शत-शत उन्हें प्रणाम (kavita)
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करो कवि, शत-शत, उन्हें प्रणाम!
प्यासों को दें नीर, क्षुधित को पवन अन्न-प्रसाद।
वस्त्र-हीन को वस्त्र, भूमि-हीनों को भू-प्रसाद॥
सदा जो देते दान अनाम!
करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम!!
निराधारों को दें आधार, बतायें भूलों को जो राह।
साँत्वना दें जो बनकर सुहृद, कराहें जब पीड़ित भर आह॥
कर्म में जिन के नहीं विराम!
करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥
तिमिर में दे जो दिव्य-प्रकाश, रुदन में अभिनवसा मधुहास।
व्यथा के बदले में मुस्कान, अकेले में तेरा आभास॥
वही तेरे स्वरूप अभिराम।
करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥
स्वयं सहते हैं आतप शीत, विनत हो जाते पा फल -भार।
थके पथिकों को दें विश्रान्ति, सुखद छाया ये तरु-उपहार॥
चोट सह दें जो फल रस-धाम।
करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥
दीप जला करता आलोकित पंथ, जो होता तुम से पूर्ण।
बहा करती सरिता अनवरत, धरा की रहे न प्यास अपूर्ण॥
करें सेवा, जो हो निष्काम।
करो कवि, शत-शत उन्हें प्रणाम॥
-राम स्वरूप खरे, साहित्य रत्न
*समाप्त*

