सत्कर्म ही क्यों न करें?
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ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानाँ सम्पेक्षकः।
स्रबते ब्रह्म तस्वामि मित्र भाण्डात् पयो यथा॥
दीन दुर्बलों का अनुचित रीति से सताया जाना जो ब्राह्मण अपने को समदर्शी और शान्त कहकर अपने आराम के लिए उपेक्षा पूर्वक देखता रहता है उसका मिथ्या ब्रह्मज्ञान फूटे हुए बर्तन में से पानी जैसा चू जाता है। तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदाहरिः॥
तृण से भी छोटा बने, वृक्षों से भी अधिक सहिष्णु बने, मद और मान को छोड़ दे। ऐसा बनकर हरि का भजन करें। तप्यन्ते लोक तापेन साधवः प्रायशो जनाः।
परम सघनंतद्धि पुरुषस्या खिलात्मनः।
-श्रीमद्भागवत 8/7/444
सत्पुरुष दूसरों के दुःख से द्रवित हो जाते है। यही उनकी सर्वोच्च ईश्वर भक्ति है। न काभयेअहं गति मीश्वरात् परा,
मष्टद्धि युक्ताम पुनर्भवं वा।
आतिं प्रपक्षेअग्बिल देहभाक्षा,
भन्तः स्थितो येन भवन्त्य दुःखाः॥
-श्रीमद्भागवत 9/21/12
रन्ति देव ने कहा-मैं परमात्मा से अष्ट सिद्धियाँ या परमगति नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि सभी प्राणियों के दुःख मेरे ऊपर आ पड़े और वे सब दुःख रहित हो जाय। कथंचिदुपकारेण कृतेनेकेन मुद्यति।
न स्यरत्यपवाराणाँ शतमत्यात्म वत्तया।
-बाल्मीकिव अयोध्या 4
रामचन्द्रजी किसी के एक ही उपकार को जन्म भर याद रखते थे पर उसके सैकड़ों उपकारों को भी तत्काल भूल जाते थे। अलंकाल संगेन क्रियताँ बुद्धि निश्चयः।
-बाल्मीकि
बस और समय मत चाहो, जो कुछ करना है अब निश्चय ही कर लो। श्वः कार्यमद्य कुवीत पूर्णहें त्तपराह्रिक्रम्।
नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्यन का कुदम्॥
कल का काम आज और शाम का सवेरे ही कर डालो। मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती कि तुमने क्या कर लिया और क्या शेष रह गया ? ये युध्यन्ति प्रधनेषु शरासो ये तनृज्यजः।
ये वा सहस्त्रदक्षिणास्ताँश्चि देवापि गच्छतात्॥
-वेद
संग्राम में लड़ने वाले वीरों की भाँति आदर्श के लिए प्राण त्यागने वाले, अनेक प्रकार के त्याग और दान करने वाले सज्जनों की गति को तू प्राप्त कर। व भार राज्यं सहि पुत्र हेतोः,
पुत्रं कुलार्थ यशशे कुलं तु।
स्वर्गाय शब्दं दिवभात्म हेतो,
धर्मार्थमात्मा स्थितिमाचकाँक्ष॥
-बुद्धचरितम् 2/56
उसने राज्य का पुत्र के लिए, पुत्र का कुल के लिए, कुल का यश के लिए पालन किया और यश की स्वर्ग के लिए, स्वर्ग की आत्मा के लिए, और आत्म जीवन की धर्म के लिए आकांक्षा की। श्रुति कहती हैः-
उद्याने ते पुरुष नाव यानं जीवातुँ ते दक्षता तुँ कृणोभि।
तू ऊँचा उठ, नीचे मत गिरे। ऊपर उठने योग्य तुझे अनेक शक्तियों से सुसम्पन्न बनाया गया है। एवं सर्वमिदं कृत्वा यन्मया सदितं शुभम्।
तेनस्याँ सर्वसत्वानाँ सर्व दुःख प्रशान्ति कृत।
मैंने जो कुछ भी पुण्य किया हो, उसके शुभ फल में सब प्राणियों के दुःख मिटें। सर्व त्यागश्च निर्वाणं निर्वार्णार्थ च में मनः।
त्यक्तव्यं चेन्मना सर्व वरं सत्वेणु दीयताम्।
-बोधिधर्मावतारः
मेरा मन मोक्ष चाहता है। मोक्ष क्या है ? सर्वस्व का त्याग ही मोक्ष है। हे मन! यदि एक दिन सबको छोड़ कर ही जाना है तो जो कुछ है उसे विश्वकल्याण ही क्यों न दे दिया जाय ? जिससे सहज ही मोक्ष भी मिल जाय ? उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूति कर्मसु।
भविप्यती त्यंव मनः कृत्वा सततमव्ययैः॥
-श्रुति
उठो, जागो, अच्छे कर्मों में लगो। मन को दृढ़ रखो, इसी से कल्याण होगा। विश्व तद्भद्रं यदवन्ति देवाः।
-ऋग्वेद 1/164/46
इस विश्व में जो कुछ श्रेष्ठ है उसकी देवता रक्षा करते है। भूत्यैजागरणम। अभूत्यै स्वपनम्।
यजु 30/17
जगने में वैभव और सोने में दारिद्र मिलता है। दक्षिणावन्तो अमृतंभजन्ते। दक्षिणावन्तः प्रति रन्त आयुः।
-ऋग्वेद 1/112/6
दक्षिणा देने वाले दानी अमृत पद पाते है। वे ही दीर्घायु होते है। न श्वः श्वमुपासीत। को हि मनुष्य स्यश्वोवेद।
-शतपथ 2/1/3/9
कल के भरोसे मत बैठे रहो। कल किसने देखा है? डतोरयिः पृणतो नोप दस्यत्युता पृणन् मर्डितारं न विन्दते।
-ऋग्वेद 10/117/1
दानियों का धन क्षीण नहीं होता। कंजूसों को क्षमा नहीं किया जाता।
स्रबते ब्रह्म तस्वामि मित्र भाण्डात् पयो यथा॥
दीन दुर्बलों का अनुचित रीति से सताया जाना जो ब्राह्मण अपने को समदर्शी और शान्त कहकर अपने आराम के लिए उपेक्षा पूर्वक देखता रहता है उसका मिथ्या ब्रह्मज्ञान फूटे हुए बर्तन में से पानी जैसा चू जाता है। तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदाहरिः॥
तृण से भी छोटा बने, वृक्षों से भी अधिक सहिष्णु बने, मद और मान को छोड़ दे। ऐसा बनकर हरि का भजन करें। तप्यन्ते लोक तापेन साधवः प्रायशो जनाः।
परम सघनंतद्धि पुरुषस्या खिलात्मनः।
-श्रीमद्भागवत 8/7/444
सत्पुरुष दूसरों के दुःख से द्रवित हो जाते है। यही उनकी सर्वोच्च ईश्वर भक्ति है। न काभयेअहं गति मीश्वरात् परा,
मष्टद्धि युक्ताम पुनर्भवं वा।
आतिं प्रपक्षेअग्बिल देहभाक्षा,
भन्तः स्थितो येन भवन्त्य दुःखाः॥
-श्रीमद्भागवत 9/21/12
रन्ति देव ने कहा-मैं परमात्मा से अष्ट सिद्धियाँ या परमगति नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि सभी प्राणियों के दुःख मेरे ऊपर आ पड़े और वे सब दुःख रहित हो जाय। कथंचिदुपकारेण कृतेनेकेन मुद्यति।
न स्यरत्यपवाराणाँ शतमत्यात्म वत्तया।
-बाल्मीकिव अयोध्या 4
रामचन्द्रजी किसी के एक ही उपकार को जन्म भर याद रखते थे पर उसके सैकड़ों उपकारों को भी तत्काल भूल जाते थे। अलंकाल संगेन क्रियताँ बुद्धि निश्चयः।
-बाल्मीकि
बस और समय मत चाहो, जो कुछ करना है अब निश्चय ही कर लो। श्वः कार्यमद्य कुवीत पूर्णहें त्तपराह्रिक्रम्।
नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्यन का कुदम्॥
कल का काम आज और शाम का सवेरे ही कर डालो। मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती कि तुमने क्या कर लिया और क्या शेष रह गया ? ये युध्यन्ति प्रधनेषु शरासो ये तनृज्यजः।
ये वा सहस्त्रदक्षिणास्ताँश्चि देवापि गच्छतात्॥
-वेद
संग्राम में लड़ने वाले वीरों की भाँति आदर्श के लिए प्राण त्यागने वाले, अनेक प्रकार के त्याग और दान करने वाले सज्जनों की गति को तू प्राप्त कर। व भार राज्यं सहि पुत्र हेतोः,
पुत्रं कुलार्थ यशशे कुलं तु।
स्वर्गाय शब्दं दिवभात्म हेतो,
धर्मार्थमात्मा स्थितिमाचकाँक्ष॥
-बुद्धचरितम् 2/56
उसने राज्य का पुत्र के लिए, पुत्र का कुल के लिए, कुल का यश के लिए पालन किया और यश की स्वर्ग के लिए, स्वर्ग की आत्मा के लिए, और आत्म जीवन की धर्म के लिए आकांक्षा की। श्रुति कहती हैः-
उद्याने ते पुरुष नाव यानं जीवातुँ ते दक्षता तुँ कृणोभि।
तू ऊँचा उठ, नीचे मत गिरे। ऊपर उठने योग्य तुझे अनेक शक्तियों से सुसम्पन्न बनाया गया है। एवं सर्वमिदं कृत्वा यन्मया सदितं शुभम्।
तेनस्याँ सर्वसत्वानाँ सर्व दुःख प्रशान्ति कृत।
मैंने जो कुछ भी पुण्य किया हो, उसके शुभ फल में सब प्राणियों के दुःख मिटें। सर्व त्यागश्च निर्वाणं निर्वार्णार्थ च में मनः।
त्यक्तव्यं चेन्मना सर्व वरं सत्वेणु दीयताम्।
-बोधिधर्मावतारः
मेरा मन मोक्ष चाहता है। मोक्ष क्या है ? सर्वस्व का त्याग ही मोक्ष है। हे मन! यदि एक दिन सबको छोड़ कर ही जाना है तो जो कुछ है उसे विश्वकल्याण ही क्यों न दे दिया जाय ? जिससे सहज ही मोक्ष भी मिल जाय ? उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूति कर्मसु।
भविप्यती त्यंव मनः कृत्वा सततमव्ययैः॥
-श्रुति
उठो, जागो, अच्छे कर्मों में लगो। मन को दृढ़ रखो, इसी से कल्याण होगा। विश्व तद्भद्रं यदवन्ति देवाः।
-ऋग्वेद 1/164/46
इस विश्व में जो कुछ श्रेष्ठ है उसकी देवता रक्षा करते है। भूत्यैजागरणम। अभूत्यै स्वपनम्।
यजु 30/17
जगने में वैभव और सोने में दारिद्र मिलता है। दक्षिणावन्तो अमृतंभजन्ते। दक्षिणावन्तः प्रति रन्त आयुः।
-ऋग्वेद 1/112/6
दक्षिणा देने वाले दानी अमृत पद पाते है। वे ही दीर्घायु होते है। न श्वः श्वमुपासीत। को हि मनुष्य स्यश्वोवेद।
-शतपथ 2/1/3/9
कल के भरोसे मत बैठे रहो। कल किसने देखा है? डतोरयिः पृणतो नोप दस्यत्युता पृणन् मर्डितारं न विन्दते।
-ऋग्वेद 10/117/1
दानियों का धन क्षीण नहीं होता। कंजूसों को क्षमा नहीं किया जाता।

