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Magazine - Year 1960 - Version 2

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खोज करने से सद्गुरु भी मिलते हैं।

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(श्री शिवचैतन्य जी परमार्थी)

अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर होने के लिए किसी भी साधक को ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है जो उसे न केवल सन्मार्ग का उपदेश करे वरन् अपने व्यक्तिगत अनुभवों से प्रभावित, प्रोत्साहित एवं अग्रसर बनाने की क्षमता भी रखता हो। इस आवश्यकता की पूर्ति में आज अधिकाँश साधक असफल ही रहते हैं। ऐसा मार्ग दर्शक खोजने चलते हैं परन्तु समुद्र किनारे मोती ढूंढ़ने गये बालक के हाथ जिस प्रकार सीप और घोंघे ही लगते हैं, इसी प्रकार स्वल्प प्रयत्न से सद्गुरु प्राप्त करने के इच्छुकों को कोई नकली व्यक्ति ही उपलब्ध होता है और इसके फलस्वरूप उन्हें असफलता एवं निराशा ही हाथ लगती है।

विचारणीय बात यह है कि क्या सचमुच आज सच्चे मार्ग दर्शकों का अभाव हो गया है? क्या योग्य एवं अनुभवी गुरु संसार में से समाप्त हो गये हैं? नहीं, बात ऐसी नहीं, है। किसी वस्तु की किसी जमाने में कमी हो सकती है पर उनका पूर्ण लोप नहीं होता। खोज और प्रयत्न करने वाले अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर ही लेते हैं फिर आध्यात्म मार्ग से पथिक ही अपनी आवश्यक वस्तु-सच्चे मार्ग दर्शक से वंचित रहे इसका कोई कारण नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि उपयुक्त और अधिकारी व्यक्ति की तलाश करते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाय और भावुकता के आधार पर, चमक दमक के आधार पर जल्दबाजी से किसी को गुरु न माना जाये वरन् उसकी आन्तरिक स्थिति के बारे में गंभीर दृष्टि से पता लगाया जाय और वास्तविकता प्रतीत होने पर ही उसकी सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाय। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रख कर जब बड़ी बड़ी रहस्यपूर्ण खोजें हो सकती हैं तो सद्गुरु को उसी आधार पर क्यों नहीं खोज निकाला जा सकता।

विज्ञान की नई नई खोजें हो रही हैं। ऐसे तथ्यों और सिद्धान्तों का पता चल रहा है जो अब से पहले किसी को पता न था, ग्रहों उपग्रहों तक दौड़ने के जो यंत्र बने हैं तथा इस दिशा में जो महत्वपूर्ण बातें ज्ञात हुई हैं उनके आविष्कर्ता वैज्ञानिक अपनी सफलता पर गर्व अनुभव कर रहे हैं। इससे पूर्व भी प्रकृति के अनेक ऐसे रहस्यों का पता लगाया जा चुका है जो उस शोध से पूर्व सर्वथा अज्ञात थे और जब वे आविष्कार सामने आये तो सर्वत्र आश्चर्य प्रकट किया गया। रेल, तार टेलीफोन, बिजली, रेडियो, टेलीविजन, हवाई जहाज, दूरबीन, कैमरा, एक्सरे, क्लोरोफार्म आदि अब साधारण बातें हैं। उन दिनों हर आदमी इनकी चर्चा करते हुए एक भारी कौतूहल अनुभव करता था।

जिन सिद्धान्तों, प्रकृति की जिन सूक्ष्म प्रक्रियाओं के आधार पर इन आविष्कारों का उद्घाटन हुआ वे अनादि काल से उसी प्रकार मौजूद थे जिस प्रकार आज हैं पर जब तक उनके बारे में जानकारी न थी तब तक अल्पज्ञ मनुष्य उसके अस्तित्व के बारे में भी कोई कल्पना न कर पाता था।

मनुष्य की यह अल्पज्ञता केवल विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं सभी क्षेत्रों में फैली पड़ी है। मनुष्यों की पहचान के बारे में भी यही अल्पज्ञता बाधक होती है। दूसरों के वास्तविक स्वरूप को व उनकी आन्तरिक स्थिति को परखने में हम बहुधा असफल रहते हैं। वह असफलता सामान्य मनुष्यों के क्षेत्र तक सीमित रहे तो उतना हर्ज नहीं, जितना कि महापुरुषों की वास्तविकता को परखने में भूल होने के कारण हर्ज होता है। समय -समय पर युग पुरुष होते रहते हैं। सन्तों, मुनियों, तत्वदर्शियों और आत्मबल सम्पन्न लोगों की किसी काल में कमी नहीं रहती, उनकी महत्ता को परखने में भूल होने के कारण उस समय के लोग उससे लाभ नहीं उठा पाते।

भगवान राम और कृष्ण तक को उस युग के लोगों ने यदि पहिचाना होता तो उन्हें इस प्रकार सताया न गया होता, उनके साथ ऐसे दुर्व्यवहार न किये गये होते। सीता पर लाँछन लगाने वाले धोबी को क्या पता था कि वह एक महाशक्ति पर लाँछन लगा रहा है। शिशुपाल को क्या पता था कि जिन्हें वह इतने दुर्वचन बोल रहा है वह कृष्ण नगण्य गोप बालक से कुछ अधिक है। तीस रुपया इनाम पाने के लालच से जिस शिष्य ने अपने गुरु ईसामसीह को फाँसी लगवाने के लिए पकड़वा दिया उसे क्या मालूम था कि यह तुच्छ सा साधु आगे चल कर आधी से अधिक दुनिया का मार्ग दर्शक बनेगा और इसके साथ विश्वास घात करने के फलस्वरूप मुझे इतिहास में खल-नायक के रूप में याद किया जाता रहेगा। यदि उसे ऐसा पता होता तो अवश्य ही वह उस तीस रुपयों का लोभ छोड़ देता।

बाल्मीकि डाकू को यह पता होता कि जिस साधु को वह लूट रहा है वह नारद साधारण यात्री नहीं देवर्षि है तो वह क्यों उनको लूटकर कपड़े उतरवाता? हिमाचल पत्नी सुनयना को पता होता कि उसकी पुत्री पार्वती साधारण लड़की नहीं है तो उसे तप करने से क्यों रोकती और क्यों शिव को दूल्हा रूप में दरवाजे पर आया देखकर अपने दुर्भाग्य पर दुखी होती? अशोक वाटिका में फल खाने वाले वानर को साधारण बन्दर न समझ कर यदि राक्षस लोग उसे बजरंगबली हनुमान समझते तो पूँछ जलाने की धृष्टता क्यों करते? चाणक्य की प्रचण्ड शक्ति से यदि नन्द नरेश परिचित रहे होते तो साधारण सी बात पर उसका अपमान करके अपने वंश और राज्य का सर्वनाश क्यों कराते?

इस प्रकार के अगणित उदाहरण इतिहास में ऐसे मौजूद हैं जिनमें स्पष्ट है कि महापुरुषों को उनके साथियों तक ने नहीं पहचाना। गौएं चराने वाले गोप क्या जानते थे कि उनके समान ही रोज गायें चराने वाला साथी लड़का योगेश्वर भगवान कृष्ण हो सकता है। ध्रुव, प्रहलाद, शंकराचार्य, मीरा, गान्धी, तिलक सुकरात, सूर आदि की महत्ता यदि उनके समकालीन लोगों को प्रतीत होती तो निश्चय ही उन्हें उतना तिरस्कार न सहना पड़ता।

मनुष्य की स्थूल बुद्धि और चमड़े की आँखें केवल बाहरी बातों को ही देख समझ पाती हैं उसमें वह सूक्ष्म दृष्टि नहीं होती कि किसी की लघुता एवं महानता की अन्तः स्थिति को समझ सकें। इसी कमजोरी के कारण कितने ही भोले लोग धूर्तों द्वारा ठगे जाते हैं और कितने ही जिज्ञासु किन्हीं सत्पुरुषों की सहायता से वंचित रह जाते हैं। इस कठिनाई का हल एक ही प्रकार से हो सकता है कि हम अपनी तत्वदर्शी अन्वेषण बुद्धि की ऋतम्भरा प्रज्ञा को विकसित करें। इस अन्वेषक बुद्धि के अभाव में चिरकाल तक मानव जाति को वैज्ञानिक आविष्कारों से वंचित रहना पड़ा और जब वह महत्वपूर्ण क्षमता उसे प्राप्त हुई तो विज्ञान दिन पर दिन तीव्र गति से प्रकृति के महान रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए बढ़ रहा हैं।

हमें अपने जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए जिस ज्ञान तत्व और सूक्ष्म विज्ञान की आवश्यकता है वह यद्यपि बहुत कुछ पुस्तकों में उपलब्ध होता है, फिर भी उसे हृदयंगम कराने और अभ्यास भूमिका में लाने के लिए किन्हीं ऐसे मार्ग दर्शकों की आवश्यकता होती है जिन्होंने इस ज्ञान विज्ञान को स्वयं हृदयंगम और अभ्यस्त किया है। परन्तु भारी कठिनाई यह है कि ऐसे लोगों को परखा कैसे जाय? इस विचित्र युग में नकली चीजें इतनी बढ़ गई हैं कि असली चीज वाले को अपनी अच्छाई स्पष्ट करने में भी संकोच होता है। नकली के व्यापारी बढ़ा चढ़ा कर अपने माल का ढिंढोरा पीटते हैं फलस्वरूप भोले आदमी उनके चंगुल में आसानी से फँस जाते हैं और पीछे बहुत कुछ गंवाकर निराश लौटते हैं। जब कि इन विपत्तियों का चारों ओर भयंकर विस्तार हो रहा हो तब सच्चे आदमियों को अपनी बात खुली जबान से कहने तक में संकोच होना स्वाभाविक है क्योंकि दूध के जले लोग छाछ पर विश्वास कर ही लेंगे यह आशा कैसे की जा सकती है?

धूर्तों का स्वार्थ होता हैं, उन्हें बिना कुछ प्रयत्न और कष्ट का झंझट उठायें केवल अपने विज्ञापन बल पर बहुत कुछ प्राप्त हो जाता है यदि कभी कलई खुली भी तो उनकी मूल बेहया स्थिति को कोई हानि नहीं होती । उनकी हानि तो केवल इतनी ही हुई कि कलई उतर गई और वस्तुतः जैसे थे वैसे ही लोगों पर प्रकट हो गये। पर जो सच्चे हैं उनकी स्थिति सर्वथा भिन्न है। उन्हें स्वार्थ कुछ भी साधना नहीं होता केवल परमार्थ ही करना होता है। जो कष्ट साध्य अन्तः स्थिति प्राप्त की है उसे कोई जाने ही और उससे लाभ उठाये ही, इसमें उन्हें कुछ आग्रह भी नहीं होता, वरन् उदासीनता ही होती है क्योंकि यदि मार्ग दर्शन के लिए उन्हें कोई नहीं पूछता तो इसमें उनकी हानि कुछ नहीं वरन् अपने समय का आत्म कल्याण में ही लगाते रहने का लाभ ही है। परमार्थ न करें, उन्हें सेवा का अवसर न मिले तो भी उनके आत्म कल्याण का जो कार्यक्रम चल रहा था उसके होते हुए लक्ष पूर्ति की कोई बाधा नहीं आती। निश्चय ही असली चीजों का -नकली चीजों की तरह ढिंढोरा नहीं पीटा जा सकता और न उनकी चमक दमक ही नकली जैसी बनाई जा सकती है।

इन परिस्थितियों में आत्म निर्माण के आकाँक्षी के लिए एक भारी कठिनाई यह पड़ती है कि वह श्रेय पथ पर चलने के लिए जिस मार्ग दर्शक की आवश्यकता है उसे प्राप्त कैसे करें? नकली गुरुओं की भरमार के उलझन भरे जाल से अपने को कैसे बचायें? अनाधिकारी लोगों की कला वाणियों में भ्रमित होकर जो बर्बादी होती है उससे आत्म रहा कैसे करें?

इस समस्या को हल करने का एक ही मार्ग है अपनी अन्वेषण बुद्धि को, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को, जागृत करना। वैज्ञानिकों ने इसी औजार की सहायता से प्रकृति के गर्भ में छिपे हुए सूक्ष्म रहस्यों को ढूंढ़ निकाला और इतने आश्चर्यजनक आविष्कार किये। आगे भी मनुष्य की सारी महत्वाकांक्षाएं इसी एक आधार पर अवलम्बित हैं कि वह अन्वेषण बुद्धि द्वारा तर्कपूर्ण वैज्ञानिक प्रवृत्ति के आधार पर अभीष्ट दिशा में अग्रसर होगा। यही आधार हमारे लिए सच्चे गुरु की खोज में भी सहायक हो सकता है। ढूंढ़ने वालों ने सब कुछ पाया है, इस संसार में सब कुछ मौजूद है- चिरकाल से मौजूद था, अब भी मौजूद है, पर हम उसे वैज्ञानिक दृष्टि के अभाव में प्राप्त नहीं कर पाते। यदि उस दृष्टिकोण को अपना लिया जाय तो वैज्ञानिक शोधों तक ही वह बात सीमित न रहे, उसके द्वारा सद्गुरु प्राप्त हो सकते है और आगे चलकर इस आधार पर परमात्मा की उपलब्धि भी हो सकती है।

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