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Magazine - Year 1971 - Version 2

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भावनाओं अभिव्यक्त विश्वात्मा

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अमरीका के सैनडिगो चिड़िया घर में एकबार एक बन्दर दम्पत्ति ने एक बच्चे को जन्म दिया। मादा ने खूब स्नेह और प्यार पूर्वक बच्चे का पालन-पोषण किया। बच्चा अभी 20 महीने का ही हुआ था कि मादा ने एक नये बच्चे को जन्म दिया। यद्यपि पहला बच्चा माँ का दुख पीना छोड़ चुका था तथापि संसार के जीव मात्र को भावनाओं की न जाने क्या आध्यात्मिक भूख है उसे अपनी माँ पर किसी और का अधिकार पसन्द न आया। उसने अपने छोटे भाई को हाथ से पकड़ कर खींच लिया और खुद जाकर माँ के स्तनों से जा चिपका।

स्वार्थ एक सामाजिक दोष है और अपराध का करण है। इसलिये उसकी हर सभ्य और भावनाशील समाज में निन्दा की जाती है पर यहाँ स्वार्थ की अपेक्षा भावुकता की मात्रा अधिक थी। भाव तो वह शक्ति है जो स्वार्थ को भी सभ्य कर देता है और नियम वृद्धता का भी उल्लंघन कर देता है। इससे लगता है भाव मनुष्य जीवन की मूल आवश्यकता है। हम उस आवश्यकता के कारण की शोध कर जाये तो जीवन विज्ञान के अदृश्य सत्य को खोज निकालने में सफल हो सकते हैं।

मादा ने अनुचित पर ध्यान नहीं दिया। उसने बड़े बच्चे को भावना पूर्वक अपनी छाती से लगा लिया और उसे दूध पिलाने के लिये इनकार नहीं किया जबकि अधिकार उसका छोटे बच्चे का ही था। दो तीन दिन में छोटा बच्चा कमजोर पड़ने लगा। चिड़िया घर की निर्देशिका बेले. जे . बेनशली के आदेश से बड़े बच्चे को वहाँ से निकाल कर अलग कर दिया गया। अभी उसे अलग किये एक दिन ही हुआ था, वहाँ उसे अच्छी से अच्छी खुराक भी दी जा रही थी किन्तु जीव मात्र की ऐसी अभिव्यक्तियाँ बताती है कि आत्मा की वास्तविक भूख, प्राकृतिक सम्पत्ति और पदार्थ भोग की उतनी अधिक नहीं जितनी कि उसे भावनाओं की प्यास होती है। भावनायें मिलने पर अच्छे और शिक्षित लोग भी खूँख्वार हो जाते हैं जबकि सद्भावनाओं की छाया में पलने वाले अभाव ग्रस्त लोग भी स्वर्गीय सुख का रसास्वादन करते रहते हैं। बड़ा बच्चा बहुत कमजोर हो गया जितनी देर उसका संरक्षक उसके साथ खेलता उतनी देर तो वह कुछ प्रसन्न दीखता पर पीछे वह किसी प्रकार की चेष्टा भी नहीं करता, चुपचाप बैठा रहता, उसकी आंखें लाल हो जाती , मुँह उदास हो जाता स्पष्ट लगता कि वह दुःखी है।

गिरते हुए स्वास्थ्य को देखकर उसे फिर से उसके माता पिता के पास कर दिया गया। वह सबसे पहले अपनी माँ के पास गया पर उसकी गोद में था छोटा भाई,फिर वही प्रेम की प्रतिद्वन्द्विता। उसने अपने छोटे भाई के साथ फिर रूखा और शत्रुता पूर्ण व्यवहार किया। इस बार माँ ने छोटे बच्चे का पक्ष लिया और बड़े को झिड़क कर अलग कर दिया मानो वह बताना चाहती हो कि भावनाओं की भूख उचित तो है पर औरों की इच्छा का भी अनुशासन पूर्वक आदर करना चाहिए। जो अपने से छोटों पर कृपा नहीं कर सकता, उनके प्रति स्नेह और उदारता व्यक्त नहीं कर सकता वह भी क्या इंसान।

कहते हैं अनुशासन-व्यवस्था और न्याय कि लिये थोड़ी कड़ाई अच्छी ही होती है। अहिंसा की शक्ति हिंसा से हजार गुना अच्छी ,घृणा नहीं संसार में करुणा बड़ी मानी जाती है, प्रेम देना चाहिए बैर नहीं बाँटना चाहिये पर यदि अहिंसा हिंसा , करुणा, चाटुकारिता तथा प्रेम में विश्वास की हिंसा की जा रही हो, अनीति और अन्याय का आचरण किया जा रहा हो तो दण्ड ही उस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता होती है। शक्ति की मनमानी रोकने के लिए युद्ध भी करना पड़े तो करना चाहिए। इस तरह का दण्ड , संघर्ष , युद्ध और उपेक्षा मानवता की ही श्रेणी में आते हैं । दण्ड पाकर बड़ा बच्चा ठीक हो गया अब उसने अपनी भावनाओं की-परितृप्ति का दूसरा और उचित तरीका अपनाया। वह माँ के पास उसके शरीर से सटकर बैठ गया । माँ ने भावनाओं की सदाशयता को समझा और अपने उद्धत बच्चे के प्रति स्नेह जताया उससे उसका भी उद्वेग दूर हो गया थोड़ी देर में वह अपने पिता के कंधों पर जा बैठा। कुछ दिन पीछे तो उसने समझ भी लिया कि स्नेह, सेवा, दया, मैत्री ,करुणा, उदारता, त्याग सब प्रेम के ही रूप है ; सो अब उसने अपने छोटे भाई से भी मित्रता करली। इस तरह एक पारिवारिक विग्रह फिर से हँसी खुशी के वातावरण में बदल गया। छोटे कहे जाने वाले इन नन्हें नन्हें जीवों के यदि मनुष्य कुछ सीख पाता तो उसका आज का जलता हुआ व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन भी कैसी भी परिस्थितियों में स्वर्गीय सुख और संतोश का रसास्वादन कर रहा होता।

आज का मनुष्य भावनाओं के अभाव में ही इतना दुराग्रही, स्वार्थी और उच्छृंखल हो गया है। यदि कुत्ते और बन्दर परस्पर प्रेम और मैत्री-भावना का निर्वाह कर सकते हैं तो विचारशील मनुष्य क्यों ऐसा नहीं कर सकता। यह कोई अत्युक्ति नहीं-अलीगढ़ जिले के कस्बा जवा में एक बन्दर और कुत्ते में मैत्री लोगों के लिए एक चुनौती है विरोधी स्वभाव के जीव परस्पर साथ साथ खेलते और साथ साथ रहते हैं। बन्दर अपने मित्र के जुए साफ करता है, कुत्ता बन्दर के तलुये सहलाता है। दोनों की मैत्री एक अव्यक्त सत्य का प्रतिपादन करते हुये कहती है कि भिन्न-भिन्न शरीर है तो क्या आकांक्षाओं इच्छाओं और भावनाओं वाली आत्मिक चेतना तो एक ही है कर्मवश भिन्न शरीरों में , भिन्न देश जाति और वर्णों में जन्म लेने वाले अपने को एक दूसरे से पृथक क्यों समझे। सब लोग अपने आपको विश्वात्मा की एक इकाई मानकर ही परस्पर व्यवहार करे तो कितना सुखी हो जावे।

निसर्ग में यह आदर्श पग-पग देखने को मिलते हैं कैफनी एस. सी. में स्टीव एण्ड स्किनर के पास एक मुर्गी थी । एकबार उसके प्रसूत बच्चों को बाज ने पकड़ कर खा लिया। उसके थोड़ी देर बाद मुर्गी ने एक बिल्ली का पीछा किया लोगों ने समझा मुर्गी में प्रतिशोध का भाव जाग गया है किन्तु यह धारणा कुछ देर में ही मिथ्या हो गई जब कि मुर्गी ने बिल्ली को पकड़ लिया उसके पास आ जाने से उसके चारों बच्चे भी पास आ गये मुर्गी ने चारों बच्चे स्वयं पाले और इस तरह अपनी भावना भूख को बिल्ली के बच्चों से प्यार करके पूरा किया।

डॉ॰ साहवर्ट ने जंगल जीवन की व्याख्या करते हुए एक गिलहरी और गौरैया में प्रगाढ़ मैत्री का वर्णन किया गिलहरी यद्यपि अपने बच्चों की देख−रेख करती और सामाजिक नियमों के अनुसार अन्य गिलहरियों से मुलाकात भी करती पर वह दिन के कम से कम चार घंटे गौरैया के पास आकर अवश्य रहती दोनों घन्टों खेला करते । दोनों ने एक-दूसरे को कई बार आकस्मिक संकट से बचाया और जीवन की रक्षा की। गिलहरी आती तब आती साथ कोई पका हुआ बेर गौरैया के लिये अवश्य लाया करती। गौरैया उस बेर को गिलहरी के चले जाने के बाद खाया करती।

भावनाओं की प्यास सृष्टि कि हर जीव को है एकात्म का प्रमाण है। प्यार तो खूँख्वार जानवर भी चाहते हैं। रूसी पशु प्रशिक्षक एडर बोरिस की जीवन की वास्तविक प्यास और अभिलाषा तो आन्तरिक है प्रेम की हैं वह कुछ देर वहाँ बैठकर एक सबक देकर चला गया। पर भावनाओं का वह पाठ, प्रेम की वह शिक्षा मनुष्य कब सीखेगा ? जिस दिन मनुष्य भावनाओं का सच्चे हृदय से आदर करना सीख गया उस दिन वह भगवान् हो जायेगा और यह धरती ही स्वर्ग हो जायेगी। तब स्वर्ग अन्यत्र ढूंढ़ने की आवश्यकता न पड़ेगी।

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