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Magazine - Year 1960 - Version 2

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महाशिवरात्रि की प्रेरणा

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First 17 19 Last
(डॉ. चमनलाल गौतम)

हिन्दू धर्म अध्यात्म प्रधान धर्म है। इसका दृष्टिकोण भौतिक नहीं वरन् आध्यात्मिक है। हमारे पूर्वजों ने भली प्रकार जान लिया था कि क्षणभंगुर भौतिक सुखों से मनुष्य कभी भी स्थाई सुख शाँति प्राप्त नहीं कर सकता। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए मानसिक व आत्मिक विकास की आवश्यकता है। आत्मिक उन्नति के लिए उन्होंने धार्मिक नियमों को बनाया जिसे अपना कर मनुष्य अपनी पाशविक वृत्तियों को कम करता हुआ अपने परम लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है। इन धार्मिक नियमों में अनेक प्रकार की साधनाएँ व उपासनाएं हैं। उनमें एक-व्रत की साधना भी है। व्रत से शारीरिक, मानसिक व आत्मिक सब प्रकार की उन्नति होती है। विश्राम से शारीरिक क्षेत्रों में नवजीवन आ जाता है। पाचन प्रणाली को भी विश्राम लेने की आवश्यकता पड़ती है जिससे पेट में पड़ा हुआ अन्न हजम हो जाता है और पेट आगामी कार्य के लिए तैयार हो जाता है और शक्ति आने से इसके बाद खाया हुआ अन्न स्वाभाविक रूप से पच जाता है। व्रत से दोषों व दुर्गुणों का परिमार्जन होता है। शरीर के सूखने से वह भी सूखने लगते है। आध्यात्मिक प्रगति का तो यह अमोघ उपाय है। चिंतन और मनन के लिए उत्तम अवसर होता है। अधिक खाने वाले व्यक्तियों के विचार स्थूल होते हैं। वह कोई सूक्ष्म बात नहीं सोच सकते। पेटू लोग प्रायः स्थूल बुद्धि के होते हैं इसलिए बुद्धि में तीव्रता लाने के लिए हमारे धर्म शास्त्रों में व्रतों का विधान है। व्रत के दिन जो विचार मन में आते हैं, उनकी एक अमिट छाप मस्तिष्क पर पड़ जाती है। हमारे धर्माचार्यों ने व्रतों के साथ ऐसी कथाओं और विचारों को जोड़ दिया है जो हमारे इस जीवन और परलोक को भी सुधारने में सहायक सिद्ध होते हैं। महाशिवरात्रि व्रत जो फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है और इस वर्ष 25 फरवरी 1960 को पड़ रहा है, हमारे लिए महान सन्देश लाता है।

जब समुद्र मंथन हो रहा था और अनेक प्रकार की उपयोगी वस्तुओं के निकलने के पश्चात् जब हलाहल विष निकला तो सब देवता घबरा गए कि यदि यह विष संसार में फैल गया तो समस्त संसार इसके प्रभाव से संतप्त हो जाएगा, संसार में एक प्रकार की प्रलय आ जाएगी, प्राणियों का जीवित रहना कठिन हो जाएगा, सोच विचार कर देवता भगवान शंकर के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वह इस होने वाले अनिष्ट से बचने का उपाय बताएं और सहायता दें। महादेव कहलाने वाले शंकर ने अपने शरीर की परवाह न करते हुए उस हलाहल विष का पान करने का निश्चय किया। जिस व्यक्ति के मन में परोपकार की भावनाएं जाग्रत हो जाती हैं भगवान स्वयं उसकी सहायता करते हैं, उसकी आत्मिक शक्तियों का विकास होने लगता है,

आज के युग में अशान्ति फैलने का प्रमुख कारण स्वार्थपरता है। हर एक व्यक्ति और देश दूसरों को हड़प जाना चाहता है और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के हानि लाभ को नहीं देखता है। एटम व हाइड्रोजन बम का आविष्कार इसी मनोवृत्ति के आधार पर हुआ है। यदि राष्ट्र नायकों के मस्तिष्कों से यह स्वार्थ भावना जाती ही रहे तो संसार में शान्ति की स्थापना कोई कठिन कार्य नहीं है। मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन को लिया जाए तो विदित होता है कि वह अपने व्यक्तिगत जीवन में इसी तत्व के आधार पर सुख शान्ति को स्थिर रख सकता है।

आज हमारे देश में लाखों नर नारी भगवान शिव के उपासक हैं। उपासना का अर्थ है समीप बैठना। उपासक देव के गुणों का चिन्तन मनन, उन्हें ग्रहण करने का प्रयत्न करना, उस पर अग्रसर होने की चेष्टा करना। सच्चे शिव के उपासक वही हैं जो अपने मन में स्वार्थ भावना त्याग कर परोपकार की मनोवृत्ति को अपनाते हैं जब हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होने लगते हैं तो हम अपने आत्मीयजनों के साथ झूठ, छल,कपट, धोखा, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष आदि से मुक्त हो जायेंगे। यदि शिवरात्रि व्रत के दिन हम इस महा पथ का अवलम्बन नहीं लेते तो शिव का व्रत और पूजन केवल लकीर पीटना मात्र रह जाता है। उसका कोई विशेष लाभ नहीं होता ।

भगवान शिव का नंगा रहना अपरिग्रह प्रतीक है। परिग्रह एक प्रकार का पाप है क्योंकि किसी वस्तु का परिग्रह करने का अर्थ हुआ दूसरे को उस वस्तु से वंचित रखना। अन्न के भण्डार जमा रखने वाला दूसरों को भूखा मारने के लिए बाध्य करता है। जिसके अनेकों मकान और बंगले हैं, वह औरों को झोपड़ी बनाने से भी वंचित रखते हैं। संसार में परिग्रह करने वाले धनवानों का पूजन और सम्मान कोई नहीं करता बल्कि त्यागी, तपस्वी और अपरिग्रही सन्तों की, महात्माओं की चरणाधूल मस्तक पर लगाई जाती है। उनका जीवन आदर्श संसार में शान्ति स्थापित करने के लिए होता है भगवान शंकर सर्वशक्तिमान थे परन्तु उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं किया। सादा जीवन और उच्च विचार ही उनके जीवन का आदर्श रहा। इसी से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की उन्नति होना सम्भव है।

भगवान शिव ने योग साधना से अपने जीवन को परिष्कृत किया था। वह गुणों के भण्डार थे। शक्ति उनके इशारे पर नाचती थी। वह अपने तीसरे नेत्र से बड़ी से बड़ी शक्ति को जला कर राख करने की सामर्थ्य रखते थे। कामदेव को तो उन्होंने भस्म कर दिया था। हमें भी शक्ति की वृद्धि करके अपने व्यक्तिगत जीवन व समाज में से अनैतिकता, अश्लीलता और कामुकता को दूर करने का प्रयत्न करना है।

महादेव रुण्डों की माला अपने गले में पहनते थे अर्थात् क्रोध को वश में किए हुए थे। गंगा उन की जटाओं से निकल रही है। आध्यात्मिक शान्ति की गंगा का प्रवाह उनसे आरम्भ होता है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा का चिन्ह रहता है। वह शान्ति प्रिय और संसार को शान्ति का प्रकाश देने वाले हैं। वह निरंतर अपनी साधना में लीन रहते हैं। इसी उपाय से उन्होंने अनेक प्रकार की शक्तियों को प्राप्त किया है। गायत्री मंजरी नाम की पुस्तक में वर्णन आता है कि भगवान शिव की साधना का मूलाधार गायत्री उपासना था। इसे उन्होंने पृथ्वी की सबसे बड़ी शक्ति कहा है। वह अखण्ड अग्नि अर्थात् यज्ञ भगवान के समक्ष अपनी साधना का उनके जीवन में विशेष स्थान था। इनके द्वारा प्राप्त शक्ति के द्वारा ही त्रिशूल अथवा त्रितापों को दूर करने की सामर्थ्य रखते थे। यदि हम भी सुखी रहना चाहते हैं तो हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।

महान आत्माएं अपने व अन्य प्राणियों में कोई अन्तर नहीं मानती। वह दूसरों को अपने बराबर ही समझते हैं। उनके मन में छोटे बड़े का कोई भेदभाव नहीं रहता। गीता में भगवान ने स्वयं कहा है कि पंडित और ज्ञानी वह है जो विद्या विनय युक्त ब्राह्मण, हाथी गाय आदि को एक समान मानता है। आज लोग धन, वैभव पद, प्रतिष्ठा, आदि के पद में अपने से छोटों को दुत्कारते हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं और अपने छोटेपन का परिचय देते हैं। वह कभी यह नहीं सोचते कि इस प्रकार का व्यवहार उनके साथ किया जाए तो उन्हें कैसा लगे? ब्राह्मण अपने से छोटी जाति में उत्पन्न मनुष्यों से घृणा करते हैं। परन्तु महादेव ने तो भूत, प्रेतों को अपना साथी बनाया अर्थात् छोटी जाति वालों को अपने गले से लगाया, उनके उत्थान के लिए सत्प्रयत्न किए। महात्मा गाँधी इस गुण में आज के युग के शिव ही थे। शिवरात्रि व्रत मनाने का अधिकार ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल तक को है भोले बाबा के लिए सब एक समान हैं।

यह धारणा है कि भगवान शिव भाँग व धतूरे खाते पीते थे अतः हमें भी उसका सेवन करना चाहिए। वह तो परोपकार की मूर्ति थे। प्राणियों को इनके विषैले प्रभाव से हानि न हो इसलिए वह इन्हें ग्रहण करते थे। हम भी अपने समाज के लिए अपने शरीर को कष्ट पहुँचाए तो ही भाँग धतूरा खाने की अलंकारिक भाषा की वास्तविकता को समझ सकते हैं।

एक वर्ष के बाद भगवान शिव हमें चैतन्यता प्रदान करते हैं कि “संसार के लोगों! उठो और जागो यदि अपनी और दूसरों की सुख शान्ति चाहते हो तो अपरिग्रह, सादा जीवन, उच्च विचार, अक्रोध, परोपकार, समता, परदुःख कातरता, परमात्मा की समीपता को अपनाओ। भोग विलास का जीवन व्यतीत करने से क्षणिक सुख भले ही मिल जाय परन्तु उसमें स्थायित्व नहीं है। स्वार्थ में क्षणिक आनन्द अवश्य आता है परन्तु उसका अन्त पतन में है। केवल अपनी उन्नति में ही सन्तुष्ट न रहो वरन् दूसरों की, अपने समाज और राष्ट्र की उन्नति को अपनी सफलता मानो।” इन सन्देशों को यदि हम अपने अन्तःकरण में स्थान देते हैं तो हम सच्चे शिव उपासक हैं।

गायत्री परिवार के प्रियजनों को यह महाशिवरात्रि व्रत निष्ठापूर्वक मनाना चाहिए। अपनी शाखा के सब सदस्यों का व्रत रखने की प्रेरणा देनी चाहिए और विधि पूर्वक शिव पूजन करना चाहिए। प्रातः काल गायत्री यज्ञ और सत्संग का आयोजन करें जिसमें भगवान शिव के गुणों का गान और समाज के प्रति कर्तव्यों पर प्रकाश डाला जाय। जनता से इस पुनीत पर्व पर नशीली वस्तुओं के त्याग के संकल्प लेने चाहिये। त्याग, परोपकार, सादा जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वह इस शुभ अवसर पर जनता को महान अनिष्ट से बचाने के लिए सिगरेट, बीड़ी, शराब, भाँग, गाँजा, अफीम आदि नशीली वस्तुओं को छुड़वाने के संकल्प करें तभी वह शिव जी की आत्मका को प्रसन्न कर के कल्याण के भागी बनेंगे।

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