम के निकट पहुँच जायेंगे और सब विषयों से मन को हटाकर प्रभु की प्राप्ति के लिए ही प्रार्थना करने लगेंगे।

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