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Magazine - Year 1957 - Version 2

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गायत्री उपासना के अनुभव

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सरल साधना

श्री लालमणि शर्मा, हापुड़ (मेरठ) अपना निजी-अनुभव लिखते है :- गायत्री उपासना के पहले मैं मस्तिष्क प्राणायाम किया करता था। उससे स्वेद, कम्प आदि लक्षण प्रगट होने लगे थे। कभी मेरुदण्ड के ऊपर चींटी चलती सी मालूम पड़ती, शरीर सुन्न हो जाता, होश खोया सा लगता। मुझे बड़ा डर लगा और मैंने प्राणायाम छोड़ गायत्री उपासना प्रारम्भ किया। इस उपासना से वे अनुभव अधिक उन्नत हो रहे हैं, पर डर बेहोशी का कहीं पता नहीं है। एक दिन ध्यान में साक्षात् सूर्य मण्डल में ही जैसे मैं प्रविष्ट हो गया।

शत्रुता मित्रता में बदली

श्री मदनलालजी, पोस्टमैन अटरु (कोटा) माता के प्रेम का वर्णन करते हैं :- मेरी जमीन का कुछ हिस्सा दूसरे व्यक्ति के यहाँ रहन था। मैं छह वर्ष से प्रयत्न करता आ रहा था कि वह जमीन छोड़ दे और अपने रहन की रकम ले ले, पर वह किसी भाँति राजी नहीं हुआ। माता की प्रेरणा से मैंने उसके ऊपर मुकदमा चलाया। दो ही पेशी के बाद उस व्यक्ति ने मुझसे समझौता कर लिया और जमीन के साथ रेहन की रकम भी छोड़ दी। इसमें भय-द्वेष नहीं था, स्नेह भरे चित्त से ही उसने इस बर्ताव को पूरा किया। यह माता की कृपा पूर्ण प्रेरणा कही जा सकती है, नहीं तो आघात का प्रति उत्तर प्रायः रोष भरा प्रतिघात ही होता है।

मैं “अन्ता” पोस्ट ऑफिस में काम करता था, जो मेरे घर से दूर पड़ता था। मैंने मन ही मन माता से घर के निकट बदली करा देने की अभिलाषा की और अनायास ही मेरी बदली अटरु अपने गाँव में ही हो गई। बाहर से इसके लिए मैंने जरा भी कोई प्रयत्न नहीं किया था। सच्चे भाव से माता की शरण लेने पर (माता) अपने पुत्रों की शुभ अभिलाषा को सदा ही पूरी करने की चेष्टा करती हैं, ऐसा मेरा अचल विश्वास है।

बुद्धि का प्रकाश

श्री रामचन्द्र शर्मा (प्रयाग) अपना अनुभव लिखते हैं। बचपन में मेरी बुद्धि इतनी बोदी थी कि मैं विद्यालय में मामूली-मामूली बातों में खूब मार खाता था। जीवन भार सा लगता। मर जाने की इच्छा होती। एक बार सनावद अपनी आजी माँ के यहाँ गया। उन्होंने मेरी दशा जान कर गायत्री उपासना की प्रेरणा दी और मैं उपासना करने लगा। मेरे पिता जी इन्कम टैक्स महकमे में थे। मेरी कुछ दिन की उपासना के बाद ही उन्नती करके जबलपुर बदली कर दिये गये। यहाँ के विद्यालय में आते ही मेरी बुद्धि का प्रकाश दिनों दिन बढ़ता ही चला गया। फिर तो कठिन से कठिन विषय मिनटों में समझ लेता था। फिर ऊँचे दर्जे से मैट्रिक पास कर सुसम्पन्न हुआ। तदुपरान्त ही सुशीला कन्या से विवाह सम्पन्न हुआ। तदुपरान्त अध्ययन करते हुए बिना परेशानी के बी.काम., एम.ए. और एल.एल.बी. पास कर ली। आजकल सरकारी महकमे में अच्छे पद पर हूँ और जनता की सेवा करते हुए शान्त-उपासनामय जीवन यापन करता हूँ। मेरे प्रसन्न शान्त स्वभाव से मेरे संपर्क में आने वाले मुझे छोड़ना नहीं चाहते। माता की प्रेरणा से मुझे सभी प्राणियों में ईश्वर की झलक ही दीख पड़ती है और मैं आनंद से उत्फुल्ल रहा करता हूँ।

आर्थिक स्थिति सुधरी

श्री महावीर प्रसाद मास्टर, बेगमपुर-अपने सुखी होने का कारण बतलाते है- “वैश्य को भी गायत्री जपने का अधिकार है” यह जानने के बाद मैं पुरोहित और ब्राह्मणों के लाख मना करने पर भी गायत्री उपासना करता ही रहा। कुछ ही दिनों में मेरी गिरी माली हालत सुधर गयी, मेरा यश भी क्रमशः फैलता गया। भीतर में ओऽम् ध्वनि सुनायी पड़ती है। उस का केन्द्र खोजने के ख्याल में, मैं जप सहित अपने को भूल जाता हूँ। एक बार मेरे पेट में भयंकर दर्द हुआ। अन्ततः गायत्री मन्त्र जपते-जपते ही धीरे-2 सारा दर्द गायब हो गया।

एक बार मेरे दो कुण्ठित बुद्धि के शिष्य परीक्षा पास करने के लिए गायत्री मंत्र लेखन उपासना करने लगे। एक योग्य तेजस्वी छात्र ने यह देख गायत्री उपासना का बड़ा मजाक उड़ाया। आश्चर्य मुझे भी हुआ कि परीक्षा में ये दोनों छात्र उत्तीर्ण और तेजस्वी छात्र ही फेल हो गया।

बघेर के आक्रमण से बचे

सुश्री प्रेमलता गुप्ता, मंसूरी- माता के वात्सल्य का वर्णन करती हुई लिखती हैं- गायत्री उपासक श्री वानप्रस्थी जी मेरे सम्बन्धी है। एकबार उनके यहाँ आने पर उनके पास का गायत्री साहित्य मैंने खूब अध्ययन किया। गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार पढ़ कर गायत्री उपासना की इच्छा प्रबल हो उठी। उन्हीं से उपासना विधि जान कर मैं उपासना करने लग गयी।

हमारे निवास स्थान से जंगल लगा हुआ ही है। मैं जब जप करने बैठती तो एक पड़ोसी का कुत्ता भी आकर बैठ जाता और जप समाप्त होने पर चला जाता। एक दिन छत पर बैठ कर ब्रह्म मुहूर्त में मैं जप कर रही थी। वह कुत्ता भी आकर बैठ गया। उसी जगह बच्चे भी खेल रहे थे। पहाड़ पर जंगल होने से जंगली जानवरों का भय सदा हमें लगा ही रहता है। उस दिन सहसा एक बघेरा आया और कुत्ते पर ताक लगा ही रहा था कि उसके मालिक ने उसे पुकारा और वह तुरन्त भागा चला गया। उस बघेरे की दृष्टि बच्चे और मेरे ऊपर थी। मेरे तो प्राण सूख गये। मैंने माँ से प्रार्थना की-माँ तेरे सिवाय अब इस क्षण में रक्षा का कोई उपाय नहीं। ठीक दूसरे ही क्षण बघेरे ने हम लोगों पर एक बार दृष्टि डाली-कूद कर झाड़ी में छिप गया। ये सिवाय माता की करुणा के हमारे बचने और कोई दूसरा कारण हमें नहीं जान पड़ता। ऐसे माता के चरणों में, मैं न्यौछावर हूँ।

वेतन बढ़ा

श्री पंचमसिंह जी, मानगर-माता की छिपी सहायता की चर्चा करते हैं। दुर्भाग्य से मैं दो बार नौकरी से वंचित होकर बिना जीविका के परिवार सहित भूखों मरने लगा। एक गायत्री उपासक के कहने पर ‘अखण्ड-ज्योति पढ़कर गायत्री उपासना में लग गया। गायत्री महा विज्ञान पढ़कर विधि-पूर्वक अनुष्ठान किया। फलतः बिना किसी प्रयत्न मेरी पत्नी को नौकरी मिल गयी और उसका वेतन थोड़े ही दिनों में दुगना बढ़ गया। फिर मुझे भी रोजगार करने की सुविधा मिल गयी और आज मैं माता को धन्यवाद देता हुआ दिनों दिन उन्नति की ओर जा रहा हूँ।

ऑपरेशन सफल हुआ

श्री के.बी. सुब्बाराव, कटनी मुरवाड़ा, मेरा ऑपरेशन 7-9-55 को अस्पताल में हुआ और कोई 15 दिन तक ठीक होने का कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ा। इसलिए सोलहवें दिन फिर मुझको उपवास में रखकर क्लोरोफार्म से बेहोश करके घाव को ताजा बनाया गया। जिससे मेरी हालत अत्यन्त ही नाजुक हो गयी तथा मेरे सभी सम्बन्धी चिन्तित हो गये।

इस ऑपरेशन से पूर्व मैं नित्य नियमित रूप से गायत्री जप करता था। ऑपरेशन के बाद कुछ दिन तो मैं माता को भूले रहा, किन्तु, शीघ्र ही वेद-माता ने कृपा कर मेरे अन्तर में प्रेरणा की और मैं अस्पताल में ही मानसिक जप करने लगा।

मैं मानसिक जप में इतना खोया रहता था कि आने जाने वालों की भी मुझे सुधि नहीं रहती थी। इस जप का प्रभाव यह हुआ कि दो बार मुझे स्वप्न में पूज्य आचार्य जी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। और पूर्ण स्वस्थ हो जाने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। साथ ही एक बार स्वप्न में स्वयं वेद-माता ने मुझे दर्शन देकर कृतार्थ किया। साथ ही स्वप्न में मुझे अपना घाव भरता हुआ दिखाई दिया। इस प्रकार वास्तव में मेरा घाव धीरे-धीरे भरने लगा और सब से बड़ी बात मेरे मन को जो शान्ति मिली उसका मैं शब्दों में ‘वर्णन करने में’ सर्वथा असमर्थ हूँ। वेद माता की कृपा से और सद्गुरु देव के आशीर्वाद से मैं शीघ्र ही रोग मुक्त हो गया।

बिना दहेज के विवाह

श्री. चन्द्रलेखा श्रीवास्तव, यादवपुर बखरी (चम्पारण) अपने अनुभव का वर्णन करती हैं :- मैंने बचपन में ही मातृविहीन होकर गायत्री माता को ही अपनी माता बना लिया। जब मैं सयानी हुई तो पिताजी को शादी की चिन्ता हुई, भला माता मेरे लिए पिताजी को क्यों कठिनाई में डालना पसन्द करे निकट में ही एक सुयोग्य लड़के का पता लगा और दहेज राक्षसी प्रथा के बावजूद भी बिना दहेज और झंझट के मेरा पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हो गया। पतिदेव के परिवार में सभी गायत्री उपासक ही मिले। वहाँ पतिदेव के आदेशानुसार अखण्ड-ज्योति पढ़कर मैंने पूज्य आचार्य जी से विधिवत् दीक्षा ली और निर्देशित विधि से उपासना करने लगी। इससे आर्थिक दशा एवं मेरे कमजोर स्वास्थ्य की पुष्टि का प्रारम्भ हुआ। पूज्य आचार्य जी के आशीर्वाद प्राप्त कर मैं हिस्टीरिया रोग से मुक्त हो गयी और मेरे पूज्य पतिदेव उन्हीं की कृपा से आज समाज शिक्षा के आयेजक पद पर आसीन हो 200) दो सौ रुपये मासिक अर्जन कर रहे हैं। गुरु और माता की कृपा से हमारे जीवन में शान्ति और सुख का स्वाभाविक निवास है।

सन्तोष जनक दान दक्षिणा मिली

श्री कृष्णकुमार जोशी, वाणा गाँव माता की साक्षात् कृपा का वर्णन करते हैं :-

अखण्ड-ज्योति के अध्ययन से मुझ में गायत्री उपासना करने में काफी बल मिला। उस समय महायज्ञ की पूर्णाहुति का निमन्त्रण मिल गया था, पर मेरे चार सन्तान, पत्नी आदि का उदर पोषण ही कठिन था। मेरी बड़ी लालसा थी मैं अपने बच्चों को भोजन दूध दे सकूँ और पूर्णाहुति में जरूर सम्मिलित होऊँ। अचानक एक सज्जन सेठ ने मुझे बुलाया कहा- मेरी उमर बीत चली। यह धेनु गाय मैंने ब्राह्मणों के दान देने के लिये पोस-पाल रखा है। आप इसे दक्षिणा सहित ग्रहण करें। माता की करुणा देख मेरी आंखों में आँसू भर आये। बच्चों को दूध के लिये धेनु गाय तो मिला, पर रुपये में कमी थी इसीलिये मैंने तपोभूमि जाने के लिये गाय बेच दिया सोचा इसी से कुछ रुपये दूध के लिये दे दूँगा। दूसरे ही दिन मुझे एक श्रद्धालु सेठानी ने बुला कर उस से बड़ी और सुपुष्ट धेनु गाय मुझे दान दिया। माता की ममता की याद कर मेरा हृदय भर उठा। खूब प्रेम और हुलास से पूर्णाहुति में मथुरा सम्मिलित हुआ और माता को सहस्र-सहस्र धन्यवाद दिया।

शत्रुता ठंडी पड़ गई

श्री ब्रजगोपाल शर्मा, सवाँसा अपने जीवन में सुख-शान्ति पाने के विषय में लिखते हैं :- मैं चारों ओर शत्रुओं से घिरा था। सभी मेरी बुराई करने की ताक में रहते। मुझे चैन नहीं था। प्रशंसा सुन कर ही मैं भी गायत्री तपोभूमि गया था। वहाँ से अनुष्ठान करके लौटने के बाद ही मेरे सारे दुश्मन ठण्डे हो गये। मैं उसी प्राइमरी स्कूल के साधारण अध्यापक से अनायास प्रधानाध्यापक बना दिया गया। आज हम सभी तरह से सुखी हैं और दुश्मन के बदले दोस्तों से घिरे रहते हैं। ऐसी माता के चरणों पर हम सदा न्यौछावर हैं।

श्वेत कुष्ठ अच्छा हुआ

श्री बालाप्रसाद गुप्ता, मालापानी से गायत्री मंत्र की शक्ति का अपना अनुभव लिखते हैं :- मैं सद्गुण से गायत्री मंत्र की दीक्षा लेकर जप किया करता था। एक दिन एक दस वर्ष की श्वेत कुष्ठ रोगिणी कन्या को उस के पिता भँवरलाल जी के यहाँ लिये आये। मैं वहीं था। भँवरलाल जी के कहा आप गायत्री मंत्र 108 बार पढ़ते हुए इसके श्वेत दागों पर हाथ फेर दें- फिर हम लोग गायत्री मंत्र का प्रभाव देख सकेंगे। उसके पिता को कहा गया- आप इसी भाँति प्रति रविवार इसी भाँति लड़की को लिए आया करना। दूसरे रविवार को देखकर मुझे स्वयं ही आश्चर्य हुआ कि पैर से पेट से फैले श्वेत कुष्ठ के दाग में श्वेतता के बदले लाली की आभा आ रही थी। इस भाँति लगातार कई रविवार आते रहने पर उनके दाग शरीर के स्वाभाविक रंग में बदल गये।

दुर्घटना बाल-बाल बची

श्री देवीशंकर शुक्ल श्यौपुर कलाँ लिखते हैं :- अखण्ड-ज्योति से संपर्क जोड़ने के बाद मैं गायत्री उपासना करने लगा था। मैं प्रतिदिन साइकिल पर एक पुल पार करते हुए पढ़ाने जाया करता था। वर्षा का मौसम था। पुल के बगल में लो मुड्डियाँ लगी हुई थीं, वह बरसात में टूट फूट गयी थीं। पुल के नीचे पत्थरों के ढेर थे। एक दिन वेतन लेकर वापस आ रहा था। अचानक पुल पर से साइकिल फिसली और अगला चक्का किनारे पर जाकर नीचे लटक गया। प्राण संकट के अवसर पर मैंने गायत्री माता का स्मरण किया और स्मरण करते ही मेरा एक पैर एक मुण्डी पर स्थिर हो गया उसी क्षण एक हाथ से मैंने साइकिल का पिछला चक्का लिया। इस भाँति साइकिल सहित मेरी रक्षा माता की कृपा से हो गयी, नहीं तो दोनों के चकनाचूर होने में पल मात्र की देरी थी।

माता ने प्रार्थना सुन ली

श्री माधुरी बाई. रायपुर से माता की वात्सल्य कोमल भावना वर्णन करती हुई अपनी बीती लिखती हैं :-

अपनी कक्षा में सबसे कम समझ वाली तथा याद करने में भोंदी मैं ही थी। अध्यापिका जी का प्रश्न सदा मुझे कठिन जान पड़ता और मैंने कभी उसका उत्तर नहीं दिया। परीक्षा के पाँच महीने पहले मैं बीमार पड़ी और चार महीने के बाद स्वस्थ हो पायी। अब परीक्षा के पन्द्रह दिन ही शेष थे। वर्ग में उत्तर नहीं दे सकने के कारण अध्यापिका जी ने मुझे काफी फटकार दी। घर आकर बिना खाये सो गयी।

मैं नित्य थोड़ी-थोड़ी गायत्री उपासना किया करती थी, सो आज उस माता की याद कर बड़ी रोयी-रोते-रोते सो गयी। स्वप्न में देखा-मैं परीक्षा कक्षा में बैठी सवाल को कठिन देख कर रो रही हूँ। सहसा खिड़की की राह से माता आयी और साँत्वना के स्वर में कहा- माधुरी बेटी! रोती क्यों हो-मन लगा कर पढ़ती रहो। परीक्षा में तुम सर्व प्रथम ओर तेरी सहपाठिनी भूला द्वितीय होंगी। परीक्षा हुई और माता की स्वप्न की वाणी साकार हुई। ऐसी माता की सदा जय हो।

अनुत्तीर्णता के स्थान में द्वितीय श्रेणी

मोहनलाल गालब, कोटा लिखते हैं :- रत्तीराम जी कोयला निवासी हैं। उसका लड़का हरिकिशन मिडिल में पढ़ता था। वह वर्ष में आठ महीना बीमार ही रहता था। स्वास्थ्य की भाँति पढ़ाई भी कमजोर थी। वार्षिक परीक्षा देने के समय रत्तीराम जी ने परीक्षा शुल्क देना पैसे की बर्बादी समझ कर अस्वीकार कर दिया। हम लोगों ने गायत्री माता के नाम पर साढ़े सात रुपया शुल्क देने के लिए जोर दिया तो मान गये। जब लड़का परीक्षा दे कर घर आया तो माता-पिता दोनों ने एक स्वर से कहा-हमारे साढ़े सात रुपये निश्चय ही बर्बाद चले गये। सदा ऐसी निराशा भरी वाणी निकालते रहते। जब जून में परीक्षा फल निकला तो हरिकिशन रामजी ने बड़े प्रेम से गायत्री उपासना प्रारम्भ की। उनकी पत्नी भी उनकी अनुगामिनी बनी। कुछ दिनों की उपासना के बाद उसका लड़का भी स्वस्थ रहने लगा और पढ़ने में उसकी बुद्धि विकसित होती चली गयी। अब वे लोग लगातार गायत्री उपासना कर रहे हैं।

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