पराज्ञान का कुछ अर्थ भी निकालें
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जीवन असामान्य सत्ता का ही सृजन नहीं वह स्वयं भी उसी तत्व से बना होने के कारण उन सभी पराशक्तियों से परिपूर्ण बन कर आया है। जिनकी महत्तत्व में कल्पना की जाती है। पूर्वाभास, मन की बात जान लेना। अपनी भावनाओं के संदेश औरों तक पहुँचाना, प्राणों पर नियन्त्रण आदि अनेक प्रकार के असामान्य चमत्कार देखकर उपरोक्त धारणा की ही पुष्टि होती है। आत्म जिज्ञासायें तब और भी प्रगाढ़ हो उठती हैं जब देखने में आता है कि सृष्टि के अन्य जीवों में भी यह क्षमतायें विद्यमान हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि विराट् जगत छोटे−बड़े जिस रूप में अभिव्यक्त हैं—सब मूल चेतना का ही अंश है। अन्य जीवों को तो ऐसी सुविधायें और बुद्धि नहीं मिली, पर मनुष्य को वह सभी सुविधायें सुलभ हैं, जिनसे वह अपने अतीन्द्रिय स्वरूप का बोध कर सके। आत्म−तत्व की खोज में मनुष्य जीवन की सार्थकता है। केवल कुछ उदाहरण जैसी क्षमतायें समस्या का हल नहीं कर सकतीं। ऐसी क्षमताओं से तो पशु−पक्षी भी विभूषित रहते हैं। भारतीयों में उत्तर की ओर सिरहाना लेकर सोना वर्जित है इसे काफी समय तक अन्धविश्वास निरूपित किया गया किन्तु जर्मनी के वैज्ञानिक डॉ. बेकर ने यह सिद्ध कर दिया कि वस्तुतः हमारा मस्तिष्क उत्तरी ध्रुव की चुम्बक शक्ति से प्रभावित होता है तो बात बुद्धि संगति मान ली गई। कई बार ऐसा होता है कि लोग किसी ऐसे स्थान में पहुँच जाते हैं। जहाँ दिशाज्ञान में दिक्कत आती है तो वे दिकसूचक यन्त्र से यह जानने का प्रयास करते हैं कि उत्तर दिशा किधर है। मनुष्य जैसे बुद्धिमान व्यक्ति को इतना आश्रित रहना पड़े यह अचरज ही है जब कि डॉ. बेकर ने एक अन्य प्रयोग में यह सिद्ध कर दिया कि दीमक जैसे जीवों को भी चुम्बकीयता का पता रहता है उन्हें कृत्रिम चुम्बक क्षेत्र के सहारे सीधे लिटाने का प्रयास किया गया किन्तु वे तब न सो सकीं जब तक कि वे सही स्थिति में न आ गईं।
रेडियो सक्रियता की माप के लिए फ्रेंच वैज्ञानिकों ने “गाहगर−वाउन्टर” यन्त्र बनाया जिसकी कीमत लाखों डालर पड़ती थी। इस बीच कुछ जीव शास्त्रियों ने जब यह संकेत दिया कि चींटियों में यह सूक्ष्म संवेदना तो जन्मजात होती है तब से इस यन्त्र का निर्माण बन्द कर दिया गया और अब इस कार्य के लिए वहाँ विधिवत चींटियों की ही सेवा ली जाती है।
बाँस में कभी फूल नहीं देखे जाते इनकी जड़ें ही वंशवृद्धि करती रहती हैं। किन्तु 50 वर्ष बाद प्रायः बाँस से फूल आते और उनमें से फल भी निकलते हैं। 50 वर्ष की अवधि में यदि एक चूहे की वंशवृद्धि प्रारम्भ हो तो उस समय तक 50 पड़ पोते पहुँच जायेंगे जिन्हें यह पता भी नहीं होगा कि बाँस में भी फल होते हैं, किन्तु चूहे अपनी सुगन्ध विश्लेषण थी सूक्ष्म बुद्धि से इस फल की उपयोगिता ताड़ कर उसे खूब खाते हैं यह फल उनकी प्रजनन क्षमता को कई गुना अधिक बढ़ा देता है। यह ज्ञान उसे किस तरह मिलता है। इस गुत्थी की जीवशास्त्री सुलझा नहीं पाये।
कई बार ऐसा होता है कि जंगल में शेर बैठा होता है तथा हिरन उसके समीप ही घास चर रहा होता है। फिर भी वह न तो भयभीत होता है, न आतंकित। क्योंकि उसे ज्ञात रहता है कि शेर भूखा होने पर ही शिकार करता है और इस समय उसे ऐसी कोई परेशानी नहीं है। हिरन मन की बात कैसे जान लेता है। जीव वैज्ञानिक इस आश्चर्यजनक तथ्य की शोध में लगे हुए हैं, पर अभी तक कुछ जानकारी मिली नहीं।
शेरनी जब किसी ऐसे युद्ध के लिये चलती है, जिसमें शत्रु समान शक्ति का हो तो वह अपने बच्चों को किसी सुरक्षित स्थान पर बैठा जाती है। युद्ध बच्चों की आँखों से ओझल चलता है। बच्चे इसी स्थान पर बैठे रहते हैं। किन्तु इस बात की अनुभूति उन्हें न जाने कैसे हो जाती है कि अब युद्ध समाप्त हो गया और माँ की विजय हुई। वे शेरनी के पास विजय के बाद बिना बुलाये चले जाते हैं।
आधुनिक परामनोविज्ञान पूर्वाभास दूर संवार, तथा स्वप्नों में होने वाले भविष्य दर्शन को पाँच ज्ञानेन्द्रियों से भिन्न व अतीत−छठवीं संवेदना (सिक्स्थ सेन्स) की संज्ञा दी है। इस छठवीं संवेदना को आज बड़ी जिज्ञासापूर्ण दृष्टि से देखा और खोजा जा रहा है।
न केवल मनुष्य अपितु जीवों में इस तरह की सूक्ष्म क्षमतायें पाई गईं तो आश्चर्य होना स्वाभाविक ही था। आज भी समुद्रों में चलने वाले जहाजों से यदि चूहे निकल कर स्वेच्छा से भाग निकलें तो नाविक आने वाले संकट का अनुमान कर लेते हैं। जबकि अनेक बार अत्यधिक आधुनिक किस्म के यन्त्र भी सही जानकारी देने में असमर्थ रहते हैं।
वर्मा की कलादान घाटी में एक बिल्ली की एक विचित्र समाधि बनी है। इसके चारों ओर लिखा है—”रैडी” की यह बिल्ली हमारी समय पर सहायता न करती तो हम मारे जाते और पराजित होते”—इन शब्दों में वास्तव में जीवों में अद्भुत अतीन्द्रिय क्षमता का इतिहास अंकित है। बात उन दिनों की है जब वर्मा में अँग्रेजों और जापानियों के बीच युद्ध चल रहा था। एक दिन अँग्रेजों की टुकड़ी ने एक जापानी टुकड़ी पर आक्रमण कर दिया। जापानियों ने पीछे हटने का नाटक खेला वास्तव में वे पीछे हटे वरन् खंदकों में छिप गये पर बाहर वे इस तरह सामान बिखेर गये मानों वे सचमुच भाग गये हों। एक मेज पर वे ताजा पका पकाया खाना भी छोड़ गये उसे देखते ही अँग्रेज सैनिक उस खाने पर टूट पड़े किन्तु अभी वे प्लेटों तक नहीं पहुँच पाये थे उनमें से एक सर्जेंट रैंडी की काली बिल्ली उस खाने पर जा टूटी और बुरी तरह गुर्राकर अँग्रेज सैनिकों को पीछे हटा दिया अँग्रेजों ने बिल्ली को धमकाया भी वह अपनी क्रुद्ध मुद्रा में तब तक गुर्राती ही रहीं जब तक वहाँ एक भयंकर धमाका नहीं हो गया। वास्तव में उस खाने के साथ बारूदी सुरंग का सम्पर्क जुड़ा था उन सैनिकों के प्राण ले सकता था पर बिल्ली ने अपनी आत्माहुति देकर न केवल अपनी स्वामिभक्ति का परिचय दिया अपितु उसमें यह भी बता दिया कि जीव जिन्हें हम तुच्छ समझते हैं किस तरह विलक्षण आत्मिक गुणों, अतीन्द्रिय क्षमताओं से ओत−प्रोत होते हैं।
इसी तरह की एक घटना जर्मनी के साथ अँग्रेजों के युद्ध में कैम्बरवेल में घटी थी। मिस्टर ज्योफरी नामक एक अँग्रेज ने एक बिल्ली पाल रखी थी। एक दिन जर्मनी बमवर्षक जहाज कैम्बरवेल से गुजरे। सारा परिवार घबराकर मकान के एक कोने में दुबक गया। तभी उनकी बिल्ली बगीचे के तहखाने से दर्दनाक ध्वनि में म्याऊँ−म्याऊँ चिल्लाने लगी। पहले तो ज्योफरी उसे बुलाते रहे पर जब वह न आई तथा उसी तरह चिल्लाती रही तो उन्होंने समझा कि बिल्ली मर गई है सारा परिवार उसके पास पहुँचा अभी वे तहखाने में घुसे ही थे कि दोबारा जहाजों ने आक्रमण कर बम बरसाये और वह मकान बुरी तरह विस्फोट के साथ मलबे में बदल गया। बिल्ली के इस अतीन्द्रिय ज्ञान के कारण ही ज्योफरी व उनका परिवार बच सका।
इस अतीन्द्रिय ज्ञान से आत्मचेतना की दुर्लभ अवस्था सिद्ध होती है। उसे प्राप्त करने में ही मानवीय पुरुषार्थ की सार्थकता है। हमें सामान्यतः पशुप्रवृत्तियों तक ही केन्द्रित न रह कर सृष्टि के सूक्ष्म अस्तित्व के अध्ययन अनुभूति की भी अभिरुचि बढ़ानी चाहिए तभी मनुष्य जीवन जैसी परमात्मा की अमूल्य कृति की उपयोगिता और उपादेयता सिद्ध होगी।

