सत्संग द्वारा आत्मोन्नति कीजिए।
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(श्री. मुन्नी देवी शर्मा, किशोरगढ़)
इस संसार में उन्नति करने-उत्थान के जितने भी साधन हैं ‘सत्संग‘ उन सबमें अधिक फलदायक और सुविधाजनक है। सत्संग का जितना गुणगान किया जाए थोड़ा है। पारस लोहे को सोना बना देता है। रामचंद्र जी के सत्संग से रीछ बानर भी पवित्र हो गये थे। कृष्ण जी के संग रहने से गाँव के गँवार समझे जाने वाले गोप गोपियाँ भक्त शिरोमणि बन गये।
सत्संग मनुष्यों का हो सकता है और पुस्तकों का भी। श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ उठना बैठना, बातचीत करना आदि और उत्तम पुस्तकों का अध्ययन सत्संग कहलाता है। मनुष्यों के सत्संग से जो लाभ होता है, वह पुस्तकों के सत्संग से भी संभव है। अंतर इतना है कि संतजनों के सत्संग का प्रभाव सजीवता के कारण शीघ्र पड़ता है।
आत्म संस्कार के लिये सत्संग से सरल और श्रेष्ठ साधन दूसरा नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट, बड़े-बड़े पापी, घोर दुराचारी, सज्जन और सच्चरित्र व्यक्ति के संपर्क में आकर सुधरे बिना नहीं रह सकते। सत्संग अपना ऐसा जादू डालता है कि मनुष्य की आत्मा अपने आप शुद्ध होने लगती है। महात्मा गाँधी के संपर्क में आकर न जाने कितनों का उद्धार हो गया था, कैसे-कैसे विलासी और फैशन-परस्त सच्चे जन सेवक और परोपकारी बन गये थे। पुस्तकों का सत्संग भी आत्म-संस्कार के लिए अच्छा साधन है। इस उद्देश्य के लिए महापुरुषों के जीवन चरित्र विशेष लाभप्रद होते हैं। उनके स्वाध्याय से मनुष्य सत्-कार्यों में प्रवृत्त होता है और जघन्य कार्यों से मुँह मोड़ता है। गोस्वामी जी की रामायण में राम का आदर्श जीवन पढ़कर न जाने कितनों ने कुमार्ग से अपना पैर हटा लिया। महाराणा प्रताप और महाराज शिवाजी की जीवनियों ने लाखों व्यक्तियों को देश सेवा का पाठ पढ़ाया है।
सत्संग मनुष्य के चरित्र निर्माण में बड़ा सहायक होता है। हम प्रायः देखते हैं कि जिन घरों के बच्चे छोटे दर्जे के नौकरों-चाकरों या अशिक्षित पड़ोसियों के संसर्ग में रहते हैं वे भी असभ्य और अशिष्ट बन जाते हैं। उनमें तरह-तरह के दोष उत्पन्न हो जाते हैं और उनमें से कितनों का ही समस्त जीवन बिगड़ जाता है। इसके विपरीत जो लोग अपने बच्चों की भली प्रकार देख-रेख रखते हैं, उनको भले आदमियों के पास ही उठने बैठने देते हैं, स्वयं भी उनसे भद्रोचित ढंग से बातचीत करते हैं उनके बच्चे सभ्य सुशील होते हैं, और उनकी बातचीत से सुनने वाले को प्रसन्नता होती है। इसलिए हमको सत्संग की आवश्यकता बड़ी आयु में ही नहीं है, वरन् आरंभ से ही है हमको इस विषय में सचेत रहना चाहिए और खराब व्यक्तियों का संग कभी नहीं करना चाहिए।
जीवन में सुख प्राप्ति के लिए सत्संग का बड़ा महत्व है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज में रहना चाहता है। जीवन यात्रा के लिए वह कुछ साथी चुन लेता है जिनके साथ रहकर अपने दिन काटता है। अगर उसने गलती से बुरे साथी चुन लिए तो उसका जीवन दुःखी हो जायेगा। या भाग्यवश श्रेष्ठ संगी मिल गये तो उसका जीवन और सुखी हो जायेगा। उनसे उसे सदा सहायता मिलेगी और वे उसे सदा हितकारी सम्मति देंगे।
तुलसीदास ने ठीक कहा है :-
तुलसी संगति साधु की, हरै और की व्याधि ।
ओछी गति क्रूर की, आठौ पहर उपाधि॥

