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Magazine - Year 1960 - Version 2

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अपने स्वरूप को पहचानिये।

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(श्री गणपति विनायकराव शास्त्री)

अध्यात्म मार्ग के पथिक के सामने सबसे पहले एक प्रश्न उपस्थित हुआ करता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप क्या है? वर्तमान समय में पश्चिमी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में से तो अधिकाँश इस प्रश्न को बेकार समझते हैं, क्योंकि वे अपने स्थूल शरीर को ही सब कुछ समझते हैं और उसी को पुष्ट बनाने का प्रयत्न करते हैं। इसी विचार से वे सदैव ऐसे उपायों को ढूँढ़ते हैं जिनसे शारीरिक सुखों की वृद्धि हो सके और किसी भी तरह की असुविधा का सामना न करना पड़े। पर यदि गम्भीरता पूर्वक सोचा जाय तो यह “मनुष्य” की बहुत ही अधूरी और घटिया दर्जे की व्याख्या है। अगर इस हाड़, माँस और चाम के सिवाय और कुछ नहीं है, और बढ़िया किस्म के भोजन तथा वस्त्र प्राप्त कर लेने के सिवाय उसका और कोई ऊँचा उद्देश्य नहीं है, तो उसमें गाय, भैंस, घोड़ा आदि पशुओं की अपेक्षा थोड़ा ही अन्तर माना जायगा।

कहते हैं कि पुराने युगों में दो व्यक्ति थे। एक था विरोचन और दूसरा इन्द्र। उन दोनों के हृदय में भी ऐसा ही प्रश्न उठा कि मनुष्य क्या है-हम जो हमेशा “मैं” शब्द कहा करते हैं उसका क्या अर्थ है? वे दोनों ब्रह्माजी के पास अपनी इस समस्या का समाधान करने पहुँचे। ब्रह्माजी ने उनकी बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए एक बड़ी सी थाली में पानी भरवाकर उनके सामने रख दिया और कहा कि इसके ऊपर झाँक कर देखो। उस थाली के पानी में उनको प्रतिबिम्ब दिखलाई दिया। ब्रह्माजी ने कहा कि “इस थाली में तुमको जो दिखाई पड़ रहा है वही तुम हो।” इस बात को सुनकर वे बड़े प्रसन्न हुये क्योंकि सुन्दर वस्त्राभूषण पहिन कर उनको जल में अपनी बड़ी सुन्दर प्रतिच्छाया दिखलाई पड़ी थी। वे सोचने लगे कि “वाह, हम कैसे दर्शनीय और आकर्षक हैं। विरोचन ने तो उसी समय अपने साथियों के पास जाकर कह दिया कि “मैं तो “मैं” का पता लगा आया। तुम सब भी दर्पण आदि में देखकर अपने स्वरूप को पहचान सकते हो। इस प्रकार विरोचन के दल वाले अपने शरीर को ही अपना सच्चा स्वरूप समझकर उसे स्वच्छ, सुन्दर और सुदृढ़ बनाने में दत्त चित्त हो गये।

पर इन्द्र को थोड़ी देर बाद ही कुछ शंका होने लगी, कि थाली में तो हमने अपने वस्त्र और आभूषणों और मुख की छाया देखी थी। अगर “मैं” का अर्थ इन कपड़े, गहने आदि से है तो यह कोई महत्व की चीज नहीं। कपड़े मैले होकर फट जाते हैं और हम उनको उतार कर फैंक देते हैं। आभूषण भी गिरने पड़ने से खराब हो जाते हैं और उनको तोड़ कर फिर से बनाया जाता है। पर ऐसा होने से हम यह कभी नहीं समझते की “मैं” फट गया और बेकार होने से फेंक दिया गया। मनुष्य के शरीर की भी यही दशा है अगर दुर्घटना के कारण उसकी एक अँगुली कट जाती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि “मैं” कट गया। कुछ समय बाद घाव अच्छा हो जाने पर मनुष्य को उस अँगुली का ध्यान भी नहीं आता और वह पूर्ववत् जैसे का तैसा मनुष्य अथवा “मैं” बना रहता है। इसलिए केवल नेत्रों से दिखाई पड़ने वाले शरीर को ही मनुष्य का वास्तविक रूप मान लेना ठीक नहीं। यह विषय इससे कहीं अधिक गहरा और विचारणीय है। इस सम्बन्ध में विवेचना करते हुये एक विद्वान ने जो कुछ लिखा है, उससे हम अपने स्वरूप को पहिचानने में कुछ सहायता पा सकते है।

“इसमें सन्देह नहीं कि अपना स्वरूप जानने का प्रयत्न करना बड़ा कठिन है। परन्तु “हमारा कर्तव्य क्या है?” क्या इसकी मीमाँसा करना कुछ कम कठिन है? यदि “मैं” के विषय में दार्शनिकों और वैज्ञानिकों में मतभेद है तो “मेरा कर्तव्य क्या है?” इस विषय में भी विद्वानों में कुछ कम मतभेद नहीं रहा है। यदि “आत्म शास्त्र” बड़ा जटिल है तो “कर्तव्य शास्त्र” भी बहुत सी उलझनों से परिपूर्ण है। और सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिस चीज के स्वरूप का ही हमको पता नहीं तो उसके कर्तव्य का निर्णय कैसे किया जा सकता है? कर्तव्य का निश्चय तभी हो सकता है जब स्वरूप का निश्चय हो जायगा। जिन्होंने अपने स्वरूप को बिना पहिचाने अपने कर्तव्य का निश्चय करना चाहा, वे सदा भूलभुलैयां में ही पड़े रहे। इस लिये “मैं क्या हूँ” यह प्रश्न बड़ा महत्वपूर्ण है, बिना इसकी मीमाँसा किये हम “कर्तव्य शास्त्र” में एक कदम भी आगे नहीं चल सकते। उदाहरण के लिये यदि शरीर ही का नाम “मैं” है और शरीर के साथ ही इस “मैं” का भी अंत हो जाता है, तो इस “मैं” का भी कर्तव्य वैसा ही क्षणिक होगा जितना क्षणिक यह शरीर है। तब हम प्रत्येक कार्य के औचित्य और अनौचित्य का निर्णय करने के लिये केवल उन्हीं बातों पर दृष्टि रखेंगे जिनका सम्बन्ध हमारे इस शरीर और सौ पचास वर्ष के जीवन से है इसके आगे जाने की कोई उपयोगिता नहीं। कल्पना कीजिये कि मुझे किसी स्थान में केवल दो दिन रहना है, तो उस अवस्था में मुझे उन्हीं कामों के करने की आवश्यकता है जो दो दिन से सम्बन्ध रखते हों। क्या जरूरत है कि वहाँ ऐसा मकान बनाया जाय जो बरसों तक रह सके? क्या आवश्यकता है कि उन व्यक्तियों से सम्बन्ध जोड़ा जाय जो दो दिन से अधिक रहेंगे? उन शक्तियों और कार्यक्रमों पर ध्यान देने की भी क्या आवश्यकता है जिनका प्रभाव दो दिन के बाद पड़ेगा? परन्तु यदि “मैं” शरीर से अलग कोई अधिक स्थायी और विस्तृत पदार्थ है तो उसका कर्तव्य भी उसी प्रकार का मानना पड़ेगा।

“जो “मैं” का अर्थ समझने का यत्न नहीं करते उनका उदाहरण उस मनुष्य के समान है जो किसी जंगल में बड़े वेग से दौड़ रहा है, पर जब लोग उससे पूछते है कि “तुम कौन हो?” तो वह कहता है “मैं नहीं जानता। “ लोग पूछते हैं “तुम कहाँ को जाओगे?” वह कहता है “मैं नहीं जानता।” ऐसे व्यक्ति के विषय में आप क्या कहेंगे? यही न कि वह पागल है? इसलिये जो लोग इस “मैं” के तत्व या आत्म तत्व की खोज करने वालो को बुद्धि शून्य समझते हैं, उनकी बुद्धिमत्ता में यदि संदेह किया जाय तो कोई अनुचित बात न होगी”

इसलिये यदि मानव जीवन को सफल बनाना है, अपना वास्तविक कल्याण साधन करना है तो हमको सबसे पहले इस बात पर विचार करना चाहिये कि “मैं क्या हूँ - मनुष्य का यथार्थ स्वरूप क्या है? जब तक हम इस बात का दृढ़ निश्चय न कर लेंगे कि हम शरीर से भिन्न आत्म स्वरूप है, तब तक हम कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं कर सकते। फिर तो हमारा ध्यान उसी खाओ, पियो, मौज उड़ाओ वाले सिद्धान्त की तरफ जाएगा जो हमारा पतन कर देगा और हमको कीड़े-मकोड़ों की तरह बना देगा। जब मनुष्य को अपने दैवी स्वरूप का ज्ञान होगा तभी वह मनुष्य से देवता बनने की चेष्टा करेगा और उससे ऊँचा उठकर ब्रह्मस्वरूप बनने की अभिलाषा रखेगा।

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