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Magazine - Year 1957 - Version 2

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यज्ञ का वास्तविक स्वरूप

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(श्रीमती एनीबेसेण्ट)

‘यज्ञ’ हिन्दू धर्म का एक सबसे बड़ा सिद्धाँत है। गीता के कथनानुसार यह सृष्टि यज्ञ द्वारा ही उत्पन्न हुई और यज्ञ से ही उसकी स्थिति है। उसके तीसरे अध्याय के 8 वें श्लोक में बताया गया है कि “जिस आदि यज्ञ से भूतमात्र उद्भव होते हैं वही कर्म हैं।” इसी प्रकार 14 वें अध्याय के तीसरे श्लोक में कहा गया है उसका गर्भ देने वाला पिता ईश्वर है। “ईश्वर इस सृष्टि का आरंभ यज्ञ के रूप में ही करता है। ‘पुरुष सूक्त’ में भी कहा गया है कि “यज्ञ अर्थात् स्वार्पण से ही ईश्वर इस जगत की रचना के लिये व्यक्त हुआ इस जगत की स्थिति भी यज्ञ से ही है। यज्ञ से ही मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है।” इसलिये यज्ञ के विस्तृत अर्थ पर विचार करना और उसकी महिमा को हृदयंगम करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।

साधारणतः लोग मानते हैं कि यज्ञ या स्वार्पण दुःखमय है। यह हमारा भ्रम है। ‘यज्ञ’ का साराँश अपनी इच्छा से आनन्दपूर्वक त्याग करना है जिससे कि दूसरे लोगों को भी उसका भाग मिले। मनुष्य के दैवी अंश या उच्च प्रकृति को स्वार्थ त्याग में आनन्द मिलता है। इसके विपरीत मनुष्य की आसुरी या नीच प्रकृति को ग्रहण करने या पकड़ रखने में आनन्द मिलता है। यज्ञ से दुख व अनुभव तभी होता है जब कि यज्ञ कर्ता की उच्च और नीच प्रकृति में विरोध होवे। इस विरोध के कारण ही यज्ञ में दुख का प्रवेश होता है।

सृष्टि उत्पन्न करने के हेतु से ईश्वर ने अपनी इच्छा से अपने अनिन्त जीवन का त्याग कर उस जीवन की मर्यादा बाँध ली जिसमें वह व्यक्त हो सके। यह उसका यज्ञ है। “एकोहं बहुस्याँ प्रजायेयः- (मैं एक हूँ बहुत होऊँ) इस सूत्र में इसी यज्ञ का स्वरूप बताया गया है। प्रकाशमय अनन्त समुद्र में जिसका केन्द्र सर्वत्र है और परिधि कहीं नहीं है मान लो एक दिव्य गोल जीवित ज्योति प्रकट होती है। व्यक्त होने के लिए ईश्वर अपनी मर्यादा बाँधने की इच्छा करता है वह इच्छा इस ज्योति की हद है। यह हद उस की माया है जिसे वह जगत रचने के लिए धारण करता है। इस प्रकार ब्रह्ममय स्थिति के पूर्ण आनन्द का त्याग कर व्यक्त अवस्था में आना-यह ईश्वर का यज्ञ है ऐसा सदैव माना गया है। इससे ईश्वर अपने को बंधन में डाल लेता है, क्योंकि जब तक जगत की यह स्थिति है तब तक यह यज्ञ क्रिया भी जारी रहेगी, क्योंकि ईश्वर ही सब अंशों का आधार है। ईश्वर से जो अखण्ड रूप निकलते हैं उन सब में उसके अंश भरे हैं और वह इन उपाधियों के बंधनों को ग्रहण करता है। वह प्रत्येक उपाधि में प्रवेश करके उसकी अपूर्णता और बन्धन को तब तक सहन करता है जब तक उसमें पूर्णता न आ जावे और जब तक उसका रचा जीव उसके समान दिव्य होकर उसमें मिल न जावे। ईश्वर का समान प्रकार उपाधियों में अपना अंश भरना ऊपर लिखे “आदि- यज्ञ” का भाग है।

इसके विपरीत प्रकृति की असल क्रिया ग्रहण करना है। प्रकृति पर आत्मा की क्रिया होने से प्रकृति के रूप बनते हैं और उसी आत्मा से उनका निर्वाह होता है। उस आत्मा के खिंच जाने से उन रूपों का नाश हो जाता है। इसलिये प्राकृतिक रूप जितना बने अपने लिये ग्रहण करना चाहता हैं और अपने थोड़े अंश का भी त्याग करना उसे बुरा मालूम होता है। उसकी प्रसन्नता-पकड़ रखने अथवा ले लेने में ही है।

यज्ञ या स्वार्पण दुख रूप है यह विचार कैसे उत्पन्न हुआ यह बात उपर्युक्त विवेचन से समझ में आ जायेगी। आत्मा स्वार्पण द्वारा ही आनन्द पाता है। देहधारी अवस्था में भी जीव इस बात की परवाह नहीं करता कि स्वार्पण करने में शरीर का नाश होगा या नहीं, क्योंकि उसे मालूम है कि शरीर हमारा उद्देश्य नहीं हैं वरन् हमारे व्यक्त रूप के विकास का एक साधन मात्र और अल्पकालीन रूप मात्र है। अर्पण काल में देह अपने प्राण रूपी बल को जाते देख दुखी होती है और प्राण को निकलने से रोकने का प्रयत्न करती है। यज्ञ रूप कर्म से वे प्राणबल घट जाते हैं जिन्हें देह अपना समझती थी और स्वार्पण में तो बिल्कुल ही निकल जाते हैं और तब देह का भी नाश हो जाता है। नीचे की श्रेणी वाले नाम और रूपयुक्त लोकों में यज्ञ का यही रहस्य है और देह का प्राण जाने के कारण उसे दुःख प्रतीत होता है। तो फिर इसमें आश्चर्य क्या है कि लोग मायायुक्त होकर और असल रहस्य को न जानकर स्वार्पण काल में देह के दुःख को देखकर यज्ञ को भी दुखमय समझने लगे और उस यज्ञ में आत्मा के आनन्द को न समझ सके। आत्मा ऐसे यज्ञ में यह कहता है कि- हे ईश्वर हम तुम्हारी इच्छा का पालन करते हैं और हमें उसमें संतोष है।

इस प्रकार यज्ञ नियम जगत में आत्मा के विकास का नियम है। विकास रूप नसेनी का प्रत्येक डंडा इस स्वार्पण द्वारा चढ़ा जाता है। आत्मा अपना अर्पण कर ऊँची योनि में जन्म लेती है और उसकी उस अपितु देह का नाश हो जाता है। जो लोग केवल उपाधि-रूप के नाश की ओर निगाह रखते हैं उन्हें सारी सृष्टि-प्रकृति-एक महान कसाईखाने की तरह जान पड़ती है। पर जिन्हें उस बध में यह दिखाई पड़ता है कि आत्मा नीची उपाधि को त्याग कर उच्च उपाधि ग्रहण करने के लिये स्वार्पण करती है उन्हें दुख और बध के बदले विकास द्वारा ऊँची योनि के जन्म का आनन्द ही सुन पड़ता है।

इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य, जिसकी बुद्धि हमेशा उन्नति पाती जाती है, युगों के अनुभव से यह बात ढूँढ़ निकालता है कि जीवन का नियम यज्ञ या स्वार्पण ही है। पर इस प्रयत्न में और ऐसे अन्य बहुत से प्रयत्नों में मनुष्य को बाहरी सहायता भी मिली है। मनुष्य जाति की बाल्यावस्था में ऋषि उसको सिखाने और सुमार्ग बताने के लिए आये थे और उन्हीं ने इस नियम का उपदेश दिया। मनुष्य जाति की उदय होती बुद्धि को सहायता देने के लिए उनने जो धर्म रचे उसमें भी इस नियम को बहुत सीधी-सादी रीति से शामिल कर दिया। फिर भी इन आरम्भिक जीवों से यह आशा नहीं कि जा सकती थी कि बिना बदले के ये लोग अपने बहुत प्रिय पदार्थों का त्याग कर सकेंगे, जिन पर उनके शरीर का जीवन ही निर्भर था। इसलिए यह आवश्यक था कि धीरे-धीरे उनको ऐसे मार्ग से ले जावें जिससे अंत में ये अपनी इच्छा से स्वार्पण करें। इसलिए प्रथम यह सिखाया गया कि मनुष्य जाति का संबंध उससे ऊपर और नीचे की योनियों से है और मनुष्य बाकी सब सृष्टि से जुदा नहीं है। उसे यह बताया गया था कि तुम्हारे स्थूल शरीर का पोषण खनिज और वनस्पतियों और दूसरे छोटे जीवों द्वारा होता है और इनके खाने से तुम पर ऋण होता है। जिसको चुकाना तुम्हारा धर्म है। इससे मनुष्य को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि हम पर प्रकृति का ऋण सदैव बना रहता है और उसे सदैव चुकाते रहना चाहिए। इस प्रकार यज्ञ से प्रिय वस्तु के त्याग का अर्थ निकलने लगा और लोग ऋण चुकाने और अपने कल्याण के हेतु से यज्ञ करते थे। आगे की शिक्षा के फल से यज्ञ का फल स्थूल लोक का न होकर सूक्ष्म लोक का हो गया और क्रमशः वह स्वार्पण की सीढ़ी बन गई।

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