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Magazine - Year 1957 - Version 2

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नित्य प्रति के व्यवहार में असत्य का प्रयोग

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(श्री कृष्णदास जाजू)

इस लेख का शीर्षक कुछ विलक्षण है। ‘सूक्ष्म असत्य’ शब्द मुझे महात्मा गाँधी जी से मिला है। मैं चाहता हूँ कि यह शब्द चल पड़े। एक भाई दूसरों से अपने हाथ-पैर दबवाया करते थे, जो उचित नहीं था। पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरी इच्छा न होते हुये भी मेरे हाथ पैर दबाये जाते हैं। महात्मा जी ने कहा कि “इन भाई के ध्यान में यह बात नहीं आई कि यह बात कहते हुये सूक्ष्म असत्य हो रहा है। अगर इच्छा न हो तो रोज-रोज हाथ पैर कैसे दबाये जा सकते हैं? दृढ़ता-पूर्वक एक बार मना करने पर दबाना बन्द हो ही जाता।”

असत्य के पीछे ‘सूक्ष्म’ विशेषण लगने से यह ख्याल होना स्वाभाविक है कि असत्य सूक्ष्म और स्थूल दो प्रकार का हो सकता है। क्या सचमुच असत्य के ऐसे कुछ भेद हैं या वे किये जा सकते है? असत्य व्यवहार करने वाले की दृष्टि से तो कोई भेद नहीं दीखता, फिर भी ऐसे कुछ उदाहरण हो सकते हैं जब कि व्यक्ति को स्वयं पता नहीं चलता कि मैं असत्य कर रहा हूँ या नहीं। मनुष्य में अपूर्णता है, अज्ञान है, कई, बातों में उसका ज्ञान अधूरा है, गलतफहमी भी रहती है, और वह सदा सावधानीपूर्वक सोचता भी नहीं। हर बात में सूक्ष्मता और स्थूलता रहती ही है। विशेष कर मन की प्रक्रियाएँ सूक्ष्म होती हैं। जहाँ तक हमारी दृष्टि स्थूल है, हम मोटे-मोटे दोष ही देख सकते हैं। उतना हो जाने पर बाद में दीखता है कि अन्दर छिपे हुये कितने ही सूक्ष्म दोष पड़े हैं।

सूक्ष्म असत्य की व्याख्या करना बड़ा कठिन है। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि मैं जिसे सत्य समझता हूँ, हो सकता हैं कि वह असत्य ही हो और जिसे हम असत्य समझते हैं उसे मैं असत्य न समझता होऊँ। किसी बात को मैं तो जानता हूँ कि असत्य है लेकिन दूसरे नहीं जान सकते या दूसरों से छिपाने की कोशिश करता हूँ। कोई बात सचमुच असत्य माना ही नहीं जाता, इसलिये उसमें कोई दोष नहीं दीखता। किसी की विशेष हानि नहीं है, ऐसा समझ कर भी असत्य कह दिया जाता है। जहाँ पैसे-टके का या व्यवहार का सम्बन्ध नहीं आता केवल दिल बहलाव के लिये किया जाता है, या बड़े-बड़े प्रतिष्ठित लोग भी वैसा करते हैं, इस असत्य को भी प्रतिष्ठ मिल जाती है। इस तरह सूक्ष्म असत्य अनेक प्रकार का हो सकता है जिसके कुछ उदाहरण हम यहाँ देते हैं।

1. कई बार हम बिना कारण ही असत्य करते रहते हैं। जिसका शायद हमें भान ही नहीं हो या जिसमें हमें दोष नहीं दीख पड़ता। दूसरों की नजर में हम जैसे हैं उसकी अपेक्षा अधिक अच्छे दिखें, इस निमित्त से हमारी बोल-चाल और अनेक काम ऐसे रहते हैं, जिनमें न्यूनाधिक असत्य और दिखावा रहता है। बहुत बार स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि हमारे व्यवहार में असलियत न रहकर कृत्रिमता आ जाती है। यह बात नहीं कि इसमें कोई विशेष हानि-लाभ है। फिर भी स्वाभाविकता और कृत्रिमता में जो फर्क है, वह तो है ही।

2. खेल-कूद, हँसी मजाक में असत्य को स्थान देने से दोष नहीं माना जाता। इसमें शायद इस बात का आधार मान लिया गया है कि किसी को नुकसान पहुँचाने का इरादा नहीं रहता है या कोई हानि-लाभ नहीं है। मोटे रूप में यह ठीक दीखता है। कानून की मर्यादा भी वहीं तक पहुँचती है। परन्तु कानून तो बाह्य आचरण का ही नियंत्रण कर सकता है। हमें तो अन्तःकरण की शुद्धि तक पहुँचना है। क्या हँसी-मजाक, खेल-कूद पूरी सचाई के साथ नहीं हो सकते? मन को पूरा आह्लाद देने लायक ऊँचे दर्जे का विनोद भी ठीक सचाई के साथ हो सकता है और वह हमारी सभ्यता और सुसंस्कृति की निशानी है।

3. बच्चों के साथ तो हम बहुत कुछ असत्य व्यवहार करते रहते हैं। एक प्रकार से हम ही उनको असत्य सिखाते रहते हैं। कभी-कभी बच्चा किसी चीज या बात का आग्रह कर लेता है। अगर उसे वह चीज न देनी हो या उसकी चाही बात न करनी हो, तो हम साफ-साफ कह सकते हैं कि ऐसा नहीं होगा। थोड़े ही समय में उनका आग्रह शान्त हो जाएगा। परन्तु अक्सर हम उसकी बात टालने के लिये, ‘आगे कभी करेंगे’ आदि कह कर कोई बहाना बना देते हैं। कुछ समय तक बालक हमारी बात पर भरोसा करता है, क्योंकि हम पर उसका पूरा विश्वास होता है। परन्तु धीरे-धीरे बालक जब देखता है कि उसको दिये हुये वचनों का पालन नहीं होता है, तो वह हमारी बात पर विश्वास करना छोड़ कर ज्यादा आग्रह करने लगता है। साथ-साथ वह यह भी सीख लेता है कि जब बुजुर्ग झूठी बात कह कर बहाना कर सकते हैं, तो मैं भी वैसा ही क्यों न करूं?

4. बालक बड़ा होकर स्कूल कालेज में पढ़ने के लिये जाता है। ये संस्थाएँ सरस्वती के मन्दिर हैं, उनमें अशुद्ध व्यवहार के लिये स्थान नहीं होना चाहिये। फिर भी वहाँ गड़बड़ी चलती रहती हैं। परीक्षाएँ पास करने की दौड़ में कई लोग अनेक बेजा उपायों का अवलम्बन करते हैं। गैरहाजिरी के चाहे जैसे कारण बताये जा सकते है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध व्यवहारिक सा हो गया है, आध्यात्मिक तो शायद ही पाया जायगा। जहाँ छात्रों को प्रवेश देने की संख्या नियत होती है, वहाँ नाम लिखाने के लिये अनेक प्रकार के असत्य व्यवहार किये जाते हैं।

5. आजकल प्रमाण-पत्र और सिफारिश पत्र का महत्व बहुत बढ़ गया है। व्यवहार में बहुत अपरिचित लोगों से काम लेना पड़ता है। प्रमाण किसी विशेष हेतु से नहीं दिया जाय, वह केवल व्यक्ति के गुण-दोष का निदर्शक होता है। सिफारिश पत्र इस विशेष हेतु से दिया जाता है कि उम्मीदवार को उससे कुछ लाभ मिल सके। स्वयं सिफारिश कुछ दोष है ही, क्योंकि जिस अधिकारी को नियुक्त करना पड़ता है उसके सामने अनेक उम्मीदवार होते हैं। गुण देखकर न्याय पूर्वक नौकरी देना उसका कर्तव्य है। अगर सिफारिश से वह प्रभावित होता है तो किसी न किसी दूसरे के प्रति अन्याय होता है। कुछ लोग तो खुद के परिचय के बिना ही मित्रों के कहने से या उम्मीदवार की याचना सुनकर प्रमाण-पत्र या सिफारिश पत्र दे देते हैं। वे सोचते हैं कि केवल अपने शब्द मात्र से किसी का भला होता हो तो क्यों न होने दिया जाय। इससे व्यवहार में शिथिलता आती है।

6. आलस के कारण भी सत्य का भंग होता है। जो काम जिस समय पर करना चाहिए उस समय न करने से बाद में उसके बारे में राय बदल जाती है। बदली हुई परिस्थिति में वह बात ठीक बैठती तो नहीं, पर बैठानी पड़ती है। कोई काम अधूरा रह जाय तो बाधा नहीं, आगे चलकर पूरा कर लेंगे, इस आशा में हम असावधान सध्य रह जाते हैं। बाद में जब झूठ कहे बिना बात नहीं पड़ सकती, तब बिना कारण और लाचार हम झूँठ कह देते हैं और यह समझ कर सन्तोष मान लेते हैं कि इसमें हमने सचमुच किसी को ठगा नहीं है या किसी को हानि नहीं पहुँचायी। असत्य कहना पड़ा, वह तो नाम मात्र का है।

7. अशुद्धि या सूक्ष्म व्यवहार का बड़ा क्षेत्र व्यवसायिक क्षेत्र है। उसमें भी हानि-लाभ को छोड़कर दूसरी अनेक बातें ऐसी हैं, जिसमें बिना कारण या मोह वश असत्य किया जाता है। हम अपनी होशियारी से चालाकी करते हैं परंतु दूसरा पक्ष वाला भी हमारी चालाकी पहचान सकता है। अपने माल की झूठी तारीफ करना तो क्षम्य ही माना जाता है। कम-ज्यादा मोल-तोल बताना मामूली बात हो गयी है। ग्राहक से भाव तय करने की झंझट में कितना समय बर्बाद होता है, इसका कोई हिसाब नहीं। दुकानदार और ग्राहक दोनों एक दूसरे को ठगने की कोशिश करते हैं। दोपहर के समय भी दुकान के सामने पर्दा डालकर और कृत्रिम अंधेरा बनाकर अंदर बिजली की रोशनी इसलिए की जाती है कि चीजों का रूप रंग अधिक आकर्षक दिखायी दे। झूठी विज्ञापन बाजी तो प्रसिद्ध ही है, अब उसे एक कला का रूप मिल गया है।

धर्म के नाम पर असत्य कम नहीं चल रहा है। धर्म का धंधा करने वालों की तो बात ही छोड़ दें। उनमें दूसरे व्यावहारिक धंधे वालों से असत्य कम नहीं होता। दुःख की बात यह है कि यह सब ईश्वर के नाम पर किया जाता है और भोले लोग खुद विवेक न रखकर अपनी खुशी से ठगी के शिकार बनते हैं।

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