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Magazine - Year 1960 - Version 2

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संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु प्राप्त करें!

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(श्री आत्मदर्शी)

आप से पूछा जाय कि क्या आप इस संसार और मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ वस्तु प्राप्त करना चाहते है? तो आप अवश्य पूछेंगे कि “बतलाइये वह क्या है? हम अवश्य ही उसे प्राप्त करना चाहेंगे।”

हमारे पास अधिक धन नहीं है, जो कुछ भी है, उसे देकर यदि हम संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु पा सकें, तब भी हम उसे पाना चाहेंगे।

हमारे पास दो हाथों की शक्ति है। यदि उससे हम उस श्रेष्ठ वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं, तो इसमें कोई कमी नहीं रखेंगे। अपनी सीमित शारीरिक शक्ति से अवश्य ही उसे प्राप्त करेंगे।

हमारे पास एक क्रियाशील मस्तिष्क है। उसकी सहायता से यदि हम इस श्रेष्ठतम वस्तु को पा सकते हैं, तो अवश्य उसे पाना चाहेंगे।

लेकिन निश्चय जानिये वह वस्तु न धन से, न शारीरिक शक्ति से, न किसी बड़ी बाहरी ताकत से ही जीती जा सकती है। वह तो हम सब के लिए सर्व सुलभ है। पहुँच के भीतर है। उसके लिए केवल सतत और निरन्तर अभ्यास मात्र की ही आवश्यकता है।

संसार में सर्वश्रेष्ठ और सर्वशक्तिवान वस्तु बड़ी दिव्य और अदृश्य है। हम सभी के पास वह मंत्र है, जिसमें यह वस्तु उत्पन्न की जा सकती है। अथर्ववेद में कहा गया है :-

त्वं नो मेधे प्रथमा

-अथर्व. 6।108।1

सद्विचार ही संसार में सर्वश्रेष्ठ वस्तु है।

विचार उत्पन्न करने का यंत्र हमारा मस्तिष्क है मस्तिष्क का कार्य नए नए विचार उत्पन्न करना है। सद्विचार एक सही दिशा में बहने वाली शक्ति है। जो विचार मनुष्य को नई शक्ति, नई भावना से भर देता है और निरन्तर सही मार्ग में प्रगति की इच्छा उत्पन्न करता है, वह मानव की बहुमूल्य सम्पत्ति है। विचार मंत्र को सही तरह चलाने से मनुष्य निरन्तर आगे बढ़ता जाता है लेकिन उस मंत्र को गलत रीति से घुमा कर कष्टों में फँस सकता है। मन में उद्विग्नता पैदा कर नाना प्रकार की गलतियाँ कर सकता है।

ऐसे व्यक्ति भाग्यशाली हैं, जो विचार मंत्र को ठीक तरह से संचालित कर जीवन को सद्प्रेरणा से भर लेते हैं और किसी प्रकार की दूषित भ्रान्तियों या अंध विश्वासों में नहीं फँसते। विचार मंत्र को उल्टी दशा में घुमा देने से मनुष्य नाना भ्रान्तियों, रूढ़ियों, अंतर्मन की जटिल ग्रन्थियों से भर जाता है। उसका राक्षसी स्वरूप उभर उठता है। आज समाज में जो व्यक्ति भ्रमित, चिन्तित है, उद्विग्न रहते हैं, मानसिक परेशानियों से आक्रांत रहते हैं, उसका मुख्य कारण यह है कि वे विचार मन्त्र का गलत प्रयोग कर रहे हैं। जिस मंत्र से वे देवत्व को जाग्रत कर सकते हैं, उसी को गलत दिशा में घुमा कर वे अपने घिनौने स्वरूप को जगाते हैं और दुख के नर्क में पड़े रहते हैं। सही रूप में प्रयुक्त मस्तिष्क का फल सद्विचार है। गलत रूप में प्रयुक्त मस्तिष्क का कुफल कुविचार और कुकल्पनाएं हैं। कुविचार मनुष्य को जीते जी नर्क की अग्नि में धकेल देते हैं। कुविचारी आत्म हीनता की, या अपनी कमजोरी की बात सोच सोच कर मन में नाना यन्त्रणायें सहा करता है, चिन्तित परेशान हुआ करता है। दूसरों को अपना शत्रु समझता है। रोग शोक, चिन्ता, व्याधि, कटुता, ग्लानि, निर्बलता, शक्तिहीनता इत्यादि के कुविचार मनुष्य के भारी शत्रु हैं। सही दिशा में चलने वाला मस्तिष्क मनुष्य का प्रेरक है, गलत दिशा में चलने वाला सबसे बड़ा शत्रु।

संसार में मनुष्यों, अपने मस्तिष्क को सही दिशाओं में चलाओ। गलत दिशा में लगाकर जीवन को भार मत बनाओ। गलत दिशा ही जीवन को भार स्वरूप बनाने वाली विभीषिका है। एक विद्वान को समझदार और बुद्धिमान व्यक्ति को अपने मस्तिष्क से सद्विचार ही उत्पन्न करने चाहिए। आत्मविश्वास विकसित करना चाहिए। यहाँ हम कुछ विचार बीज दे रहे हैं। इन्हीं दिशाओं में विचार मंत्र को घुमाना चाहिए। एक विचार बीज को मानसिक खेत में बो देने से वैसे ही शुभ वृक्ष, उत्पन्न होते हैं और मन एक रम्य वाटिका बन जाता है।

कुछ दिव्य प्रेरक विचार बीज

जहाँ आशा, विश्वास उत्साह, और स्थिर बुद्धि होती है, वहाँ लक्ष्मी तथा हर प्रकार का सौख्य आता है, यह मेरी निश्चित नीति और निश्चित मति है। मैं अपनी उन्नति की आशा अपनी शारीरिक, बौद्धिक, और मानसिक शक्तियों के प्रति पूर्ण विश्वास और अपने लक्ष्य के प्रति उत्साह की पूँजी लेकर जीवन में प्रविष्ट होता हूँ। अपने उद्देश्य में मेरी बुद्धि पूर्ण रूप से स्थिर है।

जिसका अपनी आत्मा में विश्वास होता है, पृथ्वी में उसके लिए कौन सी वस्तु साध्य नहीं है? आत्मा ही सब शक्तियों और गुणों का अपने आप एक उत्पत्ति स्थल है। मैं अपनी आत्मा को ईश्वर का दिव्य रूप समझता हूँ। मुझमें ईश्वर मेरी आत्मा का रूप धारण कर विराजमान हैं। मेरे मन, वचन और कर्मों के माध्यम से ईश्वर ही प्रकट हो रहा है।

जिसका आत्मा में विश्वास नहीं होता, जो उसकी आज्ञा को नहीं सुनता, उनका चित्त सदा संशय से उद्भ्रान्त रहता है और वह सर्वत्र भ्रान्ति ही भ्रान्ति को पाता है। मैं यह जान कर सही दिशा में ही चलता हूँ।

“यस्य तस्मिन्न विश्वासः तदाज्ञाँ न शृणोति यः

संशयोद् भ्रान्तचित्तः स भ्रान्ति मेवाधिगच्छति॥”

-विद्याधर नीतिरत्नम्

अत्यन्त थक कर भी, यदि कोई अपने साहस और उत्साह को न छोड़े, तो दुर्गम अरण्य भ्रान्त होकर भी वह अपने मार्ग को अवश्यमेव पा जाता है। मैं कठिन स्थितियों में भी अपने साहस और उत्साह को सम्हाले रहता हूँ। अतः मैं अपने सही मार्ग पर चलता रहूँगा।

अनन्ते के वयं क्षुद्रा नैवं चिन्त्यं कदाचन

कणस्य पर्वतस्यापि स्थितिस्तस्मिन् यतः समा

-वि नीतिरत्नम्

इस अनन्त ब्रह्माण्ड में हम क्षुद्रों की क्या पूछ है ऐसा कभी मत विचारों, उसमें कण और पर्वत दोनों एक समान स्थिति है। इन दोनों को अपने विकास का समान अवसर मिलता है। मैं चाहे कण हूँ, तो भी विकसित हो सकता हूँ। मुझे निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। बूँद बूँद से सागर बनता है। शक्ति का कण कण एकत्रित कर मैं महानता की ओर बढ़ रहा हूँ।

निर्धन और निर्बल होकर भी मानव सदा ही महान है। मानव को मानव बनाना चाहिए। मानवता को प्राप्त करना ही उसकी अन्तिम गति है। मैंने अपने इस जीवन में ही महानता की सिद्धि को अपना लक्ष्य चुना है।

किं धनं किम् बलं लोके का वा राजादिसत्क्रिया

नैतिकं बल माधेयम् यद्धि सर्वार्थ साधकम्॥

-विद्याधर नीतिरत्नम्

धन क्या, बल क्या, अथवा राजाओं से प्राप्त सत्कार भी कौन−सी विशेषता रखता है? ये कुछ नहीं। नैतिक बल को धारण कीजिए जो कि समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाला है।

“हीनोऽहं हन्त दीनोऽहम व्यामोहं त्यज सत्वरम

नाकाशों रजसाक्रान्तो चिरं म्लानोहि तिष्ठति।”

-विद्याधर नीतित्नम्

मैं हीन हूँ। मैं दीन हूँ। इस व्यामोह को सदा के लिए त्याग दीजिए। आकाश चिरकाल तक केवल धूल से ही आच्छन्न नहीं रह सकता है। अन्त में उसे स्वच्छता प्राप्त होती है। धूल इत्यादि तो क्षणिक है। इसी प्रकार आपकी परेशानियाँ क्षणिक हैं। अस्थायी हैं। अल्पकालिक हैं, वे अब अन्त के निकट ही हैं। क्यों व्यर्थ ही घबराते या अशान्त होते हैं। स्मरण रखिए, न आप दीन है, न आप किसी भी प्रकार से हीन या निर्बल हैं। आप तो सत्चित् आनन्द स्वरूप परम शक्तिशाली आत्मा हैं। आपमें अद्भुत गुप्त शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं।

आत्म विश्वास की कुँजी से उन्हें खोलिये।

प्रसुप्तं नाम यत् किञ्चत् ज्योति स्तेन्त र्विराजते

कुरु यत्नेन तद् बुद्धम लोको बुद्धो भविष्यति।

- विद्याधर नीतिरत्नम्

जो ज्योति आप में सुप्त हो रही है, उसको यत्न पूर्वक प्रबुद्ध कीजिए उस ज्योति के प्रबुद्ध होने पर समस्त संसार भी प्रबुद्ध हो जायेगा।

“ध्रुवं कुर्त्तु समर्थेऽसं सर्व सर्वत्र सर्वदा”

एषा सुभावना रक्ष्या व्यक्तिभिः सन्ततं दृढा।

- विद्याधर नीतिरत्नम्

व्यक्तियों का कर्तव्य है कि वे निरन्तर इस भावना को दृढ़ रखें कि मैं सब स्थानों पर सदा सब कुछ करने में निश्चित रूप से पूर्णतः समर्थ हूँ। इस भावना को दृढ़ करने से मनुष्य की गुप्त शक्तियाँ विकसित होती हैं। अपनी शक्तियों के प्रति मनुष्य का जितना दृढ़ विश्वास पकता जाता है, ज्यों-ज्यों उसमें महानता के गुणों का आविर्भाव होता जाता है।

सद्विचार (अपनी बुद्धि प्रतिमा और शक्तियों के प्रति अखण्ड विश्वास) ही मनुष्य की उन्नति का मूल मन्त्र और संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। उसे धारण करने से मनुष्य सफलताओं की ओर स्वतः अग्रसर होने लगता है। जिसने अपने विचार मंत्र को सही दिशा में चलाना सीख लिया है उसकी उन्नति में देर नहीं समझनी चाहिए।

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