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Magazine - Year 1971 - Version 2

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शरीर सात लोकों की शोभा -नगरी

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स्वर्ग मुक्ति और परमात्मा यदि कहीं आकाश में है तो वह शरीर में है। ‘यत्पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’ ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी हैं वह इस शरीर में है मूल और सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी भारतीय तत्व दर्शियों ने दी थी उसका विज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की वैज्ञानिक साधनायें भी। वे कठिन भले ही हों किन्तु भारतीय आध्यात्म और आस्तिकता कह परख का उससे बढ़िया न तो उपाय है न कोई दूसरा विज्ञान ।

साधारणतः देखने में शरीर की वाह्य त्वचा और आँख,कान नाक,मुँह,हाथ पाँव आदि थोड़े अंग ही दिखाई देते हैं पर इसके भीतर ज्ञान-विज्ञान का,शक्ति और पदार्थ का भाण्डागार छिपा पड़ा है। पदार्थ स्थूल होने से उसकी जानकारी अधिक मिल गई पर शक्ति सूक्ष्म होने से विज्ञान अभी तक उसके प्रवेश द्वार पर ही है।भौतिक शक्तियों का वाह्य विश्लेषण वैज्ञानिकोँ ने बहुत अधिक का लिया हैं पर उसका आध्यात्मिक शक्तियों से संयोग न होने के कारण उन्होंने मनुष्य शरीर चेतना की समस्याओं सुलझाने में कुछ भी योग न देकर उसे उलझा और दिया।

मनुष्य शरीर का सूक्ष्म और शक्ति भाग नाडियों से प्रारंभ हाता है। शरीर विज्ञान भी मानता है कि शरीर में नाडियों के इतना लम्बा जाल बिछा हुआ है कि यदि उस सब को लम्बा खींचकर जोड़ दिया जाये तो कवशुवत रेखा पर गाँठ लगाई जा सकती है । शिव संहिता के अनुसार शरीर में 34000 हजार नाड़ियां है। त्रिसिख ब्राह्मणोपनिषद्, दर्शनोपनिशद गोरक्ष पद्धति ,भूत शुद्धि तंत्र आदि ग्रन्थोँ में 72000 हजार नाडियों के होने का वर्णन है।प्रपंच सार में इनकी संख्या 3 लाख बताईं है। यह समस्त नाड़ियां शरीर को जाल की तरह जकड़े हुये है। सड़कों , रेलवे लाइनों सारी पृथ्वी में बिजली के तारों के अम्बार बिछे पड़े है।देखने मेंवे चुपचाप खड़े दिखाई देते हैं पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि बाहर से मात्र तार दिखाई देने पर भी दोनों तारों के अन्दर-अन्दर कई दिल्ली से मुम्बई को संदेश जा रहा हाता है कहीं कानपुर और कलकत्ता को जगमगाने वाली विद्युत तरंगें। अमेरिका की वेल लैबोरेटरी ने ऐसे टेलीफोन बनाये है जिनमें आवाज के अतिरिक्त बोलने वाले का चित्र भी टेलीविजन की तरह से दिखाई देता है । अर्थात् बिजली के तारों के अन्दर प्रवाह रूप से शब्द और संदेश नहीं दृश्य और शक्तियों भी बहती रहती है। पर हमारी स्थूल आँखें उन्हें देख,सुन,समझ नहीं पाती उसी प्रकार शरीर के अन्दर बिछी इन नाडियों में चल रही संदेश प्रणाली को भी हम देख,सुन नहीं सकते क्योंकि उन्हें देखने और समझने वाली आँखें बाहर नहीं भीतर है। जब तक उन्हें जागृत न करें इन नाडियों के महत्व को समझना और उनके द्वारा अतींद्रिय शक्तियों का उद्घाटन करना संभव नहीं। अन्ततः योग-साधनायें ही आधार रह जाती है। उनके द्वारा मनुष्य शरीर की शक्तियों, विज्ञान और ईश्वरीय देन का सही उपयोग हो सकता है।

नाडियों में प्रधान अनम्बुपा ,कुद्दु ,वरुणा यश्स्विनी, विडला, इडा, षा, शगिंणी, सरस्वती, हस्ति जिह्मा, विश्वोदरा आदि प्रमुख नाड़ियां है। पर उन सब में इडा,और पिंगला और अनके सहयोग से बनी सुशुम्ना ही सर्व प्रमुख है। क्योंकि शरीर के सभी आध्यात्मिक तत्व और तथ्य इन्हीं से संबंधित है। शेष सभी शरीर की भौतिक रचना से सम्बद्ध होने से उतने मूल्य और महत्व की नहीं है।

यह नाड़ियां मस्तिष्क के उस भाग को जहाँ चोटी निकलती है। कमर के उस भाग को जोड़ती है जहाँ मेरुदण्ड जाकर समाप्त होता है।इन दोनों स्थानों का शरीर के अन्य अंग प्रयत्नों से भी सम्बन्ध है और उनको प्रभावित करने तथा शरीर का प्रवाह ग्रहण करने में भी इनका हाथ है। तथा मेरुदंड का यह भाग आध्यात्मिक शक्तियों का केंद्र और सतलाकों का बीज लोक है। शक्तियाँ सामर्थ्य सिद्धियां, देवता, स्वर्ग अपवर्ग शिव,विष्णु, ब्रह्मा सब इसी मर्म में निवास करते हैं। इस शक्ति संस्थान को जागृत किये बिना ईश्वरीय शक्तियों का साक्षात्कार नहीं होता।

सुर्य को सौर मंडल में उस तरह टिकाया गया है कि वह आने सभी ग्रह उपग्रहों को नियमित रूप से प्रकाश व ऊर्जा बाँटता रहे कोई उससे वंचित न रहे उसी प्रकार शरीर की आध्यात्मिक प्रक्रिया को नियन्त्रित रखने और उसका ब्रह्माण्ड व्यापी तालमेल स्थापित करने के लिये पात प्रमुख केन्द्र भगवान् ने स्थापित किसे है। 6 चक्र और सातवाँ ब्रह्मा लोक या शून्य चक्र सातों के नाम (1) मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपुर(4) अनाहत (5) विशुद्ध (6) आज्ञा चक्र और (7) सहस्रार। मूलाधार जो गुदा और सीवन भाग की सीध में स्थित होता है यह पृथ्वी लोक का प्रतिनिधि है और समस्त भौतिक सुख संपदाओं का मूल है जिस प्रकार निहारिकाओं में बहकर आता हुआ पदार्थ सूर्य के माध्यम से पृथ्वी तक पहुँचता है उसी प्रकार मस्तिष्कीय दिव्य सी सुशुम्ना शीर्षक से होता हुआ मूलाधार तक आता है। पृथ्वी का अपना गुरुत्वाकर्षण अपनी उर्वरता अपने तत्व अलग है उसी प्रकार मूलाधार में पार्थिव गुण के बीज रूप से विद्यमान है इसीलिए इसे पृथ्वी लोक कहते हैं।

तत्वधारे मूले समयया लास्या परया, शिवा (नवा) त्मानं मन्ये-

अर्थात्-मूलाधार में नृत्य करती हुई देवी (शक्ति) वधा रसपूर्ण कामनाओं का तर्नन करने वाले शिवजी का चिन्तन करता हूँ।

मूलाधार चक्र की सिद्धि से मनुष्यों में श्रेष्ठता आरोग्य, आनन्द चित्त, काव्य सामर्थ्य आदि का विकास होता है।

पेडू स्थित स्वाधिष्ठान के बारे में सौन्दर्य लहरी में कहा है-

तब स्वाधिश्ठाने हूतवहमधिश्ठाय निरतं तमीडे संवर्त जननि महतीं- ताँ च समयाम्।

हे जननी! तुम्हारे स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नि तत्व को प्रभाव में रखने वाली संवर्त अग्नि रहती है इसके जागरण से साँसारिक मोह, अहंकार छूट जाते हैं तथा काव्य व गद्य रचना की साहित्यिक प्रतिभा का विकास होता है।

तीसरा चक्र मणिपूर है अग्नि तत्व की प्रधानता वाले इस चक्र को स्वः लोक या सूर्य लोक का प्रतिनिधि मानते हैं यह नाभि स्थिति है नाभि ही खींची हुई श्वांस से प्राणाग्नि लेकर शरीर में अग्नि और ऊष्मा बढ़ाती है। इसको सिद्धि से संहार व पालन की तथा कुछ भी कहे सत्य हो जाने की क्षमता और प्रभुता का विकास होता है।

चौथा चक्र अनदृत हृदय में स्थित है और यह लोक का प्रतिनिधि है इसको शुद्ध या जागृत कर लेने पर इंद्रियों पर विलय ईश्त्व तथा योग सिद्धियां मिलती है। वायु तत्व की प्रधानता होने के कारण उनकी बुद्धि अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है किसी के भी मन की बात जानना सम्भव हो जाता है।

पाँचवे विशुद्वाख्य का स्थान कण्ठ , धुयें के समान तत्व वाले इस चक्र में जनः लोक प्रतिष्ठित है इसको जागृत कर लेने वाले त्रिकालदर्शी स्वस्थ रोगमुक्त सर्व समर्थ तथा ज्ञानी हो जाते हैं।

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