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Magazine - Year 1960 - Version 2

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जीवन का लक्ष्य एक हो।

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(श्री रामखेलावन चौधरी)

महाभारत में वर्णित वीरों की कथाओं में अर्जुन की कथा बड़ी शिक्षाप्रद है। अर्जुन लक्ष्यभेध में सर्वोपरि समझे जाते थे। विद्यार्थी काल में उन्होंने एक वृक्ष पर स्थापित काठ की चिड़िया का सर सफलतापूर्वक भेध कर अन्य विद्यार्थियों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित कर दी थी। उनके अचूक लक्ष्यभेध का प्रमुख कारण यह था कि उनकी दृष्टि एक मात्र लक्ष्य पर ही गड़ी रहती थी। उस कथा का निष्कर्ष यह है कि यदि आप अपने जीवन में निश्चित तथा अचूक सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो प्रारम्भ में ही एक लक्ष्य का चुनाव कर लीजिये। जेम्स ऐलेन नामक अंग्रेजी के एक लेखक ने अपने एक लेख- सफलता का रहस्य में एक लक्ष्य के चुनाव को सबसे अधिक महत्व दिया है। खेद की बात है कि बहुत कम लोग अपने जीवन के ध्रुव लक्ष्य को पहचानने के लिये अपने भाग्य और भगवान को कोसते हैं।

अंग्रेजी की एक कहावत है- यदि आपके कार्य का श्रीगणेश ठीक से हुआ है, तो आपको काफी सफलता प्राप्त होगी। यह बात सही भी है। जीवन का श्रीगणेश ‘लक्ष्य निश्चय’ के साथ ही होना चाहिये। यदि लक्ष्य निश्चित हो गया, तो आपके जीवन के समस्त कार्य व्यापार नियमबद्ध हो जाते हैं। यदि किसी जहाज का कोई गन्तव्य स्थान निश्चित न हो तो वह समुद्रों में लाखों मील का सफर कर डालने पर भी इधर उधर भटकता रहेगा और उसकी यात्रा अधूरी रहेगी। एक असफल एवं निराश व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करते हुये उर्दू का एक कवि ‘जौक’ कहता है-

जौक इस बहरे जहाँ में किश्तिए उम्रे रवाँ

जिस जगह पर जा लगी, वह ही किनारा हो गया।

इस कवि की उक्ति को हम निराशाजनक ही कहेंगे। संसार रूपी समुद्र के किसी तट पर जीवन नौका के जा ठहरने पर किसी मनुष्य को संतोष नहीं हो सकता। यदि मनुष्य की जीवन नौका जहाँ-तहाँ जा टकराए तो ‘मनुष्य’ और घास के तिनके में अन्तर क्या रहा? वह मनुष्य क्या है, जो परिस्थितियों के प्रभाव में इधर उधर बह जाने को ही जीवन की सार्थकता मानता है। वास्तव में हमारी शिक्षा दीक्षा के समस्त आयोजन ही इसलिए किये जाते हैं कि जीवन के प्रभात काल में ही प्रत्येक मनुष्य के जीवन का लक्ष्य निश्चित हो जाये और जीवन की संध्या तक पहुँचते पहुँचते यह एक लंबी यात्रा पूरी कर सके। व्यक्तिगत जीवन में लक्ष्य निर्धारित होने से मनुष्य सफलता की सीढ़ी पर द्रुतगति से चढ़ता जाता है। एक समाज अथवा राष्ट्र का लक्ष्य निश्चित होने से सारा समाज या देश उन्नति के शिखर पर आसीन हो सकता है।

जीवन के लक्ष्य का निश्चय जितनी जल्दी हो जायेगा, मनुष्य उतना ही अधिक लाभ में रहेगा। लक्ष्य निर्धारित करने के लिये कोई विशेष आयु नहीं स्थिर की जा सकती है। फिर भी उत्तम यह है कि विद्यार्थी जीवन में या उसकी समाप्ति होने तक प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य अवश्य ही निश्चित हो जाना चाहिये। चौदह से लेकर बीस वर्ष की आयु तक में लक्ष्य का स्थिर हो जाना उपयोगी सिद्ध होता है। यदि जीवन की औसत सीमा पचहत्तर वर्ष मान ली जाय, तो मनुष्य को जुटकर काम करने के लिये लगभग 40-45 वर्ष मिलते हैं। प्रारम्भिक आयु में लक्ष्य स्थिर हो जाने से, मनुष्य को अपने अंतिम काल में अपनी सफलता का सुख उठाने का अवसर मिल जाता है। लक्ष्य प्राप्ति के लिये काफी समय तक संघर्ष करना पड़ता है। यदि देर में लक्ष्य निश्चित हुआ, तो संघर्ष करते करते जीवन का अन्त आ जाता है और मनुष्य उस आनन्द से वंचित रह जाता है। जो सफलता के अन्त में प्राप्त होता है।

सबसे अधिक महत्वपूर्ण समस्या यह है कि लक्ष्य चुना कैसे जाय। अच्छा तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का लक्ष्य स्वयं चुने। वह अपनी सहज नैसर्गिक शक्तियों, रुचियों, सामर्थ्यों और अर्जित योग्यताओं के विषय में जितना अधिक जानता है, उतना अन्य जन नहीं जानते। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक नवयुवक को अपने जीवन का लक्ष्य चुनने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। इस सम्बन्ध में एक आपत्ति यह हो सकती है कि इस आयु में मनुष्य अनुभव हीन होता है, उसे असफलता और उस के दुष्परिणामों का ज्ञान नहीं होता। इसलिये वह ठीक से लक्ष्य का चुनाव करने में असमर्थ रहता है। ‘प्रयत्न और भूल’ के मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार नवयुवक को चलने देना उचित न होगा क्योंकि लक्ष्य चुनाव में भूल घातक सिद्ध हो सकती है। इस दृष्टि से कुछ लोगों का मत है कि माता-पिता, शुभचिन्तकों और शिक्षकों पर ही नवयुवकों के लक्ष्य चुनाव के प्रश्न को छोड़ देना चाहिये। यह पहलू भी बहुत उत्तम नहीं प्रतीत होता। कभी-कभी माता-पिता कुछ मोहवश और कभी अज्ञानवश बालकों के लिये एक ऐसा लक्ष्य चुनने के लिए लालायित रहते हैं जिसकी प्राप्ति में वे स्वयं अपने जीवन में असफल हो चुके होते हैं। वे अपने बच्चों को अपनी अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति का साधन बनाना चाहते हैं। उन्हें बच्चों की शक्तियों और उनकी सीमाओं का तनिक भी ज्ञान नहीं होता। ऐसी दशा में जानबूझकर बालकों को असफलता के मार्ग में ढकेले जाने की संभावना रहती है। लक्ष्य चुनाव के लिये शिक्षक कुछ अधिक उपयुक्त प्रतीत होते हैं क्योंकि वे निष्पक्ष दृष्टि से अपने विद्यार्थियों की योग्यताओं और रुचियों को पहचान सकते हैं और इस कार्य के अनुकूल योग्यता भी रखते हैं। पर कठिनाई यह है कि हमारी शिक्षा का ढाँचा कुछ ऐसा है कि शिक्षक इस काम को कर नहीं पाते।

हमारे सामने तो बीच का रास्ता है। नवयुवकों को लक्ष्य चुनाव में सहायता देने के लिये पाठशालाओं और माता-पिता का सहयोग होना चाहिए। हर्ष की बात है कि सरकार की ओर से हमारे देश में पथ-प्रदर्शन सेवाओं का संगठन किया जा रहा है। अन्य उन्नत देशों में इस प्रकार की सेवाओं का विधिवत् संचालन हो रहा है। हमारे पास तो जो धन उपलब्ध है, उन्हीं से कार्य ले सकते हैं। वर्तमान में माता-पिता और अध्यापकों का ही यह कर्तव्य है कि वे लक्ष्य चुनाव के काम में नवयुवकों का मार्ग दर्शन करें। हमारे देश में माता-पिता इस दृष्टि से बहुत पिछड़े हैं, वे अपने बच्चों के लिए भोजन वस्त्र और यत्किंचित् शिक्षा की व्यवस्था तो कर देते हैं परन्तु जीवन के लक्ष्य के सम्बन्ध में कभी पूछताछ तक नहीं करते। उन्हें इस उदासीनता का त्याग करना चाहिए। लक्ष्य का निश्चय न होने से हमारे नवयुवकों की शक्ति का अपव्यय होता है और राष्ट्र की भारी हानि होती है।

लक्ष्य का चुनाव आवश्यक है परन्तु उसके बाद भी कुछ बातें रह जाती हैं। एक पथिक को घने बीहड़ जंगल से होकर जाने वाले मार्ग पर लाकर खड़ा कर देने से ही काम नहीं चलता। उस मार्ग पर उसे सुरक्षा पूर्वक कुछ दूर पहुँचाना भी आवश्यक है। जिससे उसके मन में आत्मविश्वास का भाव जाग्रत हो जाय। आत्मविश्वास पैदा होते ही वह अपने मार्ग पर अकेला जा सकेगा। प्रारम्भ में भूलें होने की अधिक संभावना रहती है और प्रारंभ की भूलें खतरनाक होती हैं। अस्तु लक्ष्य चुनाव के पश्चात् भी कुछ समय तक नवयुवकों का पथ -प्रदर्शन करते रहना चाहिए। उसके आगे निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना मनुष्य का अपना निजी कर्तव्य और उत्तरदायित्व होता है।

प्रत्येक मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि लक्ष्य निश्चित कर लेने के बाद भी उसके मार्ग में बड़े बड़े प्रलोभन आयेंगे। लक्ष्य दूर होता ही है और उससे होने वाला लाभ भी दूरस्थ होता है। बीच में ऐसे अनेक काम आ सकते हैं, जिनसे तात्कालिक लाभ होने की संभावना रहती है। ऐसे लाभ को देखकर मनुष्य का मन डगमगाने लगता है। वह विचलित होकर पथभ्रष्ट हो जाता है। ऐसे अवसरों पर मन को दृढ़ रखने की आवश्यकता है। अपने जीवन के लक्ष्य के प्रति मनुष्य को हर दशा में सजग रहना चाहिए। इसका एक उत्तम उपाय यह है कि प्रतिमास या प्रतिवर्ष अपने कार्यों और उपलब्धियों की अवश्य जाँच करनी चाहिए। इससे अपनी प्रगति का अनुमान हो जाता है, उत्साह बढ़ता है और लक्ष्य पर दृष्टि जमी रहती है। मनुष्य को किसी ऐसे क्षेत्र में पदार्पण नहीं करना चाहिए, जिससे अपने निश्चित लक्ष्य का विरोध हो। ऐसे मित्रों या संगति से भी दूर रहना चाहिए जिनके प्रभाव से लक्ष्य विमुख होने की संभावना हो। यदि आपने संगीत में नैपुण्य प्राप्त करने को अपने जीवन का लक्ष्य चुना है तो क्रिकेट खेलने या बटेर लड़ाने वाले के साथ मैत्री रखने में पथ भ्रष्ट हो जाना सम्भव है। अपना अध्ययन, चिन्तन और मनोरंजन सभी कुछ लक्ष्य के अनुकूल हृदय मंदिर में जलती रहे और उसका कोना-कोना प्रकाशित रहे, इस बात को स्मरण रखना है।

अन्त में, आप यह भी स्मरण रखें कि जो आपका लक्ष्य स्थिर है, तो आप सैकड़ों व्याधी से दूर रहेंगे। आपका मन अनिश्चित और अन्तर्द्वन्द्व से मुक्त रहेगा। दुविधापूर्ण परिस्थितियों में निर्णय ले सकेंगे और आपकी इच्छा शक्ति बनेगी। आप समय का सदुपयोग करना सीख सकें क्योंकि जब फालतू बातों की ओर आपका ध्यान न जायेगा तो समय का अपव्यय अपने आप रुक जायेगा। प्रायः आप अपनी शक्ति की संपदा का भारी अपव्यय करते रहते हैं परन्तु लक्ष्य के निश्चय से आपकी शक्ति का एक एक कण उसी की पूर्ति में लगेगा। आपको तभी अपनी शक्ति का अनुमान होगा। सूर्य की किरणों में यों साधारण गर्मी ही है परन्तु जब बहुत सी किरणें आतिशी शीशे द्वारा एक केन्द्र बिन्दु पर इकठ्ठा करली जाती हैं, तो उनमें भस्म कर देने की शक्ति आ जाती है। आप निर्बलता का अनुभव इसलिए करते हैं कि आप की शक्तियाँ बिखरी रहती हैं। आपका लक्ष्य ही आपकी शक्तियों को समेटने वाला आतिशी शीशा है। अब यह स्मरण रखें कि जीवन का लक्ष्य एक हो।

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