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Magazine - Year 1961 - November 1961

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तत्त्वदर्शियों की दृष्टि में सत्य का तथ्य

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संसार भर के श्रेष्ठ आत्मज्ञानी और तत्त्वदर्शियों ने अपने व्यक्तित्व जीवन के निष्कर्षों एवं अनुभवों का निचोड़ यही बताया हैं कि सत्य पर प्रारुढ़ रहा जाय। ईश्वरीय अभिवचनों, धर्मग्रन्थों, इस पुरुषों के सन्देश इसी तथ्य की ओर निर्देश करता हैं कि मनुष्य सत्य पर आरूढ़ रहे। यह देश काल पात्र के कारण प्रभावित नहीं होता। सृष्टि के आदि में सत्य की जैसी महत्ता और श्रेष्ठता थी आज भी वैसी ही हैं। इसका अनेकों ने अनुसंधान किया हैं और अनन्तः उसी परिणाम पर पहुँचना पड़ा हैं जहाँ अनादिकाल से प्राप्त पुरुष पहुँचे थे।

महात्मा इमर्सन की अनुभूति हैं कि- जिस सुन्दरतम और श्रेष्ठतम आधार पर मनुष्य को अपना जीवन अवस्थित करना चाहिए वह हैं- सत्य। सत्य के विरुद्ध किया हुआ प्रत्येक आचरण मानव समाज के स्वस्थ शरीर में छुरी भौंकने के समान निन्दनीय है।

दार्शनिक प्लेटो ने कहा-सत्य को ईश्वर और उसके प्रतिबिम्ब को प्रकाश कहते हैं।” महात्मा शेखसादी की उक्ति हैं-ईश्वर को प्राप्त करने का एक मात्र मार्ग सत्य को अपनाना हैं। जो सचाई के मार्ग पर चलता हैं वह कभी भटकता नहीं।” सुकरात का वचन हैं-मनुष्य को वैसा ही बनना चाहिए जैसा वह अपने को दिखाता हैं। मनुष्यता का गौरव इसी में हैं कि हम अपनी अन्तरात्मा के सामने सच्चे और ईमानदार सिद्ध हों। हमारा ध्येय सत्य होना चाहिए न कि सुख।” कन्फ्यूशियस कहा करते थे- “जो सच्चा होगा वह कर्मठ भी रहेगा। आलस्य और विलासिता असत्य की देन हैं। सचाई की राह सादगी से भरी हुई हैं उस पर चलने वाले न तो घमण्डी हो सकते हैं और न ढोंगी। मनीषा कान्ट का कथन हैं-सचाई की वह तत्त्व हैं जिसे अपने ने पर मनुष्य भले और बुरे की परख कर सकता हैं। हृदय गत सभी सद्गुणों के विकास की कुँजी मनुष्य की सत्यनिष्ठा में सन्निहित हैं।”

तत्वदर्शी अरस्तु ने कहा हैं-सत्य को सुनने और बोलने के समान और कोई आनन्ददायक वस्तु इस संसार में नहीं हैं।” विद्वान् ऐनोन कहा करती था।-” यह मत देखो कि कौन कह रहा हैं वरन् यह देखो कि सत्य कहाँ से कहाँ जा रहा हैं।” होरेसमन ने कहा हैं-यह जरूरी नहीं कि बिना पात्र कुपात्र का ख्याल किये हर सच्ची बात पूरी की पूरी हर किसी से कह दी जाय। परन्तु इतना अवश्य ध्यान रखा जाय कि जिससे जितना कहा जाय हैं सत्य ही होना चाहिए।” कडवर्थ ने बताया हैं कि-विश्व की सबसे बलवान शक्तियाँ दो हैं एक सत्य दूसरी प्रेम। जब यह दोनों एक साथ मिल जाती हैं तब इनका वेग इतना प्रबल होता हैं कि उसे कोई रोक नहीं सकता।” दार्शनिक भीनायस ने कहा हैं-सत्य का मार्ग एक चौड़ी आम सड़क को भाँति हैं जिसे जनना किसी के लिए भी कठिन नहीं हैं। कमी सिर्फ इतनी हैं कि लोग उसकी खोज नहीं करते और न उस पर चलने की इच्छा करते हैं।”

पाइथागोरस का कथन हैं-सत्य इतनी महान् पूर्णता हैं कि यदि कभी ईश्वर मनुष्य के सामने प्रकट होना चाहेगा तो वह प्रकाश को अपना शरीर बनाएगा और सत्य को अपनी आत्मा।” रोशियो का कहना हैं- “सत्य समस्त आशीर्वाद से अधिक मूल्यवान हैं। वह बुद्धि का नेत्र हैं इसके बिना मनुष्य अन्धा हैं। सन्त सिल्वियो पैलिको ने कहा हैं-’ सत्य के प्रति प्रेम उसमें विश्वास और दृढ़ता समस्त कर्तव्यों में प्रथम और उत्तम कर्तव्य हैं। ईश्वर से प्रेम करना और सत्य से प्रेम करना एक ही बात है।” डीमेस्थेन्स का मत हैं- “भगवान का प्रतिबिम्ब यदि मनुष्य की अन्तरात्मा में चमकता हैं तो उसका रूप सत्य प्रेम और न्याय से संमिश्रित होता हैं।” पालसन की उक्ति हैं-सत्य में दो विशेषताएँ रहती हैं एक यह कि वह मनुष्य को ऐसा दिव्य सौंदर्य प्रदान करता हैं जिससे वह संसार का प्रियपात्र बने और दूसरा यह कि वह सत्य प्रेमी को ऐसा पवित्र तेज प्रदान करता हैं जिससे वह अगणित प्राणियों द्वारा पूज्य बने। इसी प्रकार असत्य की भी दो विशेषताएँ हैं-एक दुष्टता जो मनुष्य को वीभत्स बनाती हैं और दूसरी धृष्टता जो उसे हास्यास्पद बनाती हैं।”

मनीषी काटन कहता हैं-सत्यवादी से यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह दुनियादारी की कुटिल नीतियों और कपटपूर्ण फरयो से सौदा पटाकर, तालमेल मिलाकर चलेगा। सत्य तो प्रकाश किरणों के समान एक सीधी रेखा पर चलता हैं जिसमें ओछे तिरछे घूमने या मुड़ने की गुँजाइश नहीं हैं।” जोसफ पार्कर ने बताया हैं कि- “असत्य उतावला होता हैं। उसे कभी भी पहचाना और दंडित किया जा सकता हैं। सत्य शान्त और गम्भीर होता हैं। उसे ईश्वर का उच्च न्यायालय भी केवल सम्मानित ही कर सकता हैं।”

मानव जीवन एक बहुत बड़ा सत्य हैं, उसकी आधार शिला सत्य पर ही रखी गई हैं। उसका अक्ष सत्य हैं इसीलिए उसकी जीवन नीति भी सत्य पर ही आधारित होनी चाहिए हमारा मन, वचन और काम एक होना चाहिये। जो मन में हो वही वाणी से कहें और जो कहें वही करें भी। पाप दूत्तियाँ यदि मन में आती हों तो अपनी दुर्बलताओं को सज्जनों के समक्ष उपस्थित कर दें ताकि वे उनको पनपने न देने और उनका निवारण करने का उपाय बता सकें। यदि कोई पाप बन पड़े हैं तो सदा उन्हें इज्जत आबरू में बट्टा लगने के डर से छिपाये ही न रहें वरन् सर्व साधारण के सामने न सही तो गुरुजनों के सामने तो अवश्य ही प्रकट कर दें। ताकि दुराव का भार मन पर से हलका हो जाय। हो सके तो विगत भूलों का, असत्य अनुचित आचरण का प्रायश्चित्त भी करने का प्रयत्न करें।

झूठ बोलने की एक प्रकार से नशेबाजी की तरह ही आदत पड़ जाती हैं, जिससे प्रेरित होकर मनुष्य अकारण बेकार की गप्पें लड़ाया करता हैं और झूठ बोला करता हैं। इस आदत को तुरंत छोड़ना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया हैं कि-” शब्दों को ब्रह्म” अर्थात् वाणी ईश्वर का रूप हैं? इसे शारदा भी कहते हैं। अतएव इस महान् तत्त्व का हमें सम्मान और सदुपयोग ही करना चाहिये। प्रत्येक शब्द को नाप तौलकर बोले, सोच समझ कर बोले, उतना बोले जितना आवश्यक हो। जीभ को कतरनी की तरह हर घड़ी चलाते रहने वाले को अनायास ही बहुत सा झूठ बोलना पड़ता हैं, इसलिए कम बोलने की आदत डालनी चाहिए। अभ्यास के लिए कभी कभी मौन व्रत भी लेना चाहिए। महात्मा गाँधी सप्ताह में एक दिन मौन रहते थे। मौन के जहाँ अन्य अनेक आध्यात्मिक लाभ हैं वहाँ उससे वाणी का संयम भी होता हैं और अनावश्यक एवं असत्य भाषण करने की आदत पर अंकुश लगता हैं।

हमें सत्य ही बोलना चाहिए। सत्य के अनुकूल ही सोचना चाहिए। सत्य से शोधित कर्म ही करना चाहिए सत्य परायण होकर ही हम सत्य स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कर सकेंगे। महापुरुषों ने अपने निज के अनुभव में सत्य यो ही सार पाया हैं और उसी का आचरण करने का हमें निर्देश किया हैं।

यदि पूर्ण सत्य निष्ठ होना कठिन मालूम पड़े तो जितना बन पड़े अधिकाधिक मात्रा में उस मार्ग पर चलने का प्रयत्न करना चाहिए। एक प्राप्त वचन हैं-

अतुगन्तु सतं कर्म कृरनं यदि न शक्यते। सल्पमप्यनुगन्तव्यं भार्गस्थो नावसीदति॥

“यदि सत्पुरुषों के मार्ग पर पूरी तरह चल सकना न बन पड़े तो थोड़ थोड़ा ही चलें। क्योंकि आगे बढ़ते रहने वाला कभी न कभी मंजिल पर पहुँच ही जाता हैं।”

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November 1961
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