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Magazine - Year 1978 - Version 2

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आस्थाएँ विकृत होने से रोग, शोक बढ़ते हैं!

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रोग कष्ट तो शरीर को देते हैं, पर वे उपजते मन में हैं। असंयम शारीरिक नहीं मानसिक रोग है। शरीर तो हर हालत में मन का वफादार नौकर ही बना रहेगा। सत्कर्म और दुष्कर्मों का दोष तो शरीर को ही दिया जाता है और दण्ड भी उसी को भुगतना पड़ता है, पर वस्तुतः बात कुछ और भी है। मन के कुसंस्कारी और अचिन्त्य चिन्तन का अभ्यासी हो जाने के कारण उसकी दिशा धारा उस ओर बहने लगती है जो नैतिकता एवं प्रकृति व्यवस्था के प्रतिकूल होती है। शरीर तो औजार, उपकरण मात्र है। उसे वाहन की संज्ञा ठीक ही दी गई है। मन भली दिशा में चले या बुरी में शरीर को अपने स्वामी का उसका पालन करना पड़ेगा, वह वफादार नौकर की तरह है। साथ ही उसमें सोचने, तर्क करने या अवज्ञा करने जैसी सामर्थ्य भी नहीं है, ऐसी दशा में स्वामी का आज्ञानुवर्ती होकर ही उसे रहना पड़ता है। भली-बुरी क्रियाएँ तो शरीर ही करता है, पर उसको प्रेरणा—आज्ञा देने की जिम्मेदारी पूर्णतया मन की है। मन का असंयम ही आहार-बिहार में अव्यवस्था उत्पन्न करता है। प्रकृति के प्रतिरोध की चेष्टा में असफल रहने का परिणाम ही रोग है। रोग अपने आप नहीं आते। वे आमन्त्रित किये हुए अतिथि भर होते हैं। असंयमी मन ही दौड़−दौड़ कर उनके पास जाता है और आग्रहपूर्वक उन्हें बुलाकर घर लाता है। आते हैं तो अपनी प्रकृति के अनुरूप उपहार अनुदान देते ही हैं। भले ही वह प्रसाद हमें बुरा लगे या भला। यही है रोगों की उत्पत्ति एवं सक्रियता का तत्व ज्ञान।

औषधियों से लेकर प्राकृतिक चिकित्सा तक के सभी उपचार प्रायः रुग्ण अंग को राहत देने वाले उपाय बरतते हैं। उनसे सामयिक रूप से कष्ट निवृत्ति में सहायता भी मिलती है, पर ये एक जादू भर हुआ। अधिक से अधिक तात्कालिक समाधान कह सकते हैं। इसमें रोग निवृत्ति का ऐसा कोई मार्ग नहीं है जिसमें बार−बार नये−नये रूप बनाकर उठते रहने वाले इन भूतों का स्थायी निराकरण हो सके जो आये दिन वेष बदल−बदल कर सामने आते और आँख मिचौनी खेलते रहते हैं। एक रोग अच्छा नहीं हो पाता कि उसकी जाति बिरादरी का कोई दूसरा उपद्रव फिर आ धमकता है। एक की विदाई पूरी तरह नहीं हो पाती कि नयों के आगमन का नगाड़ा बजने लगता है।

रोग उपचार के चिकित्सा प्रावधान में दो उपाय बरते जाते हैं—एक यह कि विषाणुओं को मारने के लिए तेज निरोधक औषधियाँ दी जायँ जिससे आक्रमणकारियों की संख्या तथा शक्ति क्षीण हो। दूसरा यह कि कष्ट की अनुभूति कराने वाले तन्त्र को शिथिल कर दिया जाय। इन उपायों से तात्कालिक समाधान तो होता है, राहत भी मिलती है, पर ऐसा कुछ नहीं होता जिससे रोगी को उस घातक व्यथा से पूरी तरह छुट्टी मिल सके।

जो हो—औषधि उपचार को कितना ही आवश्यक क्यों न समझा जाय, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि वे सर्वथा हानि रहित नहीं हैं। विषाणुओं की तरह—विजातीय द्रव्य की तरह वे भी अपने दाँत, पंजे चलाती हैं और जीवनी शक्ति के लिए वे भी हानिकारक ही सिद्ध होती हैं। मूल बात यह है कि क्या उस उपचार से रोगों से आत्यंतिक निवृत्ति मिलती है, या मिल सकती है। उत्तर ‘न’ में ही मिलता है। रोग उत्पादन के मूल कारण बने रहने पर वे उपजते ही रहेंगे। इस उत्पादन को रोके बिना सामयिक रोकथाम से कोई बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।

रक्त विकृत होने पर फोड़े−फुन्सी, दाद, खाज, दर्द, सूजन, गाँठ आदि कुछ न कुछ उपद्रव खड़े होते ही रहेंगे। एक रोग का इलाज करने पर दूसरा उठ खड़ा होगा। निवृत्ति तो तभी मिलेगी जब शोधन की बात बने। मच्छर तब मरेंगे जब गन्दगी दूर हो। गन्दगी के रहते उन्हें मारते रहने से कोई लाभ नहीं। नई उत्पत्ति उस प्रयास को व्यर्थ बना देगी जो मच्छरों के मारने के लिए किया गया था। पत्ते सूखते हों तो उन पर छिड़काव करने का कोई लाभ नहीं, सिंचाई जड़ की की जानी चाहिए। रोगों के ऊपरी स्वरूप को मिटाने के लिए की जाने वाली भागदौड़ का इतना ही लाभ है कि विग्रह को किसी प्रकार चुप कर दिया जाय। भीतर का द्वेष और क्रोध आज नहीं तो कल फिर उभरेगा और नये रूप में विग्रह उत्पन्न करेगा। समस्या के समाधान के लिए गहराई में उतरना होगा।

यह हजार बार समझा जाना चाहिए कि शरीर को बीमारियाँ बुलाने से लेकर दुष्कर्म करने तक में दोषी नहीं माना जा सकता। वह जड़ तत्वों का बना होने से अपनी समझ से कुछ नहीं कर सकता। तलवार में काटने की शक्ति तो होती है, पर वह अपनी इच्छा से किसी को नहीं काटती। प्रयोगकर्त्ता के इशारे पर ही उसे चलना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार शरीर भी स्वेच्छापूर्वक न भले आचरण करता है न बुरे। वह किसी के निर्देश का पालन करता है और वह निर्देशकर्त्ता निश्चित रूप से मन है। उसी बाजीगर की उँगलियाँ बेचारी कठपुतली को भला−बुरा नाच नाचने के लिए विवश करती हैं। दर्शकों की आँखों से बाजीगर छिपा रहता है इसलिए वे भ्रम वश कठपुतली के नाच में रस ले सकते हैं, पर किसी विवेकशील को उस उछलकूद के लिए बाजीगर की उँगलियों को ही कारण मानना और श्रेय देना पड़ेगा। शरीर की स्वस्थता और रुग्णता का मूलकारण मानसिक स्थिति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मन के संकेतों पर शरीर असंयम बरतता है। असंयम का प्रकृति दण्ड रोगों के रूप में सामने आता है। शरीर की भली−बुरी परिस्थितियों के लिए कुछ अपवादों को छोड़कर मन को ही उत्तरदायी ठहराया जायगा।

सामयिक राहत को ही यदि रोगोपचार माना जाय जाय तो प्रचलित चिकित्सा पद्धति पर सन्तोष किया जा सकता है। यदि अस्वस्थता का आत्यन्तिक समाधान अभीष्ट हो तो कुछ आगे चलना होगा और उस उद्गम केन्द्र की मूल स्थिति में सुधार करना होगा जिससे कि बाढ़ का पानी निकलता है। मेंड़ बाँधने से काम न चलेगा। उफनता नाला एक जगह से रोकने पर दूसरे स्थान से फूट निकलेगा। असंयम की मनःस्थिति शरीर से प्रकृति की अवज्ञा करती रहेगी और उसका दण्ड बेचारा शरीर रोगों के रूप में भुगतता रहेगा। थोड़ा गहरा विचार करें तो रोगों की व्यथा भी शरीर के माध्यम से मन को ही सहनी पड़ती है। संवेदनाओं का केन्द्र रहने के कारण अन्ततः मन ही शरीर की पीड़ा और दुर्गति के लिए कष्ट सहन करता है। मस्तिष्क सुन्न कर देने पर शरीर में घाव रहने पर भी उस बेचारे को कोई कष्ट नहीं होता, इसलिए देखा जाय तो मन ही कुकर्म करता और वही दण्ड भुगतता है।

रोगों से पूर्ण छुटकारा पाने के लिए मन को स्वास्थ्य का कारण भूत आधार मान कर चलना होगा और चिकित्सा के लिए उसी पर छाई रुग्णता को दूर करने का उपाय करना होगा। जब तक इस तथ्य को स्वीकार न किया जायगा तब तक आरोग्य लाभ की आकांक्षा मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।

रोगों के दो वर्ग हैं- एक आधि, दूसरा व्याधि। ‘व्याधि शारीरिक रोगों को’ ओर ‘आधि’ मानसिक रोगों को कहते हैं। ज्वर, खाँसी, दमा, दर्द, अपच, मधुमेह, रक्तचाप आदि को शारीरिक रोग गिना जाता है और उन्माद, सनक, मूर्खता, विस्मृति, विसंगतियाँ, उलझनों आदि की मानसिक रोगों में गणना होती है। मस्तिष्कीय रोगों की चिकित्सा पागल खाने के डॉक्टर करते हैं और मनः चिकित्सक पूछताछ करके अन्तरंग में जमी कुंठाओं को उगलवाने और सत्परामर्श देने के उपायों का सहारा लेते हैं। शरीर विज्ञानी औषधि उपचार, शल्य कर्म आदि के द्वारा करते हैं। इनमें आंशिक सफलता भी मिलती है, पर प्रयत्न फिर भी अधूरा ही रह जाता है वैसा लाभ नहीं मिलता जैसा अभीष्ट है। इस अधूरेपन को दूर करने के लिए मन की उस गहराई तक जाना होगा जहाँ से कि शरीर और मन को प्रभावित करने वाले प्रवाहों को उभारने और काम करने की प्रेरणा मिलती है। कुँए में जो पानी भरा दीखता है वह उसकी तली में जल फेंकने वाले स्रोतों से आता है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय अस्त−व्यस्तताएँ चेतना की मूल प्रवृत्ति के मर्मस्थल में से उभरती हैं। इस परत को आस्था केन्द्र कहते हैं। मनुष्य के गहन अन्तराल में कुछ आस्थाएँ जैसी होती हैं। व्यक्तित्व का मूल स्रोत उन्हीं में सन्निहित रहता है। इच्छाएँ स्वतन्त्र नहीं है वे इसी आस्था केन्द्र से उद्भूत होती हैं। इच्छाओं से विचारणाएँ और विचारणाओं से क्रियाएँ होने की बात तो सभी जानते हैं, पर यह बहुत कम को विदित है कि इच्छाएँ भी मौलिक नहीं हैं वे चेतना के उस गहरे परत में से उदित होती हैं जिन्हें मान्यताएँ एवं आस्थाएँ कहा जाता है।

आस्थाओं के दो वर्ग हैं—एक नैतिक, दूसरी अनैतिक। एक दैवी, दूसरा आसुरी। एक उत्कृष्ट, दूसरा निकृष्ट। एक मानवी, दूसरा पाशविक। एक सात्विक, दूसरा तामसिक। दोनों की अपनी−अपनी विशेषताएँ हैं और अपनी−अपनी प्रतिक्रियाएँ। नैतिक आस्थाएँ उन मान्यताओं को अपनाती हैं जिन्हें उत्कृष्ट एवं आदर्शवादी कहते हैं। पवित्रता, संयम, उदारता, सज्जनता, नीति, निष्ठा, सामूहिकता जैसे सद्गुण इसी वर्ग के हैं। इन्हें देवत्व कहा जाता है और जिनमें इनकी मात्रा जिस अनुपात से बढ़ती है उन्हें उतने ही अंश में सन्त, ऋषि या देवता कहा जाता है। बोल−चाल के शब्दों में उन्हीं का सज्जन, आदर्शवादी, लोक सेवी आदि नामों से पुकारते हैं। दूसरे वर्ग में उनकी गणना है जिन्हें अनैतिक, असज्जन कह सकते हैं। इनके अन्तराल में स्वार्थान्धता की पशु−प्रवृत्ति और दुष्टता की पैशाचिकता छाई रहती है। छल, अभिमान, उत्पीड़न, अपहरण, ईर्ष्या, द्वेष, जैसे दुर्गुणों की असुरता स्वभाव का अंग बन जाती हैं और मस्तिष्क तथा शरीर का रुझान उसी दिशा में गतिशील रहता है। वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए उनकी लिप्सा निरन्तर ललकती रहती है। लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। जिनमें राग होता है उनके लिए पक्षपात की अति करने और जिनसे द्वेष होता है उन्हें मिटा डालने के प्रति सर्प जैसी विनाश लीला रचने से कम में चैन ही नहीं पड़ता। न्याय, औचित्य, विवेक की छाया भी दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे लोग असुर एवं नर−पिशाच कहलाते हैं। देव और दैत्यों के बीच का एक मध्यवर्गीय समन्वित पक्ष भी है जिन्हें मनुष्य कहते हैं। यह मानवी सत्ता ही है जिसमें कहीं दैवी और कहीं आसुरी तत्वों की बहुलता दीख पड़ती है। देव और असुर कोई व्यक्ति विशेष नहीं होते। इन्हें आस्थाओं का स्तर एवं प्रवाह ही कह सकते हैं। दोनों में से जिसमें, जिसका, जितना बाहुल्य होता है वह उतने ही अंशों में देव या असुर कहा जाता है। इन वर्गों की आकृति देख कर नहीं प्रकृति पर दृष्टिपात करके ही पहचाना जा सकता है।

पौराणिक प्रतिपादन है कि देवता स्वर्ग में ऊर्ध्वलोक में रहते हैं और दानव भूमि से नीचे पाताल में—पतितावस्था में रहते हैं। देवताओं का स्वर्गलोक आकाश में ऊंचाई पर है। इन्हें उत्कृष्टता और निकृष्टता का लोक कह सकते हैं। लोकों का वर्णन किया गया तो इस प्रकार है मानो वे कोई देश क्षेत्र हों। पर वस्तुतः वे मनोभूमियाँ भर हैं और उन्हें दृष्टिकोण भी कहा जा सकता है। स्वर्ग में सुख सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं और नरक में यातनाएँ ही यातनाएँ हैं। ये यातनाएँ मरने के बाद ही मिलती हों ऐसी बात नहीं है। उनका अनुभव इसी जीवन में इसी शरीर में भी किया जाता है। शारीरिक व्याधियाँ और मानसिक आधियों को इसी रूप में लिया जा सकता है।

यों कोई भी रोगी सहज दया का पात्र होता है। कष्ट पीड़ित के प्रति मानवी करुणा का उभरना स्वाभाविक है। उचित भी है और आवश्यक भी। दुःखी के प्रति सहानुभूति और सेवा सहायता की वृत्ति रहना मानवी गरिमा के अनुरूप है। इसलिए रोगी को अपराधी समझकर उसके प्रति घृणा उपेक्षा बरतने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। उसके कष्ट निवारण में तो करुणा भरा उदार सहकार ही अपेक्षित है यहाँ तो चर्चा उन तथ्यों के विश्लेषण की हो रही है, जिनके कारण मानव जीवन का सौभाग्य दुर्भाग्य में बदलता है और सुख शान्ति के स्थान पर शोक सन्ताप सहन करना पड़ता है।

अन्तःकरण की आस्थाएँ ही हैं जो मनुष्य को ऊपर उठने एवं नीचा गिरने की प्रेरणा देती हैं। उसी की प्रतिक्रिया व्यक्तित्व को समुन्नत एवं पतित बना कर रख देती है। इसी आन्तरिक उत्थान−पतन के आधार पर मनुष्य स्वर्गीय एवं नारकीय दृष्टिकोण विनिर्मित करता है और तदनुसार अनेक प्रकार के शारीरिक, मानसिक कष्टों को सहन करना पड़ता है। इतना ही नहीं जीवन के अन्य क्षेत्र भी ऐसी विषम परिस्थितियों से भर जाते हैं जिनमें रहने वाला अपने को पग−पग पर असफल, उपेक्षित तिरस्कृत, दरिद्र एवं दुर्भाग्यग्रस्त अनुभव करता है। ऐसे लोग नीरस, खिन्न, विपन्न, उद्विग्न एवं भार भूत जीवनयापन करते हुए किसी तरह साँसों का बोझ वहन करते हैं।

जहाँ तक शारीरिक और मानसिक रोगों का सम्बन्ध है उनकी गहरी जड़ें अन्तःकरण की उस गहरे परत में घुसी होती हैं जिन्हें आस्था कहा जाता है। यदि आस्थाएँ अनैतिक स्तर की बन गई होंगी तो मनुष्य न प्रकृति के नियमों की परवाह करेगा और न नीति, धर्म, कर्तव्य एवं आदर्श की। ऐसी दशा में गतिविधियाँ अवांछनीय होती चली जायेंगी, उनमें निकृष्टता एवं उच्छृंखलता का बाहुल्य रहेगा। विश्व विधान में किसी को भी उच्छृंखलता बरतने की छूट नहीं है। मनुष्य को भी नहीं। आस्थाएँ गँवाने वाला असंयमी बनता है और उस उद्धत आचरण का प्रतिफल ही शारीरिक मानसिक रोगों के रूप में सामने आता है। अन्यान्य क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, आन्तरिक अनेकानेक हानियाँ एवं कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं सो अलग। आस्थाओं के उद्गम केन्द्र को व्यवस्थित परिष्कृत करने से कम में न शारीरिक रोगों से छुटकारा मिल सकता है न मानसिक उद्विग्न असंतुलन से। आस्थाएँ ही हैं जो परिष्कृत होने पर हमें शारीरिक आरोग्य, मानसिक उल्लास और आन्तरिक संतोष से भरापूरा सुख शान्तिमय जीवन प्रदान करती है।

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