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Magazine - Year 1957 - Version 2

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सुखी होने का राजमार्ग

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(श्री मेहेर बाबा, नासिक)

संसार में प्रत्येक प्राणी सुख खोज रहा है। वैसे तो मनुष्य अनेक बातों की अभिलाषा किया करता है, पर उन सब का उद्देश्य सुख की प्राप्ति ही होती है। यदि वह सत्ता या शक्ति प्राप्त करने के लिए उत्कंठित दिखायी देता है तो इसका कारण यही है कि वह सत्ता का उपयोग करके सुख प्राप्त करना चाहता है। यदि धन पैदा करना चाहता है तो इसी विचार से कि धन के द्वारा सुख मिल सकेगा। यदि वह विद्या, स्वास्थ्य, सौंदर्य, विज्ञान, कला या साहित्य की साधना करता है तो इसका कारण यह है कि उसे यह जान पड़ता है कि इनके द्वारा सुख मिल सकेगा। यदि वह साँसारिक सफलता अथवा यश के लिए प्रयत्न करता है तो इसीलिए कि वह समझता है कि इसके द्वारा सुख उपलब्ध हो सकता है। साराँश यह है कि मनुष्य जितने भी उद्यम और उद्योग करता है उनका अंतिम लक्ष्य सुख की प्राप्ति ही होता है।

प्रत्येक व्यक्ति सुखी होना चाहता है किंतु अधिकाँश व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के दुख से पीड़ित हैं। यदि उन्हें कभी सुख प्राप्त होता है तो उसमें दुख भी मिला रहता है। मनुष्य को केवल सुख, अमिश्रित सुख, कभी नहीं मिलता। वह सुख और दुख के द्वन्द्व के बीच झूलता रहता है। मानव जीवन जैसा आज कल हो रहा है उसमें सुख के क्षण बहुत कम आते हैं और वे भी इंद्रधनुष के मनोहर रंगों की तरह शीघ्र ही लुप्त हो जाते हैं। यदि ये सुख के क्षण अपना कोई चिह्न छोड़ जाते हैं तो वह उनकी स्मृति होती है, जो उल्टा हमारे दुख की वृद्धि करती है।

मनुष्य दुख नहीं खोजता, किंतु जिस रीति से यह सुख खोजता है उससे उसे अनिवार्य रूप से दुःख भी मिलता है। वह अपनी इच्छाओं की तृप्ति द्वारा सुख प्राप्त करना चाहता है। किंतु इच्छाओं की तृप्ति कोई निश्चय वस्तु नहीं होती। अतः इच्छाओं की पूर्ति का प्रयत्न करने के साथ-साथ मनुष्य को उनकी अतृप्ति के लिए भी तैयार होना पड़ता है। इच्छा रूपी वृक्ष में दो प्रकार के फल लगते हैं। एक प्रकार का फल मीठा होता है जो सुख रूप है और दूसरा फल कड़वा होता है जो दुख रूप है। जो एक प्रकार का फल लेना चाहता है उसे दूसरे प्रकार के फल के लिए भी तैयार होना पड़ता है। मनुष्य अधीरतापूर्वक सुख खोजता है और जब वह उसे प्राप्त हो जाता है तो वह शौक से उसके साथ संलग्न हो जाता है और आगामी दुख को टालने की कोशिश करता है। पर सुख के बाद दुख अनिवार्य रूप से आता ही है और तब उसे बड़ी तीक्ष्ण वेदना सहन करनी पड़ती है।

अनेक प्रकार की इच्छाओं के आवेग से मनुष्य संसार में सुख की खोज करता है। परंतु कुछ समय बाद उसका सुख संबंधी उत्साह बदल जाता है। क्योंकि जब वह सुख से भरे पात्र की तरफ हाथ बढ़ाता है उस समय भी स्वभावतः उसे दुःख की घूँटें पीनी पड़ती हैं। सुखों के साथ भीतर जाने वाले दुःखों से उसका उत्साह फीका पड़ जाता है। वह प्रायः अकस्मात आने वाली मानसिक प्रवृत्तियों का शिकार होता रहता है। एक समय वह अपने को सुखी और गर्वित अनुभव करता है, दूसरे समय वह अत्यंत दुखी और अपमानित जान पड़ने लगता है। इच्छाओं के पूर्ण होने या खंडित होने के अनुसार उसके मन की स्थिति भी बदलती रहती है। किन्हीं-किन्हीं इच्छाओं की पूर्ति से उसे क्षणिक सुख प्राप्त होता है पर उस सुख के पश्चात ही उदासी की प्रतिक्रिया होने लगती है। इस प्रकार उसके मन की स्थिति में चढ़ाव-उतार होते रहते हैं और वह निरंतर विषमता का शिकार बनता है।

इच्छाओं की पूर्ति से इच्छाओं का अंत नहीं होता। इच्छाओं की पूर्ति होने से वे थोड़ी देर के लिए विलीन हो जाती हैं, पर कुछ ही समय बाद और भी प्रचण्ड वेग से प्रकट होने लगती हैं। मनुष्य को जब भूख लगती है तो वह इच्छा को संतुष्ट करने के लिए खाता है, किंतु थोड़ी ही देर बाद वह फिर भूखा हो जाता है। अगर स्वाद या लालच-वश वह अधिक खा लेता है तो अपनी इच्छा के फलस्वरूप उसे अजीर्ण, उदरशूल आदि के रूप में और भी दुःख सहन करना पड़ता है। यह बात संसार की सभी इच्छाओं पर लागू होती है। इससे इन इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त होने वाला सुख कम होने लगता है और अंत में बिल्कुल समाप्त ही हो जाता है।

इच्छा से उत्पन्न दुख का जब मनुष्य अनुभव करता है अथवा पहले से ही दुख का अनुमान कर लेता है तो उसकी इच्छा का दमन होता है। कभी-कभी तीव्र दुःख उसे संसार से विरक्त और अनासक्त बना देता है। किंतु इच्छाओं की बाढ़ साँसारिक वस्तुओं के प्रति उसकी इस अनासक्ति को प्रायः फिर से तोड़कर बहा देती है। ऐसी ही अस्थायी अनासक्ति को “श्मशान वैराग्य” के नाम से पुकारा जाता है।

कभी-कभी मन की यह अनासक्ति की स्थिति अधिक स्थायी होती है और काफी समय तक ठहरती है। अपने प्रियजनों की मृत्यु या धन नाश या यश नाश जैसी बड़ी विपत्तियों के आ जाने से प्रायः इस प्रकार का तीव्र वैराग्य उत्पन्न होता है। उस समय अनासक्ति की लहर के प्रभाव से संसार की सभी वस्तुओं की तरफ से रुचि हटा लेता है। इस प्रकार के तीव्र वैराग्य का एक विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। किंतु कुछ समय पश्चात यह वैराग्य भी लुप्त हो जाता है क्योंकि वह ज्ञान से उत्पन्न नहीं होता वरन् साँसारिक जीवन में प्राप्त होने वाली आपत्तियों से एक प्रतिक्रिया के रूप में उसकी उत्पत्ति होती है।

वैराग्य अथवा अनासक्ति की भावना उसी दशा में स्थायी और सच्ची होती है तब वह दुःख के स्वरूप तथा कारणों का ज्ञान होने से उत्पन्न होती है। अनासक्ति की इस भावना का आधार इस बात का ज्ञान होता है कि संसार की वस्तुएँ क्षणिक तथा नाशवान हैं, इसलिए वास्तविक सुख तभी प्राप्त हो सकता है जब कि मनुष्य के हृदय में वैराग्य अथवा अनासक्ति का भाव दृढ़ रूप से जम जाता है। ऐसा मनुष्य न तो सुख से चंचल होता है और न दुःख से विचलित होता है। जो व्यक्ति प्रिय वस्तुओं से प्रभावित होगा और सुख मानेगा उसका अप्रिय वस्तुओं से भी प्रभावित होना और दुख मानना अनिवार्य है।

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