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Magazine - Year 1961 - November 1961

Media: TEXT
Language: HINDI
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खर दिमाग-एडीसन

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थामस एल्वा एडीसन उस वैज्ञानिक का नाम है जिसने वैज्ञानिक जगत में क्रान्ति उपस्थित कर दी। उनके लिये हुए अनेकों आविष्कारों से आज सारा संसार लाभ उठा रहा है। आजकल सड़कों पर मोटर दौड़ती दिखाई पड़ती हैं उनकी प्रारम्भिक उपज एडीसन ने ही की थी। बैटरी का उपयोग करने से इस स्वसंचालित वाहन के द्वारा मनुष्य को सुख सुविधा पहुँचाने के लिए उनने जो तोड़ प्रयत्न किया जिसका लाभ आज संसार भर में सर्वत्र उठाया जा रहा है। यह बिलकुल नई चीज उनके मस्तिष्क से निकली। इससे पहले कोई इसकी कल्पना भी न करता था। चलती फिरती तस्वीरें दिखाने वाला सिनेमा जो पीछे बोलने भी लगा- एडीसन के दिमाग की ही उपज है। सिनेमा के आविष्कार की बात सूझने से पहले वे फोटोग्राफी बिलकुल भी न जानते थे।। उसने उसके रहस्यों और सिद्धान्तों को सीखा और आखिर सिनेमा यंत्र बनाकर ही चैन लिया। टेलीफोन को पेटेण्ट कराने का श्रेय दो घंटे पूर्व अर्जी दे देने के कारण अलेक्जेन्डर ग्राहम बेल को मिला। भले ही एडीसन की अजी दो घंटे पीछे पहुँची पर इस दिशा में अत्यधिक श्रम और अनुसंधान उन्हीं का था। टेलीग्राफ के एक ही तार पर एक ही समय में विपरीत दिशाओं में चार टेलीग्राम एक साथ भेजे सकने का विचित्र लगने वाला आविष्कार भी उन्हीं का है। इसके अतिरिक्त भी उनने और कई महत्त्वपूर्ण आविष्कार किये और संसार के प्रमुख वैज्ञानिकों में अपना स्थान बनाया।

इतना बड़ा कार्य कर सकने वाला एडीसन किसी धनी मानी का बेटा न था और न आगे बढ़ने लायक कोई सहायता ही उसे कहीं से प्राप्त हुई वरन् इसके विपरीत दुर्भाग्य ही सदा उसका पीछा करता रहा और वह उसकी चोटों को सहते सहते हँसता हँसता आगे बढ़ा और चौरासी वर्ष की आयु तक एक कर्मठ सैनिक की तरह अथक परिश्रम करता रहा।

एडीसन में जन्म जात कोई प्रतिभा न थी, उस ने प्रतिभा को अपने परिश्रम और अध्यवसाय से पैदा किया था। उसने अपने जीवन वृतान्त में लिखा है-मैं अपने स्कूल का फिसड्डी लड़का था, सबके नीचे मेरा ही नम्बर रहता। अध्यापक मुझसे कुढ़ते थे, पिता ने मूर्ख घोषित कर रखा था। एक दिन मेरे अध्यापक ने इंस्पेक्टर को कहा ऐसे ‘खर दिमाग’ लड़के से स्कूल की जगह घेरना बेकार है। इसे निकाल देना ही उचित है। मैं अपने दुर्भाग्य पर रो पड़ा। घर आकर माता के अंचल में मुँह छिपा कर रोने लगा। इस संसार में केवल एक ही प्राणी ऐसा था जिसकी मुझ से सहानुभूति थी, वह थी मेरी माँ। उसने मुझे दिलासा दिया और पढ़ने का दूसरा प्रबन्ध कर दिया। किन्तु थोड़े ही दिनों में माता भी चल बसी। नौ से बारह वर्ष की आयु तक केवल तीन वर्ष स्कूल का मुँह देखा इसके बाद पढ़ाई समाप्त।”

इन परिस्थितियों में दूसरा कोई लड़का होता तो कुली मजूरी करके दिन गुजारता और उन्नति कर सकने की बात सोचता भी नहीं। पर एडीसन ऐसी कच्ची मिट्टी का बना हुआ न था, उसने आत्म विश्वास नहीं खाया और न पुरुषार्थ के महत्व को कम माना। लोग हँसी उड़ाते, मूर्ख कहें इससे क्या? अपना प्रयत्नइ न सबसे ऊपर है, जो लोग आज हँसी उड़ाते हैं कल प्रशंसा भी कर सकते हैं, उनकी बातों को ममत्व देना बेकार है। एडीसन के सोचने का तरीका यही था। उसने हिम्मत नहीं हारी। स्कूल छूट गया तो क्या, उसने अपनी शिक्षा स्वयं जारी रखी। जहाँ तहाँ से पुस्तकें प्राप्त करके स्वयं पढ़ना और अपनी ज्ञानवृद्धि करता।

पर साथ ही पेट की समस्या भी थी। उसने अख़बार बेचने का काम शुरू किया। आवाज लगा कर गलियों में अख़बार बेचता और अपना गुजारा चलाता। खिलौने, मीठी गोलियाँ, मूँगफली बेचने का काम भी उसने बहुत दिनों किया। बेचारा फटे टूटे कपड़े पहने रहता। बालों में कंघी और जूतों पर पालिश करने का सौभाग्य उसे सारे बचपन में मिला ही नहीं।

इन्हीं परिस्थितियों में उसने ज्ञान वृद्धि जारी रखी। जो कुछ कमाता उसमें से मितव्ययिता पूर्वक काम चलाना और थोड़ा बचा कर रखता। एक दिन उसने किसी छापाखाने का रही टाइप और छापने की छोटी सी एक टूटी मशीन खरीद ली। उसे ही जोड़ तोड़ कर एक पन्ने का अख़बार निकालने लगा। स्वयं ही उसे बेचने जाता। आठ आने मासिक के दो सौ ग्राहक स्थायी बन गये और रेल पर आकर दो सौ कापी वह फुटकर भी बेच लेता ।इस प्रकार उसका काम चलने लेगा। जो बचता वह बूढ़े बाप को गुजारे के लिए दे देता।

इन्हीं दिनों उसे वैज्ञानिक अन्वेषण का शौक लगा। उसने विज्ञान की सैकड़ों पुस्तकें पढ़ीं और जहाँ-तहाँ जाकर प्रयोगशालाएँ देखी। घर पर उसने एक बेकार रहने वाले गाड़ी के डिब्बे में प्रयोगशाला बनाई।। दुर्भाग्य से एक दिन प्रयोग की कुछ शीशियाँ फैल गई और उस लकड़ी की कोठरी में आग लग गई। आग तो बुझ गई पर मालिक उस पर बहुत नाराज हुआ ।।कान पर कसकर मुक्का मारा और सब सामान निकाल कर सड़क पर फेंक दिया। मुक्का ऐसे जोर से लगा कि एडीसन का एक कान सदा के लिए बहरा हो गया।

दुर्भाग्य ने कस-कसकर उनकी दृढ़ता को परखा पर वे हर बार खरे उतरे। अख़बार में किसी व्यक्ति की निंदा छपी तो वह बहुत रुष्ट हुआ। एक दिन वह रास्ते में मिल गया तो उसने एडीसन को पकड़ कर सेन्टक्लेयर नदी में फेंक दिया। बेचारे मरते मरते बचे। घर के बाहर टेलीग्राफ की शोध के लिए कुछ तार लगा रखे थे। एक दिन पड़ोस की गाय उनमें उलझ गई। इस पर उन्हें कड़ी फटकार सहनी पड़ी और तार उखाड़ कर समेट लेने पड़े।

इन विषम परिस्थितियों से लड़ते हुए वे अपने ज्ञान और प्रयत्न में निरन्तर वृद्धि करने में संलग्न थे साथ ही मानवता की सेवा का कभी कोई अवसर सामने आता तो उसे भी हाथ से जाने न देते। किसी का एक छोटा बच्चा दौड़ती हुई रेल के आगे आ गया। एडीसन से बड़े सपाटे से उसे उठाया फिर भी उनको पैर की एड़ी पहियों के नीचे आ गई। चोट तो अधिक नहीं लगी, बच्चा तथा वे दोनों ही बच गये। बालक के पिता को जब पता लगा तो वह उनके इस त्याग के लिए बहुत कृतज्ञ हुआ। अधिक परिचय बढ़ने पर उसने उन्हें स्टेशन पर टेलीग्राफ आपरेटर का काम सीखने की व्यवस्था करा दी। उसमें वे सफल हुए और नौकरी लग गई। प्रयोग उनके वहाँ भी जारी रहते। एक दिन वे नौकरी के स्थान पर ही प्रयोग कर रहे थे कि तेजाब का बर्तन उलट गया। वह बहता हुआ मैनेजर के कमरे तक चला गया और मैनेजर की मेज़ तथा दरी जला दीं। इस पर उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। उन्हें फिर पेट के लाले पड़ गये। प्रयोग जारी थे। बारह सौ रुपया कर्ज चढ़ गया। आमदनी कुछ भी नहीं, तीन सप्ताह आधे पेट कुछ खाकर उन्हें दिन काटने पड़े।

इतने पर भी वह निराश न था। जैसे भी हो प्रयत्न जारी रखने की अपनी लगन पर वह अड़ा रहा। गुजारे के लिए एक नौकरी भी मिल गई और उसके प्रयत्न अधिक तेजी से चलने लगे। वेतन के पैसों में से बहुत थोड़े में गुजारा करते और शेष को अन्वेषण कार्य तथा पुस्तकों में खर्च करते। उन्हें अपने प्रयोगों में सफलता मिलती गई। मिलती भी क्यों नहीं- उनने अपने को अपने कार्य में तन्मय जो कर दिया था। दिन रात वे काम करते रहते।

काम की इतनी लगन थी कि जन्म दिन के उत्सव पर भी वे काम छोड़ने में अनमने होकर ही भोजन करने उठते। अपने नियमित और संयमित जीवन क्रम के आधार पर उन्होंने लम्बी आयु पाई। चौरासी साल तक वे जिये और अन्त समय तक काम करते रहे।

एडीसन की वैज्ञानिक सफलताओं का इतना मूल्य नहीं है जितना कि उनके आत्म विश्वास का। ऐसी सफलताएँ तो और लोग भी प्राप्त कर लेते है। पर जितनी निराशा जनक परिस्थितियों से उसने लोहा लिया और कभी हारने की बात सोची भी नहीं, वह विशेषता ही उनकी महानता है। जिन व्यक्तियों का मानसिक स्तर इतना मजबूत हो उनके लिए अभीष्ट सफलताओं का मिलना कुछ विशेष कठिन नहीं होता।

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Language: HINDI
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November 1961
Type: TEXT
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