हमारी आँतरिक भावनायें
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(श्री रामकृष्ण डेंगरे, कटनी)
समय का कार्य अपनी निश्चित गति से व्यतीत होना है- चाहे उसका परिणाम भला हो या बुरा। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। हमारी हृदयात्मा में प्रति सेकेंड अनेकों सार्थक और निरर्थक भाव (माइंड वेव्स) जाग्रत होते हैं। उनका समीकरण ही कर्म के रूप में प्रकट होता है। हमारी विचार धारायें जैसी आदर्श अथवा पतित होंगी, हमारा भविष्य भी उसी के अनुकूल हो जायेगा। भावनाओं पर ही चरित्र का उज्ज्वल अथवा काला होना अवलम्बित है। वर्तमान समय में मनुष्यों की भावनायें अधिकाँश में विकार युक्त हो रही हैं, जिसके कारण मनुष्य-मनुष्य में और राष्ट्र-राष्ट्र में पारस्परिक शत्रुता और वैमनस्य के भाव बढ़ते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। इसी से संसार में आजकल दूषित वातावरण छा रहा है और अशाँति बढ़ती जा रही है।
आज प्रत्येक देश, प्रत्येक परिवार में भी इस पारस्परिक विरोध के चिह्न दिखलाई पड़ते हैं और प्रेम तथा सहयोग का भाव घटता चला जाता है। इसके कारण घर की शाँति भी नष्ट होती जाती है। आत्मा व भावनाओं का उतना ही निकट संबंध है जितना चेतनावस्था और बोधशक्ति में है। मनुष्य अपनी वाणी से मन की बात को छुपा कर दूसरे को भ्रम में डालने का प्रयत्न करता है, पर उसकी आन्तरिक भावनायें दूसरे को उसके हृदय का भेद बतला ही देती हैं।
हमारी भली या बुरी भावनाओं का परिणाम व्यक्तिगत ही नहीं होता, वरन् उनका प्रभाव समाज और राष्ट्र पर भी पड़ता है। भारतवर्ष का जो पतन हुआ उसका कारण हमारी पारस्परिक विरोधी भावनायें ही थीं। यहाँ पर जाति-भेद और समुदाय-भेद का जहर बहुत ही अधिक मात्रा में फैल गया था। प्रत्येक दूसरे को छोटा या किसी दृष्टि से बुरा समझता था। उच्च वर्ण के लोग नीच वर्ण वालों के प्रति मनुष्यता विहीन व्यवहार करना अपना अधिकार समझने लगे थे और छोटे वर्ण वाले ऊँचे वर्ण वालों को अपना भाई या देशवासी समझने के बजाय शोषक और लूटने वाले समझने लगे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि एक धर्म के अनुयायी और एक स्थान के निवासी होने पर भी उनमें सहयोग और प्रेम का पूर्ण रूप से अभाव हो गया और फलस्वरूप समस्त देश का पतन हो गया।
मनुष्य को कर्म करने से पहले उसके विषय में पूर्णतः सोच विचार लेना आवश्यक है। क्योंकि कर्मफल निश्चित रूप से होकर रहेगा, चाहे शुभ हो या अशुभ। कार्य के परिणाम में भावनाओं का संबंध अनिवार्य रूप से होता है। मनुष्य का नश्वर शरीर कीमती नहीं होता वरन् उसकी नीति, चरित्र ही कीर्ति के द्योतक हैं। इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि अपनी भावनाओं को सदैव शुद्ध, पवित्र और उच्च रखें, जिससे हमारे कर्म भी परहितकारी और प्रशंसनीय हों। ये सब गुण मनुष्य जन्म से साथ लेकर नहीं आता। वह अपने उत्तम और उज्ज्वल चरित्र का निर्माण स्वयं ही करता है। उसके अंदर वह अदृश्य शक्ति छिपी है जिसके जागृत होने से आदर्श और सात्विक गुणों का विकास हो सकता है। गीताकार ने सत्य ही कहा कि “मन की प्रसन्नता और शाँतभाव एवं भगवत् चिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण की पवित्रता ही सच्चा तप है।”

