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जिसकी आप अपने अन्तःकरण से अभिलाषा करते हैं वह आपको अवश्य ही मिलेगा। जिसको आपने मन, कर्म और वचन से अपना आदर्श माना है, वह आपके सामने अवश्य ही प्रकट होगा। इसका कारण है, जब भी आप किसी पदार्थ विशेष की इच्छा करते हैं और मनसा, वाचा, कर्मणा उसको पाने के लिये यत्न करना शुरू करते हैं, तो उसी समय से उस पदार्थ के साथ आपका सम्बन्ध जुड़ जाता है, और जितना भी आपका मन उस पदार्थ के लिए अधिक उत्सुक होता जाता है उतना ही दृढ़ आपका सम्बन्ध भी होता जाता है। लेकिन इतना सब कुछ होने पर भी आपको मनोनुकूल सफलता नहीं मिल पाती। कारण स्पष्ट है। आप अपने जीवन के स्थूल पहलुओं पर तो अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं परन्तु अपने लक्ष्य की ओर से उपेक्षित ही रहते हैं। लेकिन यदि आप सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको अपने अभिलषित लक्ष्य पर मन, वचन और कर्म से स्थिर रहना होगा और तभी आप विजय पताका लिए, सारे संसार को आश्चर्य में डाल सकेंगे।
-स्वेट मार्डन-

