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Magazine - Year 1960 - Version 2

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मानवता का उच्च लक्ष्य और अधिकार

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(श्री रामेश्वर जी शिकारी, खरगोन)

‘मानव’ अथवा “मानवता” शब्द से अनेक प्रकार के अधिकारों और कर्तव्यों का बोध होता है। हमारे शास्त्रों के मतानुसार पूर्व जन्म के कर्मों के परिणाम स्वरूप ही बुरे और भले फल की प्राप्ति होती है। उच्च कोटि के सत्कर्म करने से ही जीव मानव योनि में आता है, और उसमें भी किसी ज्ञानी और शुभ कर्म करने वाले के यहाँ जन्म लेना और भी सौभाग्य का लक्षण है। आत्मा का स्वभाव ही नाना योनियों में भ्रमण करने का है और मुक्ति प्राप्त होने से पूर्व मनुष्य को भी बहुत से शरीरों में अवतरित होना पड़ता है। गीता में स्पष्ट कह दिया गया है- “ अनेक जन्म संसिद्धि ततोः यान्ति पराँगतिम्”। अपने पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का फल भोगने के लिये ही जीवात्मा भौतिक शरीर में आता है और संसार में भ्रमण करते हुये वह भविष्य के लिये “क्रियमाण-कर्म करता रहता है। वह जैसा कार्य इस समय कर रहा है, उसे उसी प्रकार का फल भविष्य में सहन करना पड़ेगा। गोस्वामी जी का कथन सर्वथा सत्य है-

कर्म प्रवान विश्व करि राखा।

जो जस करहिं सो तस फल चाखा॥

इसका आशय यही है कि सत्कर्म और शुद्धाचरण द्वारा मनुष्य हर प्रकार की उन्नति करने और अन्त में मुक्ति प्राप्त करने का पूर्ण अधिकारी है। मनुष्य के भीतर जीवात्मा है वह परमात्मा का अंश होने के कारण सब प्रकार की शक्तियों का धारक और सर्वज्ञ है। वह कर्मों से बंधा होने के कारण विभिन्न योनियों में भ्रमण करता रहता है। उसकी श्रेष्ठता और हीनता और अवनति उसके कर्मों पर ही निर्भर है। वह चाहे श्रेष्ठ कर्म करके भगवान बन जाय और चाहे नीच कर्म करके नरक का कीड़ा हो जाय। जिस मानव देह की गर्मी (ताप) नष्ट हो जाती है उसे मुर्दा कहा जाता है। इसी प्रकार जिस मनुष्य का जप-तप क्षीण हो जाता है उसे सत्कर्मों में अरुचि हो जाती है उसकी आत्मा पतित हो जाती है। इसके विपरीत श्रद्धा, विश्वास की आन्तरिक भावना लेकर कर्म करने से शक्ति संचय होता है, जिसके द्वारा वह आत्मोन्नति के मार्ग में अग्रसर हो सकता है।

भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने सबसे उत्कृष्ट कर्म यज्ञ को बतलाया है। यज्ञ रूपी तप से ही त्याग और दान की भावना जागृत होती है। यज्ञ रूप तप से ही समस्त ब्रह्माण्ड के प्राणियों का पालन पोषण होता है। शास्त्र में कहा गया है कि यज्ञ द्वारा ही ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। सब प्रकार के यज्ञों में गायत्री यज्ञ सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि इससे आत्म-कल्याण के साथ ही विश्व-कल्याण भी साधित होता है और सच पूछा जाय तो विश्व कल्याण अथवा परमार्थ की भावना ही आत्म कल्याण का सबसे बड़ा साधन है। इसलिये जब यज्ञ आसन पर बैठते ही साधक निम्न श्लोक उच्चारण करता है।

ॐ अपवित्र पवित्रोवा सर्वावस्थाँ गतोऽपिवा।

यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं सः बाह्य भ्यंतरः शुचि॥

वैसे ही उसके अन्तर में शान्ति और आनन्द की एक लहर व्याप्त हो जाती है। इसके बाद आचमन का मंत्र बोलकर वह अपनी दृष्टि को विश्वव्यापी बनाने के लिये कहता है-

ॐ स्वस्तिन नः इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः।

स्वन्तिनस्ताक्ष्योऽरिष्टनेमि स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु॥

“हे इन्द्रदेव, विश्वेदेवा, गरुड़, बृहस्पति आप हमारा सबका आत्म कल्याण करें।” इस प्रार्थना में यज्ञकर्ता अपने लिये भौतिक वैभव की इच्छा नहीं करता, वरन् विश्वकल्याण की भावना को जागृत करके सबके साथ आत्मोन्नति की कामना करता है। इसके लिये वह मनुष्य मात्र ही नहीं वरन् प्राणीमात्र तथा पंच भूतों के लिये सच्ची शान्ति की अभिलाषा प्रकट करता हैं-

“ॐ धौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति रोषधयः शान्तिः बनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि।”

“आकाश, भूतल, मध्यभाग, अन्तरिक्ष, जल, औषधियों वनस्पतियाँ, देवगण, ब्रह्मारूपात्मक तत्व सर्वत्र सब कुछ सर्वदा शांति ही शान्ति हो।” कितनी विशाल और उद्दात्त भावनायें भरी हुई हैं इस प्रार्थना में प्राणीमात्र से भ्रातृभाव- आत्मभाव की इससे बढ़कर भावना क्या हो सकती है? इसीलिए फिर इससे भी अधिक स्पष्टता के साथ कहा है-

“ॐ विश्वानिदेव सवितुर्दुरितानि परासुव।

यद् भद्रं तन्नः आसुव॥

“हमारे समस्त पापों को नष्ट कर दीजिये और जो कुछ कल्याणकारी है वह हम सबको प्रदान कीजिये।” इस प्रकार जो व्यक्ति आन्तरिक मन से नित्यप्रति ऐसी भावनाएं करेगा अगर वह आदर्श जीवन की ओर अग्रसर हो तो इसमें आश्चर्य क्या है? इस प्रकार वह सहज ही में देवत्व प्राप्त कर सकता है। इससे बढ़कर मनुष्य के लिये कौन सा अधिकार हो सकता है। शोक है उन मानव नाम धारियों के लिए जो ऐसा अधिकार और समस्त शक्तियों के होते हुये भी जड़ पदार्थों के लालच में पड़ कर पतित बनाने वाले कर्म करते हैं। ऐसे ही हतभाग्यसों के लिए महात्माजनों ने कहा है-

जन्मैव व्यर्थता नित्यं भव भोग प्रलोभिना।

काँच मूल्येन विक्रतों हन्तं चिन्तामणिर्मया॥

“संसार के भोगों के लोभी अपना जन्म व्यर्थ ही खो देते हैं और चिन्तामणि रूपी मानव जन्म को विषय भोग रूपी काँच के मूल्य में बेच डालते हैं।” कैसे शोक की बात है कि जन्म मरण रूपी रोग की दवा नहीं करते, तो फिर पशु आदि की योनि प्राप्त होने पर वे क्या करेंगे? मनुष्य, आज करूंगा, कल करूंगा- इसी प्रकार सोचते विचारते समय बिता देता है। जब समय पूरा हो जाता है और काल-भगवान सम्मुख उपस्थित हो जाते है तब पछताने लगता है कि मैंने इतना समय आलस्य में व्यर्थ गँवा दिया। इसी बात को लक्ष्य में रखकर रावण ने लक्ष्मण जी को राजनीति का उपदेश देते हुये कहा था कि “सबसे बड़ी नीति यही है कि जो कुछ श्रेष्ठ कार्य हो उसे तुरन्त पूरा कर लो और जो कार्य निकृष्ट जान पड़े उसके लिये रुक कर विचार करो, ऐसा करने से सम्भवतः वह खराब विचार समय बीत जाने से स्वयं मिट जायेगा। “मनुष्य की प्रशंसा इसी में है कि भूल से अथवा जानकारी न होने से अयोग्य कर्म अपने से उन्हें ज्ञान होने पर त्याग देना और धर्म तथा नीति के अनुकूल आचरण करना।

खेद है कि वर्तमान समय में ऐसे व्यक्ति भी उत्पन्न हो गये हैं जो स्वयं तो धर्म और जप,तप, यज्ञादि शुभ कर्मों से दूर रहते ही हैं, पर अन्य लोग जो इन्हें करना चाहते हैं, उनके मार्ग में भी बाधक बनते हैं। ऐसे व्यक्ति सोचते हैं कि अगर लोग सत् मार्ग पर चलने लग गये, तो हम उनके साथ जो मनमाना व्यवहार करते रहे और उनको हर तरह से दबा कर रखते आये, उसमें अन्तर पड़ जायेगा। क्योंकि अन्याय, अनाचार, मनमानी आदि बातें दूषित वातावरण में ही पनप सकते हैं। पुण्य और श्रेष्ठ कर्मों के प्रकाश में उनकी दाल नहीं गल सकती। ऐसे “बड़प्पन” के भूखे लोगों के लिये क्या कहा जाय यह समझ में नहीं आता। पर कुछ भी हो हम यह जानते हैं समय बदल गया है, समाज में आध्यात्मिकता की एक नई चेतना उत्पन्न हो गई है और वह ऐसे स्वार्थी जनों के अड्डा लगाने की नीति से रुक नहीं सकती। जो मानव जीवन के आदर्श को समझकर कल्याणकारी मार्ग को ग्रहण कर लेगा, वह अवश्य मानवता के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करके रहेगा।

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