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Magazine - Year 1959 - Version 2

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सच्चे परिव्राजक ही राष्ट्र को ऊँचा उठा सकते हैं।

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(स्वामी विशुद्धानन्दजी सरस्वती)

नयसीद्वति द्विषः कणोष्युक्थशंसिनः। नृभिः सुवीर उच्यसे॥ ऋ॰ 6। 45। 6

“तू शत्रुओं को वास्तव में हम से दूर ले जाता हैं और उनको वेदभक्त बनाता है इसलिए मनुष्यों में तुझे उत्तम वीर कहा जाता है।”

उक्त वेद मंत्र में उत्तम वीर वेद प्रचारक की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। वेद कहते हैं ज्ञान को। ज्ञान प्रचारक किस प्रकार सबसे उत्तम वीर होता हैं तथा अन्य मनुष्यों में उत्तम क्यों होता है यही इस वेद मंत्र में स्पष्ट किया गया है।

मानवता के शत्रुओं को, दुराचारियों को, नास्तिकों को क्रूकर्मियों को शरीर अथवा अन्य शक्ति बल से परास्त कर देना इतना महत्वपूर्ण एवं उत्तम कार्य नहीं हैं क्योंकि सम्भव है शक्ति के क्षीण होते ही वे पुनः मानवता पर हमला कर बैठें। अतः शक्ति बल से शत्रुओं को परास्त कर देना वीरता का लक्षण अवश्य है किन्तु वह व्यक्ति महावीर है जो शत्रुओं को सात्विकता युक्त ज्ञान पथ की ओर अग्रसर करके प्रकाश प्रदान करता है। शत्रु को विवेकयुक्त बनाना उसको बल प्रयोग से परास्त करने से भी अनेकों गुना महत्वपूर्ण है। अपने शत्रुओं अर्थात् विपरीत लोगों को जो वेद भक्त बनाता है वह उत्तमोत्तम वीर है, सच्ची प्रशंसा का पात्र है और मानव जाति में श्रेष्ठ है यह इस वेद मंत्र में कहा गया है। इससे वेद प्रचारक की महत्ता, महानता, उत्तमता का एवं समाज में उच्च स्थान का ज्ञान होता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि वेद प्रचारक अर्थात् जन मन में ज्ञानज्योति जलाने वाले परिव्राजक राष्ट्र के प्राण, मानव जाति के शुभचिंतक, एवं देवस्वरूप होते हैं। जिस देश का परिव्राजक जीवित रहता है घर घर जाकर वेद सन्देश सुनाता है, जन मन में जागरण का सन्देश सुनाता है मानवता के शत्रुओं को सदाचारी ज्ञान निष्ठ बनाता है वह राष्ट्र वह जाति, वह समाज भाग्यवान होता है। उसके कदम प्रगति, उन्नति, एवं उत्थान की और अग्रसर हो उठते हैं। मृत प्रायः जाति में दिव्य चेतना का संचार हों उठता है। उदाहरणार्थ भारत के वैदिक युग महाभारत एवं रामायण काल को देखें। उस समय सच्चे परिव्राजकों ने आर्य जाति को, इस पुण्यमयी ऋषि भूमि को सब तरह से उन्नति एवं विकास की ओर अग्रसर किया जिसके फलस्वरूप संसार में प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ।

परिव्राजक वेद प्रचारक, बनने के लिए मुख्यतया निम्न बातों की आवश्यकता है जिन्हें अपना कर स्वयं युग एवं मानव जति का कल्याण किया जा सकता है।

(1) कर्तव्य निष्ठा - परिव्राजक का कर्तव्यनिष्ठ होना प्रथम व्रत है। इसलिए तपश्चर्या और त्याग की आवश्यकता है। अपने जीवन को यम, नियम साधना, सेवाकार्य आदि तपश्चर्याओं में तपा-तपा कर शुद्ध बना लेना आवश्यक है। क्योंकि जो स्वयं हुआ नहीं हैं वह दूसरे को क्या तपा सकता हैं? उसका स्वयं का जीवन व्यवहार आदि आदर्शपूर्ण नहीं है वह दूसरे को कैसे प्रभावित कर सकता है और अपनी छाप छोड़ सकता है। यह ध्रुव सत्य है कि कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति के शब्द जो ही दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। हमारे ऋषि महर्षि आदि कर्तव्य निष्ठ थे। यही कारण है कि आज भी उनकी वाणी अज्ञानी को ज्ञान प्रकाश; अशक्त को महान् शक्ति, दुराचारी और अनैतिक लोगों को सदाचार और नैतिकता, ईश्वर दर्शनाभिलाषियों को ईश दर्शन प्रदान करती हैं। कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति के शब्द अन्तरात्मा से निकले होते हैं जो विपरीत व्यक्ति पर भी सफल प्रभाव डालते हैं इसे ही सिद्धि महापुरुषों का चमत्कार कहते हैं।

जीवन निष्ठा के साथ-साथ परिव्राजक में त्याग वृत्ति होना अत्यावश्यक हैं। उसके हृदय में यह भावना प्रतिध्वनित होनी चाहिए कि “मैं ईश्वरीय आदेशों को जन मन में उतारने के लिए उसका एक माध्यम बनकर आया हूँ।” ईश्वर ने मेरा कार्य “देना ही देना” बताया है और वह भी सद्ज्ञान इसके बदले में मुझे संसार से बहुत ही कम जीवन निर्वाह की सामग्री मात्र लेनी हैं। जब तक यह भाव पैदा नहीं होता और इसके प्रति निष्ठा नहीं होती तब तक परिव्राजक का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकता। परिव्राजक के लिए अपने पवित्र उद्देश्य की पूर्ति एवं कर्तव्य पालन के लिए सर्वस्व यहाँ तक कि अपने शरीर को त्याग देने के लिए तैयार रहना चाहिए। यही महान् वीर परिव्राजक जन जागरण ज्ञान प्रचार जनकल्याण आदि कार्यों के उद्देश्यों को कर्तव्यों को पूर्ण कर सकता है जिसने त्याग को ही जीवन की कसौटी बनाया है। वही विश्व में नव चेतना फूँक सकता है। त्यागहीन जीवन इस ओर कुछ नहीं कर सकता।

परिव्राजक को इस त्याग पथ पर अग्रसर होने के साथ-साथ अपने कर्तव्य पालन के बदले कीर्ति, यश, नामवरी, या अन्य किसी प्रकार की कामना होना स्वर्ण घट में विष भरे होने के सदृश्य ही हैं जिसे सभी लोग घृणा, की दृष्टि से देखेंगे और दूर हट जायेंगे। अतः इनसे भी दूर रहना चाहिए।

(2) योग्यता वृद्धि-धर्म प्रचारक को जीवन भर विद्यार्थी का जीवन व्यतीत करना चाहिए। ज्ञान−विज्ञान की साधना को निरन्तर जारी रखना चाहिए। जब तक परिव्राजक का ज्ञान परिपूर्ण रूप से नहीं होता तो वह दूसरों में ज्ञान प्रकाश भली प्रकार पैदा नहीं कर सकता। ज्ञान प्राप्ति और बुद्धि बल के विकास के लिए जीवन भर विद्याध्ययन और साधना अत्यावश्यक है। अपने कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए भी उक्त दोनों क्रम योग्यता वृद्धि के लिए चलते रहने चाहिए।

(3) दृढ़ता और साहस- परिव्राजक का जीवन एक क्रान्तिकारी का जीवन होता है जिसमें वह ज्ञान प्रकाश, वेदवाणी, नैतिकता, सदाचार, जन जागरण की प्रतिष्ठापना करता है और विरोधी एवं दूषित तत्व अनैतिकता, असभ्यता, अज्ञानान्धकार मुर्दनी को समाप्त करता है। मानव जीवन में नवीन प्राण का संचार करता है। इस महान क्रान्तिकारी उद्देश्य में विघ्न बाधाओं, रुकावटों कठिनाईयों एवं विरोधी तत्वों का सबल आक्रमण होना भी सम्भव है किन्तु इनसे लोहा लेकर अपने पवित्र एवं महान उद्देश्य की और बढ़ने वाला परिव्राजक अदम्य उत्साह एवं अचल दृढ़ता से ही सफल हो सकता है। जहाँ पर अपने उद्देश्य के लिए कष्ट सहिष्णुता, दुःख, परेशानियों को सहर्ष झेलने की क्षमता नहीं वहाँ उपरोक्त गुणों से सम्पन्न होते हुए भी परिव्राजक जीवन का उद्देश्य सफल होना असम्भव है। हिन्दू धर्म के लिए कई ऋषियों ब्राह्मणों, परिव्राजकों को राक्षसों का आहार बनना पड़ा मौत के घाट उतरना पड़ा। बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए लाखों करोड़ों बौद्ध भिक्षु विदेशों में काट दिए गये, कइयों ने दलदलों में, नालों में, बीमारियों में फँस कर प्राण त्याग दिये कि उनके उत्साह और दृढ़ता ने तथा लगनशीलता में एशिया के बहुत बड़े भाग में बौद्ध धर्म का विस्तार किया। गत दो सौ वर्षों से ईसाई मिशनरियाँ किस प्रकार कठोर गर्मी सर्दी लू, भूख प्यास, परेशानियाँ, विरोध आदि को सहन करती हुई दृढ़ता और साहस के साथ विश्व में ईसाई धर्म प्रचार का कार्य कर रही हैं। अतः परिव्राजक के जीवन में अदम्य उत्साह, दृढ़ता और लगनशीलता की आवश्यकता है।

उक्त बातों के साथ-साथ साधु को संसार की निन्दा स्तुति की भी परवा नहीं करनी चाहिए। जो निन्दा स्तुति की चिन्ता करेगा वह परिव्राजक के महान उद्देश्य को पूर्ण नहीं कर सकता। विरोधी तत्वों द्वारा उत्पन्न निन्दा, किंवदंतियां आदि उसके कदम को रोक देंगी।

परिव्राजक की महानता, उद्देश्य और आवश्यक बातों को अपना कर जो व्यक्ति इस और बढ़ता है वह न केवल स्वयं का ही वरन् अपने कुटुम्ब, समाज देश तथा मानव मात्र का कल्याण करता है।

खेद है भारत भूमि जो विश्व के लिए परिव्राजकों की केन्द्र भूमि थी, जिसके निवासियों का जीवन ही इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए होता था आज वह परिव्राजकों से रहित होती जा रही है। विश्व की बात तो दूर रही स्वयं भारतीय जाति के लिए आज सच्चे परिव्राजकों की संख्या बहुत ही अल्प है। आज देश एवं जाति की इस महान आवश्यकता की पूर्ति के लिए राष्ट्र उन महान आत्माओं का आह्वान कर रहा है, भारत माता उन सपूतों की ओर आंखें लगाकर देख रही हैं जो परिव्राजक धर्म स्वीकार कर यहाँ पुनः वैदिक युग की स्वर्ण झाँकी को साकार करें। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आज हमारे देश को सच्चे परिव्राजकों, धर्मसेवकों धर्म प्रचारकों की अत्यन्त आवश्यकता है जो घर-घर जाकर नैतिकता, सदाचार, धार्मिकता, नवजागरण संगठन का सन्देश सुनायेंगे। इस आवश्यकता पूर्ति के लिए सेवा परायण, त्यागी, तपस्वी आत्माओं का तैयार होना आवश्यक है ताकि यह राष्ट्र पुनः उठ सके और उन्नति के शिखर पर पहुँच सके। भारतीय जाति नव चेतना, नव प्राण लेकर जाग उठे। इसमें संगठन हो, शक्ति हो, सामर्थ्य हो सम्पन्नता हो यही आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।

इस वेद मंत्र में उस वीर पुरुष का गुण गान किया गया है। जो अपने आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं की परवा न करके परिव्राजक बन कर संसार के ज्ञान धर्म और सदाचार की अभिवृद्धि के लिए प्राण प्रण से कार्य करता है।

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