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Magazine - Year 1971 - Version 2

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स्वार्थ और परमार्थ का अन्तर

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परमार्थ का नाम सुनते ही लोग बहुधा यह समझ कर घबरा उठते हैं कि परमार्थ की प्रेरणा देने वाले उन्हें अपने आवश्यक स्वार्थों से छुड़ाकर कुछ इस प्रकार परोपकार तथा परसेवा के कार्यों में लगा देना चाहते हैं कि उनका परिवार छुट जाये । वे जीवन में आर्थिक उन्नति से वंचित रहकर न तो कोई तरक्की कर पायेंगे और न किसी ऊंचे पद पर पहुँच पायेंगे। वे गरीब रहकर सारे सुखों से रहित हो जायेंगे।

कहना न होगा कि इस प्रकार का विचार करने वाले लोग वस्तुतः परमार्थ का वास्तविक अर्थ नहीं समझते। मनुष्य का सच्चा स्वार्थ परमार्थ ही माना गया है। जो काम भी ऊँचा और उज्ज्वल स्वार्थ लेकर किया जाता है उसका अन्तर्भाव एक प्रकार से परमार्थ ही होता है। स्वार्थ सिद्धि का परिणाम आत्म-सन्तोश, आत्म-सुख और आत्म-कल्याण ही तो हो सकता है। यही परिणाम परमार्थ का भी माना गया है। अन्तर केवल इतना ही है कि स्वार्थ का सुख अस्थायी एवं अन्त दुःखद होता है। किन्तु परमार्थ से प्राप्त सुख स्थायी और विक्षोभ रहित होता है। कोई भी बुद्धिमान, किन्हीं ऐसे स्वार्थों द्वारा सुख क्यों न पाना चाहेगा जिनमें परमार्थ का भी अन्तर्भाव भरा हुआ हो।

आत्मा का स्वार्थ जिन विचारो और कार्यों द्वारा सिद्ध होता है उन्हीं के माध्यम से संसार का कल्याण करने वाले परमार्थ की भी सिद्धि होती है। फिर क्यों न ऐसी गतिविधि ही अपनाई जाये जिससे स्वार्थ की भी सिद्धि हो और परमार्थ का भी साधन बने। उदाहरण के लिए स्वार्थ का सबसे स्थूल रूप उपार्जन का ले लिया जाये । उपार्जन का यहाँ पर अर्थ है धन कमाना । धन कमाने के लिए लोग खेती करते हैं, व्यवसाय करते हैं और नौकरी करते हैं।

यों तो खेती, व्यवसाय अथवा नौकरी करना मूलतः स्वार्थ है। पर यदि इसमें ऊँची भावना का समावेश कर दिया जाये तो इसी स्वार्थ के साथ परमार्थ का भी लाभ होने लगे। खेती करते हैं, सोचते हैं इससे जो उपज होगी उसमें अपना काम चलेगा, बच्चे का पालन होगा जीवन में सुख सुविधा की प्राप्ति होगी। इसके साथ यदि यह भाव और भी शामिल कर लिया जाये कि खेती करना हमारा पुनीत कर्तव्य है, इससे राष्ट्र को समाज को और प्राणियों को अन्न मिलेगा। इससे जो हमें लाभ होगा उससे हम संसार के एक अंश परिवार का पालन करेंगे , बच्चों को पढ़ा लिखाकर इस योग्य बना सकेंगे कि वे समान और संसार कुछ हित कर सकें अपनी आत्मा का उद्गार कर सके।

ऐसा भाव जागते ही खेती का वह स्वार्थ पूर्ण काम परमार्थ कार्य बन जायेगा। उसका आनन्द उस सुख से स्थायी उदात्त तथा अधिक होगा जो कि केवल संकीर्ण स्वार्थ रखने पर होता। विचारो की उदात्ता मनुष्य के कार्यों को भी ऊँचा बना देती है। खेती जैसे कार्य में भी परहित की परमार्थ भावना लगन और अधिक लगन और अधिक गौरव के साथ करेगा। इससे आनन्द भी आयेगा , सन्तोश भी मिलेगा और लाभ भी होगा। स्वार्थ में ही परमार्थ की साधना हो जायेगी।

इसी प्रकार व्यवसाय अथवा नौकरी की भी बात है। हम व्यवसाय करते है-इसलिए कि लोगों को वस्तुओं की सुविधा हो, राष्ट्र और देश की सम्पत्ति बढ़े, बहुत से आदमियों को काम मिले। व्यक्तिगत व्यवसाय को इस प्रकार सार्वजनिक सेवा कार्य मानकर चलने पर वह स्वार्थ परमार्थ बन जायेगा। व्यवसाय में ऊँची भावना के जुड़ते ही मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार अथवा चोर बाजारी और मिलावट की प्रवृत्ति पर आघात होगा और वे स्वयं ही नष्ट होने लगेंगी। ज्यों-ज्यों व्यवसायी निष्फल व्यवसाय का सुन्दर स्वरूप देखता जायेगा त्यों-त्यों वह उसे दृढ़ता पूर्वक अपनाता चला जायेगा। ज्यों-ज्यों वह इस क्षेत्र में उन्नत बनता जायेगा त्यों-त्यों उसका भय , आशंका और संशय दूर होता और आत्मिक सुख मिलता जायेगा। इस प्रकार स्वस्थ भी बनेगा और परमार्थ भी।

नौकरी में जब तक संकीर्ण स्वार्थ का भाव साथ बँधा रहता है, मनुष्य अपने को पराधीन , दूसरों की चाकरी करने वाला और दी-हीन समझता रहता है। पर ज्यों ही उसमें ऊँचे भावों को सम्मिलित करता है उसकी सारी दीनता चली जाती है । उसके सोचने का दृष्टिकोण इस प्रकार हो जाता है कि हम किसी एक व्यक्ति की चाकरी नहीं कर रहे है, हम पूरे राष्ट्र या पूरी समाज की सेवा कर रहे है। अपना काम पूरी जिम्मेदारी से करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। जिसका पालन पूरी तत्परता में करना है और मैं भी रहा हूँ। ऐसा भाव आते ही वह स्वार्थ परक कार्य भी परमार्थ परक बनकर अधिकाधिक सन्तोश , सुख और उत्साह देने लगेगा। मनुष्य अपने को पराधीन नहीं स्वावलम्बी अनुभव करने लगेगा। यही स्वाधीनता,यही अभय और यही आत्म गौरव तो परमार्थ का परिणाम है।

ऊँचे स्वार्थ में उन्नत भावों समावेश स्वयं एक परमार्थ है जो हर प्रकार से सरल एवं सुगम है जो संसार का कोई भी व्यक्ति बिना कठिनाई कि कर सकता है।

अब आइये, इसी न्याय द्वारा आगे बढ़िये। स्वार्थ की सिद्धि किस लिये की जाती है? आत्म-सन्तोश और आत्म सुख के लिए! कोई व्यक्ति यदि अपने स्वार्थ के लिए यदि किसी दूसरे के स्वार्थ का हनन करता है तो क्या यह आशा की जा सकती है कि उसे सुख, सन्तोश और शान्ति मिलेगी। दूसरों को हानि अथवा कष्ट पहुँचा कर कितने ही बड़े स्वार्थ की सिद्धि क्यों न कर ली जाये उससे शान्ति नहीं मिल सकती। सबसे पहले तो जिसको कष्ट हुआ है वह शान्ति से बैठने न देगा, दूसरे शासन, समाज और लोक निन्दा का भय बना रहेगा-जहाँ भय वहाँ शान्ति की सम्भावना असम्भव है। तीसरे मनुष्य में जो परमात्मा का निश्कलग एवं न्यायशील अंश आत्मा की विद्यमानता है वह उसे सोते जागते किसी समय भी चैन न लेने देगी हर समय टोकती रहेगी कि तुमने अमुक को कष्ट पहुँचा कर जो स्वार्थ की सिद्धि की है वह

ठीक नहीं। इसके लिए लोक अथवा परलोक में तुम्हें दण्ड का भागी बनना पड़ेगा।

ऐसी दशा में स्वार्थ की वह सिद्धि सुखदायक तो नहीं आसदायक अवश्य बन जाएगी। तब कहाँ तो स्वार्थ का मन्तव्य पूरा हुआ और परमार्थ का उद्देश्य।

स्वार्थ परमार्थ बने इसका एक सरल सा उपाय यह है कि केवल अपने उचित स्वार्थ की सीमाओं तक ही नियंत्रित रहा जाये उसकी परिधि इतनी न बढ़ाई जाये कि वह दूसरों की मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगे। यह सम्भव किस प्रकार हो? वह इस प्रकार कि अपने स्वार्थों में लोभ, लिप्सा और तृष्णा को स्थान न लेने के देना चाहिए। स्वार्थ में जब इन विकारों का दोष आ जात है। तब अच्छा स्वार्थ भी निकृष्ट वासनाओं में बदल जाता है जिससे सारे पापों सन्तापों का श्री गणेश होने लगता है मनुष्य का लोक-परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं। ऊँचे स्वार्थ परमार्थ ही है। अस्तु, एक स्वार्थ से स्वार्थ और परमार्थ के दोहरा काम निकालने के लिए स्वार्थ भावना को ऊँचा उठाइये, उसे अपनी मर्यादा तक ही सीमित रखिये और उसमें लोभ, लिप्सा अथवा तृष्णा का विकार कदापि न आने दीजिये।

अब आइये यही से एक कदम और आगे बढ़ा जाये। फिर दोहरा लीजिये कि स्वार्थ का उद्देश्य सुख और शाँति ही होता है। यदि ऐसा न हो तो फिर स्वार्थ का कौडी बराबर मोल न रह जाये। हमने उचित रूप से स्वार्थ लाभ किया । अब उस लाभ का यदि एक अंश लोक-सेवा में लगाते रहे, तो जानते हैं इसका क्या फल हो? वह यह कि हमें एक अनिवर्चनीय सुख ,शाँति और उल्लास मिले। वह ऐसे कि जब हम अपनी उपलब्धियों को आदर की दृष्टि से अपनत्व के भाव से देखेंगे और चाहेंगे कि उनकी दिन-दिन उन्नति एवं वृद्धि हो, इतना ही नहीं वे अपनी अपनी तरह उसमें सहयोग तथा सहायता भी करेंगे। इस लोकायतन से आने ला सुख कितना शीतल, कितना संतोषप्रद और कितना महान होगा? इसका अनुमान लगाया जा सकता है ? जब किसी के हित और सेवा में हमारा भी भाग होगा तो क्या समाज में प्रशंसा तथा पात्रता का अवसर नहीं मिलेगा ? जब यह सम्भव है तब कौन कह सकता है कि हमारा सुख शाँति के परिणाम वाला स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा। इसलिए लोक सेवा , लोक हित और लोक कल्याण परमार्थ कहे जाने वाले कामों हित को भी स्वार्थ ही समझना चाहिए । परमार्थ भी वस्तुतः स्वार्थ ही है, एक ऊँचा स्वार्थ। और बुद्धिमानी व्यक्ति उसकी सिद्धि करने में कमी भी नहीं चूकते। परमार्थ परक स्वार्थ ही सच्चे सुख वास्तविक सन्तोश और यथार्थ कल्याण का हेतु है, निकृष्ट अथवा निन्दित स्वार्थ नहीं।

अब यहाँ पर छोटा सा प्रश्न उठता है। वह यह कि आखिर निकृष्ट स्वार्थ भावना से निकल कर ऊँचे स्वार्थ की परिधि में जाया किस प्रकार जाये? उसका एक साधारण सा उपाय यह है कि अपने व्यक्तित्व को उज्ज्वल, उन्नत, और विस्तृत बनाया जाये। जब तक हम इस आत्म गरिमा में नहीं प्रतिष्ठित होते कि हम समाज के एक उत्तरदायी अंग है परमात्मा के पवित्र अंश और संसार के प्राणी मात्र के शिर-मौर मानव है तब तक हमें अपनी निकृष्टताओं पर न तो लज्जा आयेगी और न आत्म ग्लानि होगी। हम अपने व्यक्तित्व की महानता से अपनी निकृष्टताओं की तुलना करे और देखे कि कौन-कौन से दोष हमारी प्रतिष्ठा के अनुरूप हमें नहीं बनने देते हैं। जिन वासनाओं, जिन अभीप्साओं और जिन भावनाओं को हम अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ने देखे उन्हें तुरंत ही निकाल कर फेंक दें। हमारा व्यक्तित्व मूल रूप से उज्ज्वल एवं उत्कृष्ट ही है। दोष पाप और मल ही उसे मलीन तथा निकृष्ट बना देते हैं। जिस दिन हम अपने इन विकारों को निकाल कर फेंक देंगे उस दिन हमारा व्यक्तित्व दूध के समान उज्ज्वल तथा निर्विकार हो उठेगा । अपने मूल व्यक्तित्व का दर्शन पाते ही हमारे निकृष्ट स्वार्थ स्वयं ही हमें छोड़कर चले जायेंगे और उनके स्थान पर परमार्थ परक ऊँचे स्वार्थ स्थापित हो जायेंगे। तब न तो जीवन में अशाँति की सम्भावना होगी और न असंतोष का समावेश।

इसी प्रकार व्यक्तित्व को विस्तृत अथवा समाज में फैला लेने से हम स्वयं ही अपने स्वार्थ में प्रतिबन्धित होकर चलने लगेंगे और कोई भी ऐसा काम न करेंगे जिससे लोक निंदक अथवा लोकापवाद का भागी का भागी बनना पड़े।

अपने वर्तमान कालीन व्यक्तित्व का परिमार्जन कर मूल व्यक्तित्व का दर्शन करिये। इससे निकृष्टताओं से मुक्ति मिलेगी। स्वार्थों में उदात्ता का समावेश होगा और आज के हमारे निन्दित स्वार्थ कल से ही परमार्थ परक बनकर आत्म-सन्तोश ,आत्म-शाँति और आत्म-सुख का उद्देश्य पूरा करते हुए स्वार्थ एवं परमार्थ दोनों का दुख देंगे।

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