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Magazine - Year 1960 - Version 2

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तपस्वियों! राष्ट्र का पथ प्रदर्शन करो।

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(श्री भगवान सहाय जी वाशिष्ठ)

भद्रमिच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदस्तपोदीक्षा मुप निसेदुरग्रे।

ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै

देवा उप संनमन्तु ॥ अथर्व. 19। 41

“सुख और कल्याण की कामना करते हुए सुख के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले ऋषियों ने पहले तप और दीक्षा का अनुष्ठान किया। उस तप और दीक्षा साधना के पश्चात् राष्ट्रीय भावना, बल और सामर्थ्य प्रकट हुआ। इसलिए विद्वान लोग इसके लिए सिर झुकायें।”

उक्त मंत्र में ऋषियों के आदर्श जीवन उद्देश्य का विवेचन है। इससे ज्ञात होता है कि वे न केवल अपने सुख और कल्याण को ही जीवनोद्देश्य समझते थे वरन् राष्ट्र एवं समाज का नेतृत्व कर उसमें नया बल साहस उत्साह एवं राष्ट्रीय भावनाओं का विकास करते थे। यह उक्त वेद मंत्र में बताया गया है।

मंत्र के प्रारम्भ में बताया है कि “सुख और कल्याण की इच्छा करते सुख के यथार्थ स्वरूप को जानने वाले ऋषियों के हृदय में भी अन्य मनुष्यों की तरह सुख और कल्याण की कामना उत्पन्न हुई। मानव की यह स्वाभाविक मानसिक भूख होती है। प्रत्येक मनुष्य अपने सुख के लिए अपना क्रियाकलाप चलाये रखते हैं। सभी इसी केन्द्र पर चक्कर लगाये रहते हैं कि येन केन प्रकारेण उन्हें सुख मिले, कोई धन संग्रह करके सुख प्राप्त करना चाहता है कोई-कोई योग साधना, पूजा उपासना, सम्पन्नता कीर्ति चाहना आदि से सुख चाहता है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति सुख प्राप्ति के लिए भिन्न भिन्न मार्गों का अवलम्बन करता है। किन्तु इस विभिन्नता के दलदल में वास्तविक सुख के मार्ग को अपनाकर उस पर चलना ही उक्त उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है।

ऋषियों ने सुख के वास्तविक स्वरूप को जाना था। उन्होंने अपने जीवन के वास्तविक सुख और आत्म कल्याण का मार्ग राष्ट्र एवं समाज की सेवा में ही पाया। जैसा कि वेदमंत्र के अन्त में आया है। ऋषियों ने राष्ट्रीय भावना, बल, सामर्थ्य का विकास किया और इसी से उन्होंने वास्तविक सुख और कल्याण को प्राप्त किया यह वेद भगवान की साक्षी से स्पष्ट सिद्ध है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि सच्चा सुख और कल्याण का पवित्र राजपथ राष्ट्र की सेवा में ही है। जब हृदय में समाज सेवा, जन जागरण एवं राष्ट्रोत्थान के लिये तीव्र भावनायें उदय होती हैं तब एक मीठे दर्द भरे अलौकिक आनन्द की सृष्टि होती है जिसमें भाव विभोर होकर मनुष्य अपनी निष्काम कर्म साधना से राष्ट्र में नव प्राण, बल, नवीन उत्साह एवं पुरुषार्थ को फूँकता है। सोये राष्ट्र में नव चेतना का संचार करता है। एक नहीं अनेकों व्यक्ति उस मानवता के पुजारी के सत्प्रयत्नों एवं मार्गदर्शन से वास्तविक सुख एवं कल्याण प्राप्त करते हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं देवदूत होता है, राष्ट्र और जाति का प्राण होता है। उसके जीवन का समस्त क्रियाकलाप इसी महान साधना के लिए होता है। ऋषि अपने लिए कुछ नहीं करते। उनका जीवन दूसरों के लिए ही होता है यही उनके जीवन का महान आदर्श है।

हमारे ऋषियों का जीवन भी ठीक इसी क्रम से होता था। उन्होंने वास्तविक सुख और कल्याण का मार्ग जन सेवा से ही समझा। वह सेवा कार्य भी उच्च श्रेणी का। किसी को धन एवं शारीरिक आवश्यकता पूर्ति के साधन प्राप्त कर देना कोई महत्वपूर्ण सेवा कार्य नहीं है सबसे महत्वपूर्ण सेवा कार्य बुरे विचारों को हटा कर सद्विचारों को प्रतिष्ठापित करना, मनुष्य का आत्मा कल्याण के लिए मार्ग दर्शन करना आदि आदि। इसी प्रकार समाज का भी पथ प्रदर्शन करना, ऋषियों ने इसी पवित्र पथ का अवलम्बन किया था।

जब ऋषियों ने वास्तविक सुख और आत्म-कल्याण का सच्चा मार्ग राष्ट्र सेवा एवं समाजोत्थान में ही देखा तो इसके लिए उन्होंने सर्व प्रथम तप और दीक्षा का अनुष्ठान किया। इसमें उन्होंने स्वयं की जीवन निष्ठा आदर्श एवं आत्म बल संचय किया। क्योंकि उन्होंने उस मनोवैज्ञानिक तथ्य को समझ लिया था जिसके अनुसार कार्य आरम्भ करने से पहले शक्ति और साधन जुटा लिये जायं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिसका स्वयं का जीवन आदर्श, नैष्ठिक एवं पवित्र नहीं है वह दूसरों को प्रभावित नहीं कर सकता। जो स्वयं प्रकाशित नहीं है वह दूसरों को प्रकाशित नहीं कर सकता। ठीक इसी तथ्य के आधार पर ऋषियों ने पहले तप और दीक्षा का अनुष्ठान किया जिसमें स्वयं के आदर्श पवित्र जीवन का निर्माण, आत्म बल वृद्धि, सहनशीलता, ज्ञान विज्ञान और अखण्ड साधना का अनुभव आदि को आत्मसात किया।

उक्त तप और दीक्षा के पश्चात ऋषियों ने राष्ट्रीय भावना, बल, साहस, सामर्थ्य का विकास किया। उनकी ऋचायें आज भी नवीन प्रेरणा, अनंत शक्ति सामर्थ्य एवं राष्ट्रीय भावनाओं को हमारे हृदय में झंकृत करती हैं। उन्होंने राष्ट्र में नये बल, बुद्धि, विज्ञान, कौशल, साहस, पुरुषार्थ को जागृत किया था। जाति में नव चेतना का आह्वान किया था। यही कारण है कि वैदिक काल का स्वर्ण युग विश्व इतिहास में अपना एक उच्च स्थान रखता है। जिस सतयुग की भव्य कल्पना करके ही हम आत्म विभोर एवं उल्लसित हो उठते हैं वह उन राष्ट्रहित चिंतक, समाज सेवा, समाज कल्याणकारी हमारे पूर्वज ऋषियों की ही देन है जिनके लिए नमन करने, उनका अनुसरण करने की आज्ञा वेद भगवान ने दी है। विद्वान पुरुषों को उनका अनुसरण करना ईश्वरीय आज्ञा है।

यह निर्भ्रांत सत्य है कि जिस देश में इन ऋषियों की मर्यादाओं एवं कर्तव्यों का क्रम चलता रहता है वह देश प्रगति एवं उत्थान की और बढ़ता रहता है। कालान्तर में हमारे देश की जो स्थिति हुई वह इसके ऋषियों से विहीन हो जाने के परिणाम स्वरूप ही है। लम्बे अरसे की गुलामी, आध्यात्मिक एवं नैतिक पतन, कमजोरी, दुर्बलता एवं हीनत्व आदि ने भारत में अपना घर भर लिया इसलिए ऋषि परम्परायें समाप्त हो गईं। राष्ट्र का पथ प्रदर्शक ऋषि नहीं रहा अतः यह राष्ट्र अवनति के गर्त में गिरा। सौभाग्य से पुनः ऋषि आत्माओं का इस भूमि पर अवतरण हुआ जिन्होंने अपने जीवन को जला जलाकर अपना बलिदान कर, सर्वस्व निछावर कर इसे स्वतंत्र किया किन्तु अभी ऋषि परम्परा का कार्य समाप्त नहीं हुआ है। गुलामी की लम्बी नींद से जगा हुआ यह अर्ध निद्रित भारत अभी आलस्य प्रभाव, शैतानी विचारधारा अंधस्मृति से प्रसिद्ध है इस पर भी भौतिकता की विनाशकारी लहरों में थपेड़े खा रहा है। भौतिकता की इन भयंकर लहरों से बचाने, नवीन प्राण एवं चेतना का संचार करने, जन जन में जागरण का सन्देश सुनाने, सोई हुई भारतीय जनता को जगाने, अन्ध प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए ऋषि परम्पराओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

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