मंत्र शक्ति का जीवनोत्कर्ष में उपयोग
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(स्वामी माधवतीर्थ जी)
शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में भगवान का नाम स्मरण करने और मंत्र की महिमा बहुत अधिक है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस युग में मिथ्या नाम और रूपों की संख्या बहुत अधिक हो गई है। वैसे मनुष्य में इतनी शक्ति है कि वह समाज का सुधार कर सकता है, पर मनुष्य की आयु अल्प होती है और समाज में रहने से छोटी उम्र में ही उसमें मिथ्या संस्कारों का उदय हो जाता है। इन संस्कारों के कुप्रभाव का मुकाबला मंत्र शक्ति द्वारा ही संभव होता है।
मनुष्य का जीवन भूतकाल से संस्कारों की स्मृति और वर्तमान संयोगों के दबाव से चलता है। इन दोनों कारणों के बीच में सामंजस्य रहना चाहिये। छोटी उम्र में जो संस्कार पड़ जाते हैं उनका स्मरण बहुत ज्यादा रहता है। अगर वे संस्कार उत्तम हों तो उनमें लाभ पर्याप्त हो सकता है। पर वर्तमान समय के जल्दबाजी के जीवन में न तो माँ बाप को इतनी फुर्सत रहती है कि बालक के संस्कारों को ठीक करने में समय दे सकें और न स्कूलों में शिक्षकों को ही इस काम के लिये समय मिलता है। इसके अतिरिक्त माँ बाप और शिक्षक भी समाज के दृष्टिकोण के अनुसार चलने को विवश रहते हैं। यह तो सभी जानते हैं कि वर्तमान समय में समाज में अनेक प्रकार की गलत बातें फैली हुई हैं। इस काल में इन्द्रिय सुख की लालसा दिन पर दिन बढ़ती जाती है, इसलिये मनुष्यों का अधिकाँश समय “अर्थ” और “काम” इन दो पुरुषार्थों में ही खर्च हो जाता है। जो विचार धारा योरोप में बह रही है उसका बहुत कुछ असर पिछले दो सौ वर्षों में हमारे देश पर भी पड़ा है। सौभाग्य की बात इतनी ही है कि अभी हमारे देश में बहुत सा प्राचीन साहित्य बच रहा है और उसकी मदद से मनुष्य को अनेकता से एकता का पाठ पढ़ने को मिल सकता है। उसी साहित्य का एक अंग मंत्र शक्ति भी है।
शायद कोई भाई यह शंका करे कि मन्त्र जपने में तीन चार घंटा खर्च करने की अपेक्षा उतने समय में अन्य उद्योग करके अगर किसी गरीब मनुष्य को खाना, कपड़ा दिया जा सके, तो क्या यह ज्यादा पुण्य का काम न होगा ? यह ठीक है कि गरीब मनुष्य की सहायता करना भी पुण्य का कार्य है और कोई उसको बुरा नहीं कह सकता, पर मन्त्र शक्ति से नया जीवन मिलता है और मोक्ष का रास्ता खुल जाता है। गीता में कहा है कि “यज्ञ, दान और तप ये तीनों मनुष्य को पवित्र करने वाले हैं, यज्ञों में जप यज्ञ श्रेष्ठ है।” इस लिये संसार का कार्य करते रहने पर भी भगवान का नाम जपना परम कल्याणकारी है। अपनी जाति की भलाई करने का स्वभाव तो अनेक पशु में भी पाया जाता है, पर ज्ञान रखने वाले मनुष्य को इससे ज्यादा ऊँचा जीवन व्यतीत करना चाहिए। आजकल के कच्ची बुद्धि वाले मनुष्य इस विषय पर भली प्रकार विचार तो नहीं करते, केवल जल्दबाजी के संस्कार के प्रभाव से समाज की नकल करने लग जाते हैं और उसी को ठीक मान लेते हैं। ऐसे जल्दबाजी के स्वभाव को संयमित करने के लिये पहले मन्त्र-जप की आवश्यकता होती है। कुछ समय बाद जब यह उद्देश्य सिद्ध हो जाय, तब गुरु के उपदेश से मनुष्य परमात्मा का ध्यान कर सकता है और आत्मज्ञान का अधिकारी बनता है। क्योंकि परमात्मा का निवास सर्वत्र है इसलिये मन्त्र जप करने वाला सबमें परमात्मा को देखने का प्रयत्न करेगा और इस प्रकार उसके भीतर अद्वैत भाव का उदय हो सकेगा।
अनेक द्वैत-भाव वाले भी ऐसे होते हैं कि उनकी संगति से थोड़े समय के लिये अद्वैत-भाव उत्पन्न हो जाता है। यह योरोप के लोगों का मनोभाव है। इन लोगों का अंतिम लक्ष्य यही रहता है कि मनुष्य के साथ मनुष्य का सा बर्ताव करना। पर भारतीय जीवन का उद्देश्य साधारण मानव जीवन से ऊपर उठकर दिव्य जीवन प्राप्त करना माना गया है। पिछले सौ-दो सौ वर्षों में व्यापार, शिक्षा, शासन आदि का सम्बन्ध होने से हमने जहाँ पश्चिम वालों से कुछ गुण सीखे है वहाँ अनेकों मूर्खता की बातें भी ग्रहण कर ली हैं। अब हमको जीवन मार्ग का संशोधन करना पड़ेगा, जिससे पश्चिम के मनुष्य भी हमारे यहाँ अद्वैत ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने आवें।
वर्तमान सामाजिक जीवन में जो मनुष्य दूसरों के हित का ख्याल रखते हैं, वे भी इन्द्रिय सुख में डूबे रहते हैं। पर यह दैवी जीवन का मार्ग नहीं है। ऐसा जीवन व्यतीत करने के लिए सच्ची वाणी और सच्चे शब्द की आवश्यकता है। जिस प्रकार एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ सम्बन्ध करने के लिए बात करनी पड़ती है और उसमें शब्द का ही प्रयोग होता, उसी प्रकार भगवान के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिए भी शब्द की आवश्यकता होती और वही शब्द “मन” कहा जाता है। मंत्र शक्ति से एक नवीन आकर्षण युक्त क्षेत्र तैयार होता है और उसमें भक्त तथा भगवान के बीच का भेद दूर हो जाता है। आधुनिक विज्ञान में भी कहा गया है कि “एक आकर्षण के क्षेत्र में देश और काल का अस्तित्व जाता रहता है।
मन्त्र की शक्ति
लगभग पचास वर्ष पहले की बात है कि वाणी के प्रसिद्ध विद्वान बाबू भगवानदास अपने मकान के बाहर बैठे हुए थे। उसी समय एक अंधा ब्राह्मण तथा एक अन्य व्यक्ति जो उसका हाथ पकड़ कर ले जा रहा था, वहाँ पर आये और भोजन को कुछ माँगने लगे। बाबू भगवानदास ने कहा कि “अभी भोजन तैयार होने में एक घंटा की देर है, इसलिये अगर एक घंटा बाद आओ तो भोजन मिल सकेगा।”
अंधे ब्राह्मण ने कहा कि “मुझे तो दिखलाई पड़ता नहीं, कहीं घूम फिर सकना मेरे लिये कठिन जान पड़ता है, इसलिये आप स्थान बता दें तो एक घंटे तक मैं यहीं बैठा रहूँगा।” वे लोग दालान में बैठ गये। कुछ देर बाद बाबूसाहब ने अंधे भिखारी से दो एक बातें कीं तो उनका उत्तर उसने ऐसे ज्ञान युक्त ढंग से दिया कि उनको मालूम हो गया कि यह कोई विद्वान आदमी है। इसके पश्चात उन्होंने उससे ऊंकार की उपासना के सम्बन्ध में बातचीत की तो मालूम हुआ कि उसे इस विषय का ‘प्रणववाद’ नामक एक प्राचीन ग्रंथ मुखाग्र है।
बाबू साहब को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने कहा कि आप अब कुछ समय इसी स्थान पर निवास करो और मुझे “प्रणववाद का रहस्य समझाओ इसके पश्चात उन्होंने दो पंडितों को नियत करके ‘प्रणववाद’ का सम्पूर्ण ग्रंथ लिखवा लिया और फिर अंगरेजी में उसका अनुवाद करके एक बहुत श्रेष्ठ ज्ञान प्रदायिनी रचना प्रकाशित करा दी।
यह सभी जानते हैं कि पुराने जमाने में पुस्तकें छापी नहीं जाती थीं और पुस्तकों को लिखकर रखना भी बड़े श्रम और अर्थ व्यय का कार्य था- उस समय अनेक व्यक्ति ऐसे पाये जाते थे जिनको हजारों और लाखों श्लोकों की संख्या वाले ग्रंथ याद थे। श्रीमद्भागवत में 18 हजार श्लोक हैं, स्कन्दपुराण उससे भी बड़ा है, महाभारत में एक लाख श्लोक बतलाये जाते हैं। ऐसे अनेक महान ग्रंथ उस समय के लोग बिना लिखे ही बना लेते थे और याद भी रखते थे। ऐसी आश्चर्यजनक शक्ति जो उस समय के ब्राह्मणों में दिखलाई पड़ती थी उसका की मूल आधार यही था कि वे त्रिकाल संध्या, गायत्री मन्त्र की उपासना, सदाचार तथा संयम का पालन करते थे। इसके लिये सात्विक आहार पर तथा सात्विक वातावरण में रह कर अपने को इस प्रकार की साधना के योग्य बनाते थे। इस प्रकार उनको ऐसी मंत्रशक्ति प्राप्त हो जाती थी जिससे वे अनेक आश्चर्यजनक कार्यों को सिद्ध कर दिखाते थे।

