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Magazine - Year 1957 - Version 2

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अद्वैतवाद या सर्वेश्वरवाद

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(श्री सी. जिनराजदास)

“यह सब कुछ ब्रह्म ही है” -यह अद्वैतवाद या सर्वेश्वरवाद है। यह सिद्धान्त किसी न किसी रूप में प्रायः सब धर्मों में पाया जाता है। जब हम वस्तु मात्र के मूलतत्व का विचार केवल निराकार निर्गुण रूप से नहीं परन्तु एक साकार सगुण ब्रह्म रूप से करते हैं तब प्रत्येक धर्म में यह तत्व दो रूप से व्यक्त होता है। इन्हें हम प्रभु के सर्वातीत और सर्वव्याप्त रूप के नाम से जानते हैं।

सर्वेश्वरवाद का बिलकुल स्पष्ट रूप हिन्दू धर्म में देखा जाता है। “श्वेताश्वेतर उपनिषद्” के नीचे लिखे मंत्र प्रभु के सर्वव्यापक स्वरूप के सिद्धान्त को स्पष्ट करते हैं। हिन्दू धर्म में यह स्वरूप सगुण ब्रह्म समूर्त ईश्वर की दिव्य सत्यता (रियलिटी)है:-

“यह देव सब दिशाओं में है, वह बहुत पूर्व जन्मा था, वह गर्भ में है, वह जन्म ले चुका है, वह जन्म लेवेगा, सब जन्मे हुओं के पीछे वह खड़ा है। वह सर्वतोमुख है।” (2-16)

“सब के मुँह, शिर और गरदन जिसके हैं, जो सब भूतों (जीवों) के गुहाशय में स्थित है, जो भगवान सर्वव्यापी है। इसलिये वह सर्व स्थित शिव (कल्याणकारी) है। (3-15)

वह ही अग्नि है, वह आदित्य है, वही वायु है, वह ही चन्द्रमा है, वही शुक्र, वही ब्रह्म, वही आप (जल), वही प्रजापति है। (4-2)

तू ही स्त्री, तू ही पुरुष, तू ही कुमार, तू ही कुमारी है। तू ही बूढ़ा होकर लाठी पकड़ कर चलता है और तू ही सब ओर मुख करके जन्म लेता है। (4-3)

नीली तितली, हरा पक्षी, लाल रंग का पशु, बिजली को गर्भ में धारण करने वाला बादल, जन्तु और सब समुद्र इन सब का अनादि रूप तू है। सर्वव्यापी शक्ति में तेरा घर है, जहाँ से सब भुवन और विश्व निकले हैं। (4-4)

इसी श्वेताश्वेतर उपनिषद् में नीचे लिखे श्लोक भी हैं जिनसे प्रकट हो जाता है कि हिन्दू विचारकों ने भगवान के सर्वातीत और सर्वव्यापक स्वरूपों का किस प्रकार समन्वय किया था-

“मैन उस आदित्यवर्ण अन्धकार के परे वाले पुरुष को जाना है, उसे जानकर मनुष्य मृत्यु से तर जाता है। जाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है। (3-8)

“जिससे बड़ा या छोटा कोई और नहीं है, जिस से अधिक सूक्ष्म या स्थूल और कोई नहीं है। जो वृक्ष के समान आकाश में स्तब्ध अकेला खड़ा रहता है, उस पुरुष से सर्वपूर्ण है।” (3-9)

“उसे न ऊपर से, न नीचे से, न बीच से कोई समझ सकता है, न उसकी कोई प्रतिमा है, जिसका नाम महत यश है। उसका रूप नजर के भीतर नहीं आता। कोई उसे आँख से नहीं देख सकता। जो इसे हृदय और मन की सहायता से हृदय में स्थित जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।” (4-19, 20)

“वही एक दस भुवन, विश्व के मध्य में आता जाता है। वही अग्नि है, वही जल में भी प्रविष्ट है उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता। दूसरा कोई मार्ग जाने को है ही नहीं।” (4-21)

बौद्ध धर्म एक प्रकार से निरीश्वरवादी है और इसलिये इसके सामान्य स्वरूप में हिन्दू धर्म का सा स्पष्ट सर्वेश्वरवाद नहीं पाया जाता। तो भी भगवान बुद्ध ने वस्तुमात्र का एक ही आधार माना है। इन्होंने इसे निर्वाण का नाम देकर इस प्रकार वर्णन किया है-

“भिक्षुओं! एक ऐसा स्थान है जहाँ न पृथ्वी है, न जल, न वायु है, न वहाँ आकाश का अनन्त जगत है। न वहाँ बुद्धि का अनन्त जगत है। न वह प्रत्यक्ष ज्ञान या संज्ञा का लोक है, न वहाँ असंज्ञा ही है, न वहाँ यह लोक है, न वहाँ दूसरा ही लोक है, न वहाँ सूर्य है न वहाँ चन्द्रमा है। हे भिक्षुओं! उसे मैं न आना कहता हूँ, न जाना, न खड़े रहना, न जन्म, न मृत्यु। वह बिना आधार का, बिना जन्म का, विचार से परे है। वह सत्य ही दुःख का नाश रूप है। हे भिक्षुओं! वह अजन्मा, अव्यक्त, असृष्ट और अमर्यादित है। यदि वह अजन्मा, अव्यक्त न होता तो इस जगत में जो जन्म लेता है, व्यक्त होता है, सृजा जाता है या मर्यादित होता है, उसका हम को भान भी नहीं होता।”

ईसाई धर्म में सर्वेश्वरवाद को सिद्धान्त रूप से नहीं मानते। इसका यह कारण भी है कि जिन धर्मों में प्रभु के सर्वातीत रूप पर जोर दिया जाता है उनमें उनके सर्वव्यापक रूप को ग्रहण करने में विरोध भाव उत्पन्न होता है। फिर भी ईसाई धर्म में बहुत से भावनोपयोगी सर्वेश्वरवादी हो गये हैं। प्रभु ‘ईसा के महावाक्य, नामक पुस्तक में उनका एक उद्गार इस प्रकार है:-

“पत्थर को उठाओ और वहाँ भी तू मुझे पावेगा। लकड़ी को फाड़ो और वहाँ भी मैं मौजूद हूँ।” आगे चल कर एक स्थान पर फिर कहा है--

“तुम पूछते हो कि वे कौन हैं जो ‘राज्य’ के निकट हमको पहुँचाते हैं, यदि वह राज्य स्वर्ग में है तो ?... वायुमंडल के सब पक्षी और सारे पशु जो पृथ्वी पर या पृथ्वी के भीतर रहते हैं और समुद्र की मछलियाँ ये सब हमें पहुँचाते हैं और स्वर्ग का राज्य तुम्हारे भीतर ही है। जो कोई अपने को पहचानेगा वह उसे पावेगा।”

सर्वेश्वरवाद का एक मनोहर रूप वह है जो सूफी धर्म में पाया जाता है। ईरान का भावना योगी कवि तायी कहता है--

“प्रकृति के प्रत्येक परमाणु को ईश्वर ने ऐसा दर्पण बनाया है जिससे उसके मुख की सुन्दरता झलकती है। गुलाब के फूल से उसकी सुन्दरता प्रकट होती है और बुलबुल पक्षी उस सुन्दरता को देख कर प्रेम से पागल बन जाता है। उसी अग्नि से दीपक की ज्योति में वह प्रकाश आया जो पतंग या परवाने को मोह में डालकर जला देता है। सूर्य पर जब उसका सौंदर्य चमका तो तुरंत ही पानी की लहर में कमल की कली निकल पड़ी।...... सावधान। ऐसा मत कहो कि वह परम सौंदर्य है और हम उसके प्रेमी हैं। तुम तो केवल दर्पण मात्र हो और दर्पण के सामने वही खड़ा है जिसकी छाया दर्पण पर पड़ती है। वही अकेला व्यक्त है और तू तो वास्तव में ढ़का है। वह दर्पण भी है। वह रत्नराशि और तिजोरी दोनों है। इसमें “मैं” और “तू” को स्थान नहीं है। ये तो केवल खाली मिथ्या छाया या आभास मात्र है।”

विज्ञान के आधुनिक काल में भी सर्वेश्वरवाद की गूँज इमर्सन आदि दार्शनिक के लेखों में मिलती है-

“इस मन या विश्वात्मा में प्रत्येक मनुष्य का जीवन समाया हुआ है और वह जीवन दूसरे सब के साथ एकत्व का अनुभव करता है। वही एक सर्वसामान्य हृदय है।......... मनुष्य के भीतर जो पूर्ण विश्वात्मा स्थित है वही प्रज्ञा पूर्ण मौन रूप है विश्व व्यापी सौंदर्य रूप है। प्रत्येक अंश और प्रत्येक कण का उस पूर्ण से पूरा संबंध है। वही सनातन है। इसमें द्रष्ट, दृश्य, दर्शन और चश्मा, अथवा आत्मा अनात्मा सब एक ही है।”

इस विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भारतीय उपनिषदों ने जिस अद्वैतवाद का प्रचार किया था उसका प्रभाव संसार के सभी धर्मों और देशों पर पड़ा। इससे मनुष्य को इस बात का ज्ञान हुआ कि इस विश्व में जो कुछ है सब ईश्वर के अस्तित्व के विभिन्न रूप ही हैं। इस जगत को ईश्वर ने ही रचा है और ईश्वर उस सब में व्याप्त है, और इस जगत से परे भी स्थित है।

(यह अद्वैत ज्ञान केवल दर्शन शास्त्र की ही बातें नहीं हैं। भक्त कवियों ने और विशेषतः गोस्वामी तुलसीदासजी ने इसको सर्वसाधारण के समझने योग्य विषय भी बना दिया है और सर्वव्यापी राम की भक्ति द्वारा अद्वैत की प्राप्ति का मार्ग दिखला दिया है। यही गीता के कर्म भोग का तात्पर्य है। धर्म के सभी जिज्ञासुओं का कर्तव्य है कि धर्म के इस तत्व को समझें और तदनुकूल आचरण करें। यही सच्चा मुक्ति मार्ग है।)

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