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Magazine - Year 1959 - Version 2

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मृत्यु के बाद भी हम जीवित रहते है।

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(डॉ. चमनलाल गौतम)

मनुष्य का मरने के बाद क्या होता है, यह एक बड़ा गम्भीर प्रश्न है। कहने के लिये तो हमारे देश के अधिकाँश निवासी आस्तिक हैं, परलोक (स्वर्ग और नर्क) पर विश्वास रखते हैं और बात बात में इनकी दुहाई देते रहते हैं, पर वास्तव में इस विषय में कुछ समझने वाले और सच्चे दिल से विश्वास रखने वालों की संख्या बहुत ही कम है। क्योंकि जो व्यक्ति मुँह से तो परलोक और पुनर्जन्म का नाम लेता रहता है और इनके आधार पर लोगों को पाप कर्म न करने का उपदेश भी देता है, पर स्वयं जरा-जरा सी बात के लिये बेईमानी, छल, दगा करने को तैयार हो जाता है, तो हम कैसे मान लें कि वह परलोक पर विश्वास रखता है ? हम तो यही कहेंगे कि वह पक्का नास्तिक है, केवल पुराने संस्कारों के कारण स्वार्थ साधन के लिये स्वर्ग-नर्क का नाम लेता रहता है। यदि उसको सचमुच यह विश्वास हो कि प्रत्येक खोटे कर्म का फल हमको परलोक में मिलेगा तो फिर वह झूठ, कपट, विश्वासघात आदि का व्यवहार जानबूझकर और खुले आम कर ही कैसे सकता है?

इसमें तो तनिक भी सन्देह नहीं कि पुनर्जन्म और परलोक जीवन हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा सिद्धान्त है, और संसार के किसी अन्य धर्म ने इस विषय पर इस तरह बाकायदा खोज करके “मृत्यु के बाद के जीवन” को न तो सिद्ध किया है और न वे उसे जानते ही हैं। मुसलमान, ईसाइयों में परलोक का वर्णन नाम मात्र को है और उसे ऐसा रूप दिया गया है कि उससे मनुष्य के वर्तमान जीवन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। पर हिन्दू शास्त्रकारों ने इस विषय की ऐसी बारीकी से खोज की है कि मनुष्यों को अपने सब प्रकार के भले बुरे कर्मों के परिणामों का भली प्रकार ज्ञान हो जाता है और वे परलोक के स्वरूप को बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं। पर खेद है कि यह सब होने पर भी वे व्यवहार में इस बात का प्रमाण बहुत कम देते हैं कि उन्होंने इस ज्ञान से कोई लाभ उठाया है।

इसका कारण यही है कि इधर बहुत समय से लोगों ने पुराने समय की तरह अध्यात्मिक विषयों पर विचार और अभ्यास करना बन्द कर दिया है और साँसारिक धन, संपत्ति का महत्व उनकी निगाह में बहुत अधिक बढ़ गया है। अब वे आत्मज्ञान सिखलाने वाले गुरु की अपेक्षा तनख्वाह देने वाले सेठजी या मैनेजर साहब का बहुत अधिक आदर करते हैं। खाने पीने और भोग-विलास की आवश्यकताओं ने उनको ऐसा दबा लिया है कि उनको पारलौकिक और आगामी जन्म की समस्याओं पर ध्यान देने और इस विषय का अध्ययन करने की कभी फुरसत ही नहीं मिलती। इससे लोगों में धर्मभाव का ह्रास होता जाता है, स्वार्थ परता बढ़ती जाती है? नैतिकता और सच्चरित्रता की दृष्टि से पतन होता जाता है और ये पशुओं के सदृश्य खाने पीने और भोग को ही इस संसार में सार-वस्तु समझने लग जाते हैं।

इस दशा को देखकर अब अनेक संसार हितैषी व्यक्तियों ने परलोक के विषय में खोज और अध्ययन करके उसे ऐसे रूप में प्रकट करने का प्रयत्न किया है जिससे लोग वहाँ के सम्बन्ध में कुछ प्रत्यक्ष प्रमाण पा सकें और यह निश्चित रूप से जान लें कि परलोक की उपेक्षा करना उनके लिये वास्तव में घातक है। यह कार्य योरोप में प्रायः सौ वर्ष पहले उठाया गया था और इधर तो चालीस वर्ष से भारतवर्ष में भी हो रहा है। इसमें विभिन्न प्रकार के प्रयोग करके परलोक की आत्माओं से संदेश प्राप्त किये जाते हैं और उनके द्वारा मृतात्मा के सम्बन्धियों को विश्वास कराया जाता है कि वास्तव में उनके परिवार का मृत व्यक्ति परलोक में है। इन संदेशों में प्रायः ऐसी बातें होती हैं जिनको कोई बाहरी व्यक्ति नहीं जानता, इसी से अविश्वासियों को भी प्रमाण पाकर विश्वास करना पड़ता है।

परलोक विद्या से सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ है कि जिन लोगों के प्रिय सम्बन्धी बिछुड़ जाते हैं और जिनके वियोग में वे व्याकुल और दुःखी रहते हैं, जब उनके साँत्वना देने वाले संदेश उनको परलोक से प्राप्त हो जाते हैं तो उनको बहुत कुछ शाँति मिल जाती है। इस सम्बन्ध में सैंकड़ों उदाहरण ऐसे हैं कि परलोक विद्या ने लोगों की प्राण रक्षा कर दी, अन्यथा अपने प्रियजनों के वियोग में वे भी मर जाते।

दूसरा लाभ यह है कि संसार में इस समय जो जड़वाद या भौतिक विचारधारा फैलती जा रही थी, उसका परलोकवाद ने बहुत कुछ निराकरण कर दिया है। लोगों में जो नास्तिकता के भाव बढ़ते जाते थे और वे कहने लगे थे कि “मनुष्य तो केवल अणु-परमाणुओं का एक पुतला है, जिसका अन्त मरते ही हो जायगा, इसलिये मनुष्य को जब तक संसार में रहे खाना, पीना मौज उड़ाने के सिवाय और कुछ नहीं करना चाहिये। धर्म शास्त्र आदि सब खोटा ढोंग है, और परलोक की बातें स्वार्थी लोगों ने कल्पित करके फैला दीं इस प्रकार में मन माने विचारों से संसार में स्वार्थ परता का दिन दूना रात चौगुना विस्तार हो रहा था और नैतिकता की दृष्टि से मनुष्य दिन पर दिन गिर रहा था। परलोकवाद ने इस स्थिति को बहुत कुछ संभाला है और यह सिद्ध कर दिया है कि जीवन को इतना छोटा मानना और इसके फलस्वरूप मनुष्य से पशु श्रेणी में उतर जाना कार्य समझदारी की बात नहीं है। मनुष्य वही है जो शाश्वत जीवन पर विश्वास रख कर तदनुकूल व्यवहार संसार में करे। इसके लिये यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य अवश्य ही किसी विशेष धर्म का अनुयायी बन कर पूजा पाठ करे, पर विश्वव्यापी जीवन-धारा के नित्य (स्थायी) और सर्वत्र व्याप्त स्वरूप को जानना एक ऐसी अनिवार्य बात है कि जिसके बिना मनुष्य में सच्ची आस्तिकता मानवता का विकास प्रायः होना असम्भव है।

परलोकवाद के ज्ञान का एक शुभ परिणाम यह भी होता है कि विभिन्न मतमतान्तरों में पाई जाने वाली कटुता और विरोध का भाव शान्त हो जाता है और वे समझने लगते हैं कि हम चाहे कैसी भी विधि से पूजा पाठ और ईश्वर प्रार्थना करें पर मरने के बाद हमारी एक ही गति होने वाली है और उस समय सदाचरण और परोपकार का ही मूल्य सबसे अधिक माना जायगा। लौकिक धार्मिक रीति-रस्मों और उपासना की प्रणाली में तो देश, काल और समाज के भेद से अन्तर हो सकता है, उसको अधिक महत्व देना ओर उसके नाम पर ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुता के भावों को जन्म देना बुद्धिमानी की बात नहीं है। हम मंदिर मस्जिद और गिरजाघर में चाहे जैसी विधि से भजन और ईश-प्रार्थना करें पर हमको उसका उत्तम फल तभी प्राप्त हो सकेगा जब वह सच्चे हृदय से निकलेगी और उन विचारों को हम कार्य रूप में भी पूरा करके दिखायेंगे। इस उद्देश्य के लिये परलोक सम्बन्धी ज्ञान का प्रचार और उसकी कुछ जानकारी प्रत्येक व्यक्ति के लिये कल्याणकारी सिद्ध हो सकती है।

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