विघ्नराज गणेशजी और उनकी उत्पत्ति
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(श्री.सदाशिव दिनकर एम.ए)
गणेश जी का हिन्दू-धर्म में बड़ा ऊँचा स्थान है। प्रत्येक शुभ कार्य का आरम्भ करने के पूर्व उनका स्मरण कर लेना, उनकी पूजा करना आवश्यक माना गया है। इसका कारण यह है कि गणेश जी जिस प्रकार विघ्न-विनाशक है, उसी प्रकार उनको विघ्नेश्वर भी माना गया है। इसका आशय यह है कि यदि आरम्भ में ही गणेश जी की पूजा न की जायगी तो उस कार्य में वे विघ्न उपस्थित करेंगे, और यदि उनको प्रसन्न रखा जाएगा तो वे समस्त विघ्नों का परिहार करके कार्य को सिद्ध करने में सहायक बनेंगे।
कुछ भी हो, गणेश जी का स्थान देव-समाज में बड़े महत्व का है। उनका व्यक्तित्व भी अनोखा है। मनुष्य का शरीर, हाथी का सिर, लम्बा पेट, चूहे की सवारी सभी बातें निराली हैं। साधारण लोग तो इन बातों को कौतूहल की निगाह से देखते हैं, पर विद्वानों के मतानुसार ये बातें गणेश जी में पाये जाने वाले विशेष गुणों और शक्तियों के चिन्ह हैं। इन विषयों का विवेचन करते हुये श्री सम्पूर्णानंद जी ने कुछ वर्ष पूर्व “गणेश” नाम की एक पुस्तक लिखी थी जिसमें विविध पुराणों के आधार पर गणेश जी की उत्पत्ति और उनसे सम्बन्ध रखने वाली भिन्न-भिन्न कथाओं का उल्लेख करके उनके स्वरूप पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। उनमें से कुछ कथायें यहाँ दी जाती हैं।
पुराणों में गणेश जी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई प्रकार की कथायें कही गई हैं जिनसे उनके वास्तविक स्वरूप और महत्व पर प्रकाश पड़ता है। गणेश जी का एक मुख्य नाम विनायक भी है। इसके सम्बन्ध में “वाराह पुराण” में निम्न कथा दी गई है-
“एक बार देवताओं और तपस्वी ऋषियों के चित्त में इस विषय में चिन्ता उत्पन्न हुई कि बहुत से अवसरों पर सन्मार्गगामियों के कामों में बाधा उपस्थित हो जाती है और असद् गामियों के काम निर्विघ्न पूरे हो जाते है। इस विषय में बहुत विचार करने पर निश्चय किया गया कि रुद्र की शरण में जाने से इसका कोई उपाय मालूम पड़ सकता है। वहाँ पहुँच कर सबने देवाधिदेव शिव की स्तुति की और उनसे प्रार्थना की कि कोई ऐसी युक्ति कीजिये कि जो अकर्म करने वाले हैं उन्हीं के कार्यों में बाधा पड़ा करे। देवगण की प्रार्थना सुन कर महादेव जी ने उमा की ओर निर्निमेष नेत्रों से देखा। उसी समय रुद्र के मुख रूपी आकाश से एक परम सुन्दर तेजस्वी कुमार वहाँ प्रकट हो गया। उसमें परमेष्ठी (ब्रह्मा) के सब गुण विद्यमान थे और वह दूसरा रुद्र जैसा ही लगता था। उसके रूप को देख कर पार्वती जी को क्रोध आ गया और उन्होंने शाप दिया कि “है कुमार ! तू गजवक्त्र (हाथी के सिर वाला) प्रलम्ब जठर (लम्बे पेटवाला) और सर्पेरूपवीत (सांपों के जनेऊ वाला) हो जायगा। इस पर शंकर जी ने क्रोधित होकर जो अपने शरीर को धुना तो उनके रोमों से हाथी के सिर वाले, नीले भ्रंजन के से रंग वाले, अनेक शास्त्रों को धारण किये हुये इतने विनायक उत्पन्न हुये कि पृथ्वी क्षुब्ध हो उठी है, देवगण भी घबरा गये। तब ब्रह्मा जी ने आकाश में प्रकट होकर देवताओं को धैर्य धारण करने को कहा और महादेव जी से प्रार्थना कि “हे त्रिशूलधर, आपके ये सब विनायक उसके वश में रहे जो आपके मुख से पैदा हुआ है। आप प्रसन्न होकर इन सब को ऐसा ही वर दें।” तब महादेव ने अपने उस पुत्र से कहा कि “तुम्हारे अब पुत्र, गजास्व, गणेश और विनायक नाम होंगे। यह सब क्रूर दृष्टि प्रचण्ड विनायक तुम्हारे भृत्य होंगे। यज्ञादि कार्यों में तुम्हारी सबसे पहले पूजा होगी, अन्यथा तुम कार्य के सिद्ध होने में विघ्न उपस्थित कर दोगे। इसके अनन्तर देवगण ने गणेश की स्तुति की और शंकर ने उनका अभिषेक किया। विनायक का जन्म जिस तिथि को हुआ उसी को गणेश चतुर्थी कहते हैं।”
शिवपुराण की गणेश जन्म वाली यह कथा तो सर्वाधिक प्रसिद्ध है जिसमें कहा गया है कि पार्वती जी ने स्नान करके अपने शरीर के मैल से गणेश जी की रचना की थी और शंकर जी ने उसे काट डाला था। पर ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसको कुछ भिन्न रूप में लिखा गया है। उसके अनुसार “जब शिव पार्वती के विवाह को बहुत समय व्यतीत हो गया और उनके कोई संतान न हुई तो पार्वती जी ने श्री कृष्ण का व्रत किया और इससे उन्होंने गणेश को जन्म दिया। उस अवसर शनि देवता के सिवाय और सभी देवियाँ बालक को देखने आये। बहुत आग्रह करने पर शनि आये तो नीचा सिर करके खड़े रहे। पार्वती जी के पूछने पर उन्होंने बताया कि मुझे ऐसा शाप है कि जिस बालक को देखूँगा तो उसी का अनिष्ट होगा। पार्वती ने न माना। शनि के सिर उठाते ही बच्चे का सिर कट कर गिर गया। तब विष्णु ने एक हाथी का सिर काट कर जोड़ दिया, जिससे बालक पुनर्जीवित हो उठा। तब से उसे “गणपति” पद मिला।”
“सुप्रभेदागम” ग्रंथ में एक और कथा दी गई है कि “ शिव के सोमेश्वर लिंग की पूजा करने से बड़े बड़े पातकी भी स्वर्ग पहुँचने लगे। इससे देवगण घबरा गये। उन्होंने शंकर जी से कहा कि इन अनाधिकारियों का स्वर्ग आना रोकिये। महादेव ने कहा कि मैं तो कुछ नहीं कर सकता, पार्वती से कहो। पार्वती को देवों पर दया आ गई और उन्होंने विघ्नेश्वर की सृष्टि करने का निश्चय किया। वे उबटन के साथ अपने शरीर के मैल को मिला कर पहुँची, जहाँ मालिनी नाम की हाथी के से मुखवाली एक राक्षसी उस पदार्थ को खा गई। इससे उसे गर्भ रह गया और समय आने पर पाँच सूँड वाला लड़का पैदा हुआ। शंकर ने इसको अपना पुत्र मान लिया और पाँच सूँड को मिला कर एक सूँड कर दिया। यह लड़का गणपति हुआ। यह साधारणतः लोगों के कार्य में विघ्न डालता है इसलिये विघ्नेश्वर कहलाता है। परन्तु जो लोग इसकी पूजा करते हैं उनके मार्ग को निष्कंटक बना देता है, इसलिए “विघ्न हर” भी कहते है।”
इसी प्रकार पुराणों में गणेश जी के सम्बन्ध में बहुत प्रकार की कथायें दी गई हैं, जिनमें कुछ बातें मिलती हुई हैं और कुछ में अन्तर है। पर इन सबसे यह आशय निकलता है कि (1) गणेश जी स्वभावतः विघ्न कर्ता देवता हैं (2) उनको संतुष्ट करने से विघ्न दूर हो जाते हैं (3) किसी न किसी प्रकार पार्वती जी ने इनको जन्म दिया (4) शिवजी ने उनको अपना पुत्र मानकर गणों का स्वामी बनाया (5) आरम्भ में वे गज वदन नहीं थे, कहीं न कहीं से लाकर हाथी का मस्तक उन पर रखा गया।
इन्हीं तथ्यों को लेकर सर्वसाधारण में गणेशजी के सम्बन्ध में और भी बहुत सी कथाएं प्रचलित हो गई हैं जो गणेश जी के व्रत अथवा अन्य प्रसंगों पर कही जाती है पर इनका प्रचार प्रायः साधारण जनता और स्त्रियों में नहीं है। विद्वान लोग इन वर्णनों को रूपक मानकर इनका लोकोपकारी अर्थ करते हैं। उदाहरणार्थ श्री चम्पत राम जी ने अपने धर्म समन्वय सम्बन्धी ग्रंथ में लिखा है-
“गणेश जी के साथ का चूहा विवेचक, विभाजक, भेदकारक, विस्तारक, विश्लेषक, बुद्धि का चिन्ह है। गणेश जी का सिर कटना अहंकार का नाश होना है और हाथी का सिर लगाना संयोजक, समन्वयकारक, संश्लेषक बुद्धि का उदय होना है। ज्ञान और तम्मूलक व्यवहार के लिये सामान्य और विशेष दोनों परिचय आवश्यक है-विभाजक और समाहकारक दोनों प्रकार की बुद्धियाँ चाहिये, परन्तु प्रधानता समन्वय बुद्धि की ही है, इसलिये गजानन चूहों पर सवारी करते हैं। इस संश्लेषक बुद्धि के कारण ही गणेश जी युद्धिसागर माने जाते है। गणेश जी एक दन्तता उनकी अद्वैत प्रियता की सूचक है। उनके मोदक प्रिय होने का अर्थ है ‘मोद’ (आनन्द) देने वाला।”
इतिहास की खोज करने वाले विद्वानों का कहना है कि वेदों में गणेश जी का नाम कहीं पर नहीं आया है। जिन दो-एक मंत्रों में “गणपति” शब्द आया है वह बृहस्पति के लिये प्रयुक्त किया गया है। गणेश जी का जिक्र गुप्त-काल में बने पुराणों में ही पाया जाता है जिससे विदित होता है कि जब वैदिक धर्मावलम्बी ब्रह्मावर्त से आगे चल कर, इस देश के भीतरी भागों में प्रविष्ट हुये और वहाँ उनका आदि वासियों से संपर्क हुआ तो वे अपने देवताओं के साथ उनके भी कुछ देवताओं को पूजने लग गये और धीरे-धीरे उनको अपना ही बना लिया। गणेश जी ऐसे देवताओं में सर्व प्रमुख है।
कुछ भी हो गणेश जी को मान्यता इस समय देश व्यापी है। जब कि वैदिक कालीन अनेक बड़े-बड़े देवताओं जैसे वरुण, मित्र, अर्यमा, अश्विनीकुमार आदि का इस समय पता भी नहीं है, गणेश जी का सम्मान समस्त हिंदू जाति में सर्वाधिक है। किसी भी देवता की पूजा क्यों न हो, कोई भी धार्मिक संस्कार क्यों न हो, विघ्नविनाशक के रूप में गणेश जी की पूजा सबसे पहले की जानी अनिवार्य है। इतना ही नहीं उन्होंने, बौद्ध और जैन धर्मावलम्बियों पर भी अपना प्रभाव विस्तृत किया और उनकी लोकप्रियता को देखकर उन धर्मों के शास्त्रों में भी उनका उल्लेख किया गया। जैनियों में विवाह के अवसर पर “विनायक-मंत्र” की पूजा की जाती है। उस अवसर पर जो श्लोक पढ़े जाते है वे विचारणीय हैं-
गणा नाँ मुनीनामधीशस्व्वतस्ते
गणेशाख्यया में भवन्तं स्तुवन्ति।
सदा विघ्न सन्दोह शान्तिर्जनानाँ
करे संलुठत्यायत श्रेयसा नाम॥
कलेः प्रभावात्कलुषाशयस्व
जनेषु मिथ्यामद वासिते पु।
प्रवर्तितोऽन्यो गणराजनाम्ना,
लम्बोदरो दन्तिमुखो गणेशः॥
य तस्त्वमेवासि विनायको मे
दृष्टेष्टयोगानवरुद्धभावः।
त्वन्नाम मात्रेण परा भवन्ति
विघ्नारयस्तर्हि किमत्र चित्रम्॥
अर्थात् - (हे जिनेन्द्र) आप मुनियों के गणों के अधीश हैं इसलिये जो लोग आपकी “गणेश” के नाम से स्तुति करते हैं, उनके विघ्न शान्त हो जाते हैं और कल्याण का भण्डार उनके हाथ में आता है। मलिन कलिकाल के प्रभाव से लोगों में लम्बोदर और द्रस्तिमुख के रूप में दूसरे ही गणराज का प्रचार हो गया है।
क्योंकि आप की पूर्ण रूप से विनायक हैं, इस लिये इसमें आश्चर्य ही क्या है कि आपके नाम मात्र से विघ्न रूप शत्रु हार जाते है।
बौद्ध धर्म में “रुधिन-माला” नाम का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसमें अनेक देव-देवियों को सिद्ध करने के मंत्र लिखे हैं। उनमें एक मंत्र गणेश जी का भी है जो ज्यों का त्यों नीचे दिया जाता है।
“ॐ नमः श्रीगणपतये। ॐ आः गः शान्ति कुरु ष्ब माँ ही भूँ हुँ, स्वाहा, हृदयः। ॐ राग सिद्धि सर्व्वार्थ में प्रसादय प्रसादय हुँ ज ज स्वाहा, उप हृदहः। ॐ आः गः स्वाहा, ॐ वरदकराय स्वाहा, ॐ वक्तैक दष्ट्रै विघ्नेश हुँ फट स्वाहा, ॐ गणपत्यै स्वाहा, ॐ शान्तिंकटि भ्रुँ हारिणेश डाकिनि हुँ फ ट स्वाहा, ॐ जः मेसि हुँ कुरु वँ ॐ अन्ये होः ज ज स्वाहा।”
इस मंत्र के आरम्भ में तो पुरुष रूपी गणपति की ओर संकेत किया गया है और अंतिम भाग में स्त्री रूपी गणपति शक्ति का उल्लेख है। इस मंत्र के साथ “गणपति-भावना” (ध्यान) भी दिया हुआ है। उसमें गणपति का स्वरूप इस प्रकार वर्णन किया गया है-
“भगवन्त गणपति रक्तवर्ण जटामुकुटकिरीटिनं सर्वाभरण भूषितं द्वादशभुजं लम्बोदरैक वदनं अर्द्धपर्य्यंकताण्डवं त्रिनेत्रमप्पेक दन्तं सत्य भुजेषुकुठार शरअंकुशवज्रषंगशलं च वाम भुजेषु भूवल चाप खटवाँग अष्टकूपाल शुषूमाँस कपाल फठकं च रक्त पद्मे भूषकोपस्थितमिति।”
अर्थात्- “भगवान गणपति का, जो रक्तवर्ण, जटा मुकुट किरीट धारी, समस्त अभरण युक्त, बारह भुजा वाले, लम्बोदर, एक मुख, अर्द्धपर्त्वंकताण्डव मुद्रा से बैठे, तीन नेत्र वाले, एक दंत, दाहिने हाथों में कुठार, तीर या खड्ग और शूलधारी और बायें हाथों में मूसल, धनुष, खटवाउंग रक्त या सूखे माँस का पात्र और फट धारी और लाल कमल पर मूषक के ऊपर स्थित हैं, (ध्यान करें)।”
बौद्ध धर्म के साथ गणेश जी की मूर्ति चीन, जापा, वर्मा आदि देशों में भी पहुँच गई और वहाँ अनेक मन्दिरों तथा प्राचीन भग्नावशेषों में गणेश जी की मूर्तियाँ मिलती हैं। इनमें भारतीय मूर्तियों से कुछ अंतर दिखलाई पड़ता है पर गणेश जी की सूँड, उनकी सवारी का मूषक, उनके हाथों में लिये अस्त्र शस्त्र सब पूर्णतः मिलते-जुलते हैं। इस प्रकार वैदिक देवताओं से भिन्न होते हुये भी गणेश जी का प्रभाव अन्य समस्त देवताओं की अपेक्षा विस्तृत भूभाग में फैला हुआ है और वे ही सबसे अधिक पूजनीय माने जाते हैं।

