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Magazine - Year 1978 - Version 2

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विवेक रहित बुद्धि से काम न चलेगा !

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विलक्षण बौद्धिक क्षमतायें आदि काल से ही वैज्ञानिकों और जीवशास्त्रियों के लिये एक प्रकार की चुनौती रही हैं। बुद्धि, ज्ञान, चिन्तन की क्षमता−यही वह तत्व हैं जो मृत और जीवित का अन्तर स्पष्ट करते हैं। अतएव जीवन को बौद्धिक क्षमता में केन्द्रित कर वैज्ञानिक प्रयोगों की प्रणाली अपनाई गई। इस दिशा में मस्तिष्क की जटिल संरचना एक बहुत बड़ी बाधा है इस कारण रहस्य अभी तक रहस्य ही बने हुये हैं, तथापि अब तक जितना जाना जा सका है, उससे वैज्ञानिक यह अनुभव करने लगे हैं कि बुद्धि एक सापेक्ष तत्व है अर्थात् सृष्टि के किसी कोने से समष्टि मस्तिष्क काम कर रहा हो तो आश्चर्य नहीं, जीवन जगत उसी से जितना अंश पा लेता है उतना ही बुद्धिमान होने का गौरव अनुभव करता है।

वैज्ञानिक अब इस बात को अत्यधिक गम्भीरता से विचारने लगे हैं कि मानव−मस्तिष्क और उसकी मूलभूत चेतना का समग्र इतिहास अपने इन कम विकसित समझे जाने वाले भाइयों के मस्तिष्क की प्रक्रियाओं से ही जाना जा सकता है। इसके लिये अब तरह−तरह के प्रयोग प्रारम्भ किये गये हैं।

मनुष्य की तरह ही देखा गया कि कई बार एक कुत्ता अत्यधिक बुद्धिमान पाया गया। जबकि उसी जाति के अन्य कुत्ते निरे बुद्धू निकले। चूजे अपने बाप मुर्गे की अपेक्षा अधिक बुद्धि चातुर्य का परिचय देते हैं। डाल्फिन मछलियों की बुद्धिमत्ता की तो कहानियाँ भी गढ़ी गई हैं। बुद्धि परीक्षा के लिये कोई बहुत सम्वेदनशील यन्त्र तो अभी तक नहीं गढ़े जा सके किन्तु स्वादिष्ट भोजन की पहचान, जटिल परिस्थितियों के हल आदि के लिये जो विभिन्न प्रयोग किये गये उनसे पहली दृष्टि में यह स्पष्ट हो गया कि बन्दर, डाल्फिन, लोमड़ी (काली की अपेक्षा लाल) अधिक चतुर होते हैं, नीलकण्ठ, संघकाक और कौवों की बुद्धि स्वार्थ प्रेरित जैसी होती है—विवेक जनक नहीं। रूस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. लियोनिद क्रुशिन्स्का ने अपने विचित्र प्रयोगों से यह सिद्ध किया है कि जिस तरह चिन्तन से मानवीय शक्ति का ह्रास होता है पशु−पक्षियों में भी यह प्रक्रिया यथावत होती है। इनमें कुछ तो डर जाते हैं कुछ बीमार पड़ जाते हैं सम्भवतः इन्हीं कारणों से वे जीवन की गहराइयों में नहीं जाकर प्राकृतिक प्रेरणा से सामान्य जीवन यापन और आमोद−प्रमोद के क्रिया−कलापों तक ही सीमित रह जाते हैं। इस दृष्टि से देखा जाये तो मानवीय चिन्तन प्रक्रिया भी उतनी उन्नत नहीं है, वह भी तो अपनी बुद्धि का उपयोग मात्र ऐसी ही उपलब्धियों में करता है जिससे उसकी भौतिक प्रसन्नता तथा सुख−सुविधा बढ़ती है। अन्तरात्मा की अन्तरंग गहराइयों तक पहुँचने की तो उसे कल्पना भी बहुत कठिनाई से होती है। सो वह भी कुछ ही बुद्धिजीवियों में होती है जबकि यही सबसे बड़ा प्रश्न है, जिसे सुलझाने में मानवीय क्षमताओं की प्रतिष्ठा हो सकती है।

प्रो. क्रुशिन्स्की के अनुसार तर्क, विवेक और प्राकृतिक हलचलों के अनुरूप अपने को समायोजित करने की बुद्धि अन्य प्राणियों में भी यथावत होती है इसी कारण वे पर्यावरण की समस्याओं को झेलते हुये भी अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं जबकि मनुष्य उनमें बुरी तरह जकड़ता जा रहा है उसके अपने ही कारनामे चाहे वह विशाल औद्योगिक प्रगति हो या अणु−आयुधों का निर्माण, उसके अपने ही विनाश के साधन बनते जा रहे हैं।

पेट ही मनुष्य का साध्य हो, तब तो उससे अच्छा कर्कट है, जो रहता तो समुद्र में है किन्तु वह नारियल वृक्ष पर चढ़कर फल तोड़ लाता है।

जीवों की बुद्धिमत्ता अपने विकसित रूप में तब अभिव्यक्त होती है जब उनके सामने कोई संकट आ जाता और आत्म रक्षा की आवश्यकता आ पड़ती है। हिरन, खरगोश, चीते और कंगारू बहुत तेज दौड़ते हैं किन्तु जब इन्हें अपने सामने कोई संकट आता दिखाई देता है तब! वे जानते हैं कि उस स्थिति में सामान्य गति से बचाव नहीं किया जा सकता अतएव वे अपनी गति को अत्यधिक तीव्र कर देते हैं। चीता उस स्थिति में 100 किलोमीटर प्रति घन्टे की रफ्तार से दौड़ जाता है, कंगारू उस स्थिति में हवा में जोरदार कुलांचे लगाता है जिससे उसकी मध्यम गति अपनी प्रखरता तक पहुँच जाती है। यदि भागने में भी जान न बचे तो वह खड़े होकर अपना शक्ति प्रदर्शन करते हैं। बिल्ली अपने बाल फुलाकर तथा गुर्राकर यह प्रदर्शित करती है कि उसकी शक्ति कम नहीं, कुछ जानवर दाँत दिखाकर शत्रु को डराते हैं तो कुछ धुड़ककर, कुछ पंजों से मिट्टी खोदकर इस बात के लिए भी तैयार हो जाते हैं कि आओ जब नहीं मानते तो दो−दो हाथ कर ही लिये जायें। स्पाही तो मुँह विपरीत दिशा में करके अपने नुकीले तेज काँटे इस तरह फर्राकर फैला देती है कि शत्रु को लौटते ही बनता है। अमेरिका में पाई जाने वाली स्कंक नामक गिलहरी अपने शरीर से एक विलक्षण दुर्गन्ध निकाल कर शत्रु को भगा देती है। आस्ट्रेलिया के कंगारू रैट तो सचमुच ही आँखों में धूल झोंकना, जो कि बुद्धिमत्ता का मुहावरा है, जानता है कई बार रैटल साँप का उससे मुकाबला हो जाता है तो यह अपनी पिछली टाँगों से इतनी तेजी से धूल झाड़ता है कि कई बार तो सर्प अन्धा तक हो जाता है उसे अपनी जान बचाकर भागते ही बनता है।

कछुआ, कर्कट तथा अमेरिका में पाये जाने वाले पैगोलिन व आर्मडिलो शत्रु आक्रमण के समय अपने सुरक्षा कवच में दुबक कर अपनी रक्षा करते हैं तो बारहसिंगा युद्ध में दो−दो हाथ की नीति अपना कर अपने पैने सींगों से प्रत्याक्रमण कर शत्रु को पराजित कर देता है।

कहते हैं कि भालू मृत व्यक्ति पर आक्रमण नहीं करते। इसकी पहचान के लिये वे नथुनों के पास मुँह ले जाकर यह देखते हैं कि साँस चल रही है या नहीं। चतुर लोग अपनी साँस रोक कर उसे चकमा दे जाते हैं यह बात कहाँ तक सच है कहा नहीं जा सकता, किन्तु ओपोसम सचमुच ही विलक्षण बुद्धि और धैर्य का प्राणी है वह संकट के समय अपनी आँखें पलट कर जीभ लटका कर मृत होने का ऐसा कुशल अभिनय करता है जैसा सिनेमा के नायक। इस तरह अपनी सूझबूझ से वह अपने को मृत्यु मुख में जाने से बचा लेता है।

मोर आक्रमण की स्थिति से नृत्य मुद्रा में निबटता है अपने पंखों को छत्र की तरह बनाकर वह आक्रमणकारी रोष प्रकट कर शत्रु को धमका देता है। कुछ छोटे−छोटे पक्षी तो और भी चतुराई दिखाते हैं आक्रामक को देखकर ये लँगड़ा कर चलने का नाटक करते हैं। इससे इस बात का भ्रम होता है कि पहले ही इसे किसी ने घायल कर दिया है। इस स्थिति में आगंतुक सीधे आक्रमण करने की अपेक्षा पीछा करने की नीति अपनाता है। काफी दूर तक तो वह इसी तरह पीछे−पीछे भगाता है इसी बीच वह एकदम फुर्र से उड़ जाता है और शिकारी टापता ही रह जाता है।

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ (विश्व वन्य जीवन) त्रैमासिक पत्रिका के एक संस्करण में मलेशिया में पाई जाने वाली मछली एक्रोबेट का वर्णन छपा है। जिसमें बताया गया है कि यह मछली भोजन की तलाश में अपने बड़े−बड़े पंखों के सहारे वृक्षों पर भी चढ़ जाती है। यही नहीं वह अपने थुथने में पानी भर कर इस तरह की क्रिया करती है वह थुथना बन्दूक का-सा काम करता है और पानी गोली का अपनी इसी प्राकृतिक गन से वह अपने भोजन के उपयुक्त जीवों का स्वयं शिकार कर लेती है। उसमें यह भी समझ होती है कि किस जीव को मारने के लिये कितनी बड़ी गोली प्रयुक्त की जाये। दागते समय वह उतने ही जल का प्रयोग करती है।

शेरनी 108 दिन में प्रसव करती है इसके बाद वह 2 वर्ष तक जब तक कि बच्चे बड़े और समर्थ नहीं हो जाते वह उन्हीं के पोषण प्रशिक्षण में व्यस्त रहती है। सहवास की इच्छा होने पर भी वह उसे टालती है और बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाने के बाद ही वह पुनः गर्भधारण करती है। इस तरह के उदाहरण से भावनाओं की गम्भीरता का पता चलता है इसके विपरीत आचरण मानवीय स्वभाव का हलकापन है। भावनाओं का अर्थ केवल मात्र झुकना नहीं अपितु अपनी समीक्षा बुद्धि को जागृत रखते हुये जो पवित्र रसमय और मर्यादाजन्य है उसे पूरा करने में अपनी सम्पूर्ण निष्ठा का परिचय देना ही भाव निष्ठा है।

डेथ हेड होव−कीड़ा विलक्षण ध्वनियाँ निकाल लेने में बड़ा चतुर होता है। उसे यदि कहीं मधुमक्खी का छत्ता दिख जाये तो वह रानी मक्खी की-सी आवाज निकालता है। अन्य मक्खियाँ भुलावे में आ जाती हैं और यह महोदय चुपचाप छत्ते में घुसकर शहद चोरी कर लाते हैं।

हाथी की खोपड़ी ही बड़ी नहीं होती अपितु उनमें उसी अनुपात की बुद्धिमत्ता भी है। वे सूक्ष्म संकेतों को भी थोड़े प्रशिक्षण के बाद ही समझने लगते हैं यही कारण है कि उसे भूतकाल में युद्ध भूमि में प्रयुक्त किया गया था। आज भी सवारी के काम में, सागौन के जंगलों में स्लीपर ढोने तथा सरकसों में विविध करतब दिखाने में प्रयुक्त होते हैं। जगपति चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक जीव जन्तुओं की बुद्धि में लिखा है कि एक हाथी ने एक बच्चे की जेब में सूँड़ डाली पता चला कि उसकी जेब में चीनी है हाथी उसे ही लेना चाहता था। हाथी को मिष्ठान्न अधिक प्रिय है सम्भवतः इसी से उसकी तुलना मोदक प्रिय गणेश जी से की जाती है। हाथी अपने गिरोह की प्रधान किसी वयोवृद्ध हथिनी को बनाते हैं इससे उनके मातृत्व के प्रति सम्मान का परिचय मिलता है।

सामान्य बुद्धि से देखें तो चींटियों का ही क्या मनुष्य जीवन भी खा−पीकर वासना तृष्णा अहंता में बिताया जाने वाला बेकार−सा जीवन है पर उपयोगिता और उपादेयता तब स्पष्ट होती है जब जीवन−प्रक्रिया के सूक्ष्म तत्वों का भी बारीकी से अध्ययन, चिन्तन और मनन किया जाये। चींटियां यों ढेर में बिलबिलाती दिखती हैं पर उनका हर कार्य व्यवस्थित−नियन्त्रित और अपनी प्रभु सत्ता सम्पन्न रानी के इंगित पर चलता है। कोई भी चींटी न तो कभी निष्क्रिय होगी न व्यर्थ के कार्य करेगी। जो कार्य जिसे सुपुर्द है वह वही करेगी। नर का काम है परिश्रम पूर्वक खाद्यान्न व्यवस्था, सैनिक पहरेदारी करते, मजदूर बोझा ढोते, शव बाहर निकालते हैं और शिल्ली भवन निर्माण में जुटे रहते हैं। यही व्यवस्था मधुमक्खियों में भी समान रूप से पाई जाती है। मनुष्य की तरह पेट और प्रजनन में व्यस्त रहने पर भी उनमें अव्यवस्था और उच्छृंखलता के लिये कोई स्थान नहीं।

इंजीनियरिंग दक्षता विज्ञान युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। भारी−भारी बाँधों के निर्माण से लेकर नहर निकाल कर जन−सुविधायें बढ़ाने के अनेक बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य हो रहे हैं किन्तु इस तरह का बुद्धि कौशल अन्य जीवों में भी कम नहीं। ऊदबिलाव को तो जीव−शास्त्रियों ने कुशल इंजीनियर की पदवी तक दे डाली है। यह सुरंगी नहरें बनाने तथा मिट्टी के पुल निर्माण करने में बड़ा पटु होता है। हैम्पटन नगर में इस ऊदबिलाव के कारनामों से तो लोग बहुत ही तंग रहते हैं। नगर के बाहर एक झील है। ऊदबिलावों ने वहाँ से नगर के भीड़ वाले इलाकों तक में भीतर−भीतर सुरंगें बना रखी हैं। बहुत प्रयत्न करने के बाद भी आज तक न तो ऊदबिलाव ही पकड़े जा सके और न ही वह नहरें बन्द की जा सकीं जो इन्होंने जमीन के अन्दर−अन्दर बना रखी हैं।

मनुष्य और मानवेत्तर जीवों की बौद्धिक क्षमताओं का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद शास्त्रकार की इस मान्यता की ही पुष्टि होती है :—

आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतद् पशुभिः नराणाम। धर्मेण एको मधिको विशेषो, धर्मेण हीनाः पशुभिः समानः॥

अर्थात्—खाने−पीने, निद्रा, विश्राम, भय और उससे सुरक्षा तथा कामवासना का जीवन इन चारों दृष्टियों से मनुष्य और पशुओं में कोई अन्तर नहीं है। यदि मनुष्य भी इन्हीं चार में अपनी बुद्धि फँसाये रहता है तो यह उस महान कृति का अपमान है। वह इन सब से परे धर्मतत्व के अवगाहन के लिये बना है यदि वह अपनी इस विशेषता को चरितार्थ नहीं करता तो उसे भी एक प्रकार का पशु ही कहा जायेगा।

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