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Magazine - Year 1971 - Version 2

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शरीर की प्यास -आत्मा का अभ्यास

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आप तो आत्मदर्शी है ऋषिकुमार ! सभी जानते हैं जानते तरुणाई की साध, साधनाओं में घुला कर सिद्धि पाई है सब में ही अद्वैत आत्मा के दर्शन करते हैं आन, फिर क्या मैं आत्मा नहीं हूँ जो आन मेरी आकांक्षाओं की उपेक्षा करते है-एक मनमोहन दृष्टि इतना कहते कहते एक बार ऊपर उठी और महायोगी विरुपाक्ष के दाडिम से दमकते आनन पर टिककर एक क्षण में ही झुक गई।

अधरों पर एक मद्धिम मुस्कान बिखेरते हुये विरुपाक्ष ने उत्तर दिया-वारुणी आन सच कहती है आप में भी वही आत्मा है जो समस्त जीवों में है मुझमें यह जो चेतना काम कर रही है वह भी आत्मा ही है किन्तु देवि! विशुद्ध हुई आत्मा अपने ही गुणों का रसास्वादन करती है। करुणा का सुख , सेवा और सौजन्यता का अमृत प्राणिमात्र में प्रेम भाव की प्रतिष्ठा-भद्रे! मैं नहीं समझता इन भावनाओं से भी बढ़कर कोई सुख है इस संसार में ? तुम शारीरिक सौन्दर्य को इतना महत्व क्यों देती हो, आत्मा गुणों के प्रकाश में क्यों नहीं आती ?

वारुणी ने नीति शास्त्र पढ़ा था, दर्शन पढ़ा था, पातंजलि योग सूत्र भी उसने कंठस्थ किये थे किन्तु सब वैभव के बन्दीगृह में । वह एक नृत्यांगना के घर जन्मी भी, जब वह पढ़ती तब पायलों की झंकार

कहरवा और राग बेहरतवील की लय में उसका मन झूमा करता, पखावज के साथ उसका पैर झूमने लगता तो सितार के साथ उसकी चुनर हवा में थिरकने लगती। शिक्षित होकर भी वातावरण ने उसे भोग की भूख और वासना की प्यास दी थी वह आत्मा की निर्लेप भाव स्थिति को भला क्या जानती ? विरुपाक्ष का उपदेश काम नहीं आया पर यह भी सच था कि उसने अपने सौंदर्य का जो जाल विरुपाक्ष को पाशबद्ध करने के लिये फैलाया था वह भी चूर चूर हो गया। भद्रे ! विरुपाक्ष ने कहा-जब तक मनुष्य का मन निर्मल न हो वह भाव-प्रतिज्ञा को क्या समझेगा- लो मैं चला पर याद रखना तुम्हारी यह काम लिप्सा ही एक दिन तुम्हारे पतन का कारण बन सकती है” -यह कहकर महाभाग विरुपाक्ष वहाँ से चल पड़े। वारुणी उन्हें अपलक देखती ही रह गई।

पहला अवसर था जब वह किसी पुरुष द्वारा ठुकराई गई हो। वीरांगना वारुणी कि सौन्दर्य ने आकर्षित न किया हो ऐसा एक भी तो राजकुमार ,तरुण नागरिक श्री सामन्त नहीं बचा था अगस्तारण्य में । विरुपाक्ष ही ऐसे व्यक्ति थे जिसके संयम से समक्ष वारुणी स्वयं पराभूत हो गई थी।

वर्ष पर वर्ष बीतते गये । काल के थपेड़े खाकर वारुणी का सौन्दर्य न जाने कहाँ नष्ट हो गया। यौवन के पाप वृद्धावस्था में रोग और आवेश के रूप में फल-फूलकर सामने आये। अद्भुत है कर्म कृषि जो जैसा बोता है वैसा ही काटता है। आज सारे नगर में विशूचिका का प्रकोप है हजारों लोग काल कवलित हो रहे है तथापि औरों के घर प्रकाश तो है सेवा-सुश्रूषा करने वाले तो है एक वारुणी ही ऐसी है जिसके घर में भी अन्धकार है और मन व मस्तिष्क में भी निराशा और सन्ताप की तमिस्रा। कष्ट बढ़ता जा रहा है पर प्राण नहीं निकलते । सारे शरीर में व्रण फूट रहे है घाव पोंछने वाला भी कोई नहीं है । वारुणी की आंखें पश्चाताप के आंसुओं से गीली हो रही है।

तभी द्वार खुलने की आवाज सुनाई दी। किसी ने आगे बढ़कर ज्योति स्तम्भ पर रखे सूखे दिये को टटोला और दीपक जलाया। आचार्य विरुपाक्ष वारुणी ने गीले नेत्र उठाकर देखा-अब उनसे वेदना की निर्झरिणी फूट रही थी । आचार्य ने आगे बढ़कर वारुणी को हाथ का सहारा देकर बैठाया , जल पिलाया घाव धारेये , औषधि लेपन किया। हलकी शीतलता- नींद आ गई वारुणी ने उसको स्वप्न में देखा-कि दिव्य ज्योति सम्मुख खड़ी कह रही है-वारुणी छोड़ इन भोगो की कामना को और आ मुझमें मिल जा । वारुणी का दर्द धुल गया और अब वह अपने आपको उस आत्मा में लीन अनुभव कर रही थी जिसमें महाभाग विरुपाक्ष विचरण किया करते थे।

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