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Magazine - Year 1978 - Version 2

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वृक्ष वनस्पति के प्रति श्रद्धा अक्षुण्ण रहे

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पेड़ पौधे के प्रति पूज्यभाव रखने की अपनी परम्परा सदियों पुरानी है। दुनिया में कोई भी देश ऐसा नहीं जिसमें एक त्यौहार केवल इसी लिए मनाया जाता हो कि उस दिन हर व्यक्ति वृक्षारोपण अवश्य करे। यह पर्व भी ब्राह्मण पर्व कहलाता है—अर्थात् वृक्षारोपण को ब्रह्मकर्म के समतुल्य माना गया है महाभारत ने तो एक वृक्ष लगाने को सौ पुत्रों से बढ़कर पुण्य माना है।

इस उदात्त दृष्टिकोण में विराट् आत्मा की अनुभूति भी संयुक्त हो सकती है और आत्मीयता के विस्तार का प्रायोगिक प्रशिक्षण भी किसी भी दृष्टि से लें यह एक उपयोगी और आवश्यक ही नहीं अनिवार्य परम्परा रही है। जिसकी वैज्ञानिक उपयोगिता इन दिनों समझ में आ रही है जबकि वृक्ष−वनस्पति हमारे सम्मुख त्रिदेवों की तरह अत्यन्त पूज्य रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। ब्रह्मा के रूप में वे सृष्टि में सौन्दर्य की रचना करते। विष्णु के रूप में उनका पालन गुण सर्वविदित है। आज तो उनकी सर्वाधिक प्रतिष्ठा शिव रूप में है। इस रूप में मानवता का विष निरन्तर पीते रहने का देवकार्य वे न कर रहे होते तो बीसवीं शताब्दी धरती में जीवन के सर्वनाश की शताब्दी होती। आज का विज्ञान भी स्वीकारता है कि मानवी अस्तित्व फ्लोरा (पृथ्वी के वनस्पति जगत) पर आधारित है। सूर्य से मिलने वाले अनुदान हम पचा नहीं पाते, यह वृक्ष ही हैं जो कच्चे अन्न को भोजन के रूप में पकाकर देने वाली माँ की तरह और ऊर्जा को पहले स्वयं आत्मसात करते और पीछे हमारे लिए उपयोगी और प्राणदायी बनाकर वातावरण में बिखेर देते हैं। इनके गुणों को देख कर ही किसी विद्वान ने आज के बुद्धिवाद पर व्यंग करते हुए लिखा है कि आज लोग मेट्रोलाजिकल प्लान्ट, थर्मोप्लान्ट, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लान्ट प्रभृति प्लान्टों पर तो ध्यान देते हैं, पर प्लान्ट (पौधों) पर नहीं जिनके बिना मनुष्य का जीवन संकट में पड़ सकता है।

थोड़े से भी थोड़ा पढ़ा लिखा व्यक्ति जानता है कि प्रश्वास क्रिया धुँये तथा पदार्थों के सड़ने आदि से उत्पन्न कार्बन डाई ऑक्साइड जो एक विषैली गैस है, उसे पेड़-पौधे ही सूर्य के साथ होने वाली फोटो संश्लेषण क्रिया में ग्रहण कर लेते हैं और बदले में ऑक्सीजन गैस छोड़ते हैं। जीवधारियों की प्रश्वास को अपनी श्वास और अपनी प्रश्वास को जीवन के लिए श्वास बनाकर वृक्ष वनस्पति सृष्टि में जो “इकॉलाजिकल संतुलन” स्थापित करते हैं। उसी के कारण सृष्टि टिकी हुई है।

किन्तु लगता है मनुष्य उस संतुलन को बिगाड़ डालने और अपने ही हाथ अपनी “खुदकुशी” करने को तुल पड़ा है। जनसंख्या वृद्धि के साथ−साथ अधिक कृषिभूमि, अधिक आवास, सड़कों, नहरों, फैक्ट्रियों, बड़े−बड़े कारखानों के लिए अधिक जमीन चाहिए और यह सब जंगल साफ करके, वृक्षों का विनाश करके ही सम्भव है। वही हो रहा है जिससे ऑक्सीजन और कार्बनडाई ऑक्साइड का संतुलन बिगड़ रहा है। ऑक्सीजन की जमा पूँजी कम और खर्च बढ़ने से पिछले 50 वर्षों में कार्बनडाइ ऑक्साइड की मात्रा 0.030 से बढ़कर 0.044 प्रतिशत बढ़ गई है। इस असंतुलन को पाटने के लिये अधिक से अधिक वृक्ष लगाने की आवश्यकता है। अब इसे मात्र धार्मिक दृष्टि से ही नहीं अपितु जीवन रक्षा की दृष्टि से भी पूरा किया जाना चाहिए।

कार्बनडाई ऑक्साइड के अतिरिक्त कल कारखानों से सल्फर डाई ऑक्साइड, कैडमियम, लेड, नाइट्रोजन ऑक्साइड का विष भी बुरी तरह बढ़ता जा रहा है। टोक्यो (जापान), न्यूयार्क (अमेरिका) तथा लन्दन (इंग्लैंड) के कुछ क्षेत्र तो ऐसे हैं जहाँ साँस लेने तक में भी कष्ट होता है। यह विष मनुष्य देह के लिए प्रतिदिन 40 सिगरेटें पीने के बराबर नुकसानदायक होता है। शीशे (लेड) का जहर किडनी डैमेज (गुदा नष्ट करना) ब्लड प्रेशर तथा मस्तिष्कीय क्रियाओं को क्षतिग्रस्त करता है। सल्फर डाई ऑक्साइड अस्थमा तथा श्वास सम्बन्धी कष्ट उठ खड़े होते हैं। हमारे देवता यह वृक्ष उस विष को पियें नहीं तो हर व्यक्ति रोग शैया पकड़ लें।

एक वृक्ष एक ऋतु में वायुमण्डल से 130 लीटर पेट्रोल के शीशे का अंश सोखकर उसे लेड फास्फेट में बदल देता है। यह पानी में घुलता नहीं उसे वह अपने आप में जीवन भर आत्मसात किये रहता है। मर जाने के बाद ईंधन के रूप में उसे ही मनुष्य के लिए उपयोगी बना कर छोड़ जाता है। यही नहीं बड़े कारखाने जो ताप पैदा करते हैं। स्वयं प्रकृति की गर्मी की असह्य मात्रा को भी संतुलित रखने में यह वृक्ष ही सहायक होते हैं।

एटॉमिक रेडिएशन (अणु विकिरण) जैसे हानिकारक प्रभाव से भी वृक्ष हमारी जीवन रक्षा करते हैं। मांट्रियल स्थित मैकगिल यूनिवर्सिटी की गैस्ट्रो इन्टेस्टाइनल रिसर्च लैबोरेटरी ने अपनी शोधों के आधार पर बताया है कि साधारण घास तक रेडियेशन से रक्षा करती है। अतः पृथ्वी में हरीतिमा अभिवृद्धि, वृक्षारोपण, पुष्पवाटिका अभियान को नैतिक कर्त्तव्य के रूप में पूरा करना चाहिए। शहरों में तो लोन और पार्क इतने अधिक आवश्यक हैं कि उन्हें मनुष्य जीवन का हृदय ही कहा सकता है। वह मस्तिष्क को दृष्टि मात्र से निद्रा प्राप्त करने वाली शीतलता देते हैं यदि शहरों में पार्क न हों पागलपन की मात्रा इतनी अधिक बढ़ सकती है कि सम्भालना ही कठिन हो जाये।

जेट हवाई जहाजों, भारी मात्रा में रेलों, बसों भारी मात्रा में वाहनों तथा फैक्ट्रियों आदि के शोर गुल से कानों को सीधा आघात पहुँचता है। वृक्ष न हों तो यह शोरगुल लोगों को बहरा बना दे सकता है। किसी भी रूप वृक्षों के प्रति श्रद्धा व्यक्त किये बिना काम चलेगा नहीं।

जंगल अनावश्यक न कटें यह कार्य सरकार देखे पर मनुष्य को तो स्थान−स्थान पर वृक्षारोपण करना चाहिए। घरों के आस−पास गमलों, लकड़ी की पेटियों में फल−फूलों, सब्जियाँ लगा कर अपने लिए दोहरे लाभ की व्यवस्था कर सकते हैं। फूलों के पौधे तो कहीं भी निरर्थक स्थान मिले वहीं रोपें, यह न कहें कि यह स्थान उनका तो है ही नहीं, मानवता की सुरक्षा का दायित्व सब पर है, उसे उदारतापूर्वक पूरा किया जाना चाहिए।

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