प्रकृति की अबूझ पहेली जीवन के विचित्र नियम
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प्रकृति के अधिकाँश रहस्यों को समझने और सुलझा लेने का दावा करने वाला मनुष्य अभी कितना नासमझ और अल्प सामर्थ्य वाला है, यह आये दिन घटने वाली कई घटनाओं से सिद्ध होता रहता है। इन में से अधिकाँश घटनाएँ भ्रम, फ्राड या धोखा कहकर मनुष्य फिर भी अपने दम्भ को बचाने की कोशिश करता है। लेकिन कई मामले तो इतने प्रत्यक्ष होते हैं कि उन्हें किसी भी तरह भ्रम या फ्राड कह कर उनसे छुट्टी नहीं पाई जा सकती। प्रकृति प्रायः मनुष्य के सामने ऐसी पहेलियाँ प्रस्तुत करती रहती है, जो मनुष्य को अपनी वस्तु स्थिति का आभास कराती हैं और इस भ्रम को तोड़ती हैं कि मनुष्य सर्वज्ञानी और सब कुछ जान समझ लेने वाला बन गया है।
उदाहरण के लिए एक ही समय में जन्म लेने वाली जुड़वा सन्तानों को लें। सामान्यतः जुड़वा बच्चों से यह अर्थ लगाया जाता है कि एक ही गर्भ से, एक ही समय या कुछ क्षणों के अन्तर से पैदा होने वाले बच्चे। इस तरह के जुड़वा दो प्रकार के होते हैं। एक तो वे जो कुछ मिनटों या क्षणों के अन्तर से पैदा होते हैं। इन्हें सही दर्राय कहा जाता है। सामान्यतः इनके जन्म कुछ मिनटों के अन्तर से होते हैं। कभी-कभी इनके जन्म एक घन्टे या उससे अधिक का अन्तर से होते हैं। ये भिन्न लिंग के भी हो सकते हैं। सहोदर जुड़वा एक ही समय पर स्खलित दो शुक्राणुओं से विकसित होते हैं और अलग-अलग उर्वरित होते हैं। इस प्रकार के जुड़वा अपने गर्भाधान काल में माता के शरीर से विभिन्न प्रकार के जीवन तत्व ग्रहण करते हैं। इसलिए इनके गुण स्वभाव भिन्न भी हो सकते हैं उनकी रुचियाँ और विशेषताएँ अलग अलग भी हो सकती हैं।
दूसरे प्रकार के जुड़वा बच्चे एक साथ जन्म लेते हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि ये एक ही शुक्राणु से उर्वरित होते हैं और विकास की प्रारम्भिक अवस्था में ही दो पिंडों के रूप में विभाजित हो जाते हैं। जन्म लेने के बाद यह आधे सामान्य शिशु के रूप में पलते हैं। लेकिन ये गर्भाशय में एक ही प्रकार का आहार, जीवन तत्व प्राप्त करते हैं, इसलिए ये एक ही आकार-प्रकार और शक्त सूरत के होते हैं। इनकी आकृति तथा प्रकृति में सामान्यतः बहुत कम अन्तर देखा जाता है। जुड़वा सन्तानों के उपलब्ध रिकार्डों के अनुसार जन्म लेने वाले 80 बच्चों में से औसतन एक बच्चा जुड़वा होता है। इसलिए जुड़वा होना कोई असामान्य बात नहीं है। कई बार एक ही स्त्री के गर्भ से एक ही समय में तीन बच्चे भी पैदा होते हैं इस तरह के बच्चों के जन्म की सम्भावना प्रति छह हजार में से एक होती है। एक ही गर्भ में से एक ही समय में चार या पाँच बच्चे होना बहुत कम देखा जाता है।
यमज जुड़वा बच्चों के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे प्रायः बहुत कम जीवित रहते हैं। ऐसे बच्चे जिनके अंग आपस में जुड़े हुए हों वह तो जीवित नहीं ही बचते किन्तु थाईलैंड के मीकलाँग-गाँव में 11 मई सन् 1811 को दो ऐसे यमज बच्चों ने जन्म लिया जो अलग अलग अस्तित्व रखते हुए भी सीने के दायें-बायें हिस्से से जुड़े हुए थे। यह तो अपने आप में कोई खास अनोखी बात नहीं है। आश्चर्य की बात तो यह है कि वे दोनों 63 वर्ष की आयु तक जीवित रहे, उन्होंने विवाह किया, घर बसाया और इसी तरह जुड़े रह कर सामान्य जीवन व्यतीत किया।
प्रकृति द्वारा दी गई इन विचित्रताओं को साथ लिये जन्म लेते ही उनके माँ बाप सहित परिवार के अन्य लोग भी भयमिश्रित आश्चर्य में पड़ गये। मीकलाँग गाँव थाईलैंड (तब सियामी) की राजधानी बैंकाक से करीब 60 मील दूर उत्तर पश्चिम में है। सियामी माता और चीनी पिता से जन्म जन्म लेने वाले इन अद्भुत बालकों की खबर जंगल की आग के समान फैल गई और उन्हें दूर-दूर से लोग देखने के लिए आने लगे। यह बच्चे किस तरह अपनी जिन्दगी काटेंगे, कैसे रहेंगे आदि कई प्रश्न देखने वालों के हृदय में उठते थे, परन्तु माता पिता के लिए तो संतान सो संतान। प्रकृति की इस विचित्रता के कारण उत्पन्न हुई विवशता को देखकर माता पिता से उन पर अपना विशेष ममत्व उँडेला। यह घटना अब से लगभग पौने दो सौ वर्ष पुरानी है और उस मय तक शल्य चिकित्सा का इतना विकास नहीं हुआ था कि दोनों को अलग किया जा सके। उस समय थाईलैंड में ज्यादा डाक्टर भी नहीं थे, जो थे उनमें से भी अधिकाँश चीनी नस्ल के थे जो पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के स्थान पर पुरानी और पिछड़ी हुई चिकित्सा पद्धति ही प्रयोग में लाते थे।
उन बच्चों को जिनका नाम चाँग और इंग रखा गया था, देखने के लिए आने वालों में कई डाक्टर भी थे। उन डाक्टरों में से कइयों ने चाँग और इंग के माता पिता से एक दंपत्ति ने बच्चों को अलग करने के लिए आग्रह किया और वह कार्य स्वयं करने का प्रस्ताव भी निश्चित ही यह चिकित्सा का अपने आप में एक नया अनुभव था। पर चाँग और इंग की माँ नीफ ने ऐसे सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। क्योंकि प्रस्ताव करने वाले डाक्टरों ने शल्य क्रिया का जो स्वरूप प्रस्तावित किया था वह बेहद पीड़ाजनक था। उन में से किसी डाक्टर ने गर्म लोहे के तार से चाँग और इंग को अलग करने का सुझाव दिया था तो किसी ने रस्सी के दोनों और थैली की तरह लटका देने का उपाय सुझाया था। उन बच्चों की माँ इस तरह के उपायों को इस्तेमाल करने के लिए किसी भी तरह सहमत नहीं हुई।
चाँग और इंग बड़े होने लगे। समय बीतता गया। समय बीतने और बड़े होने के साथ साथ उनकी परेशानियाँ भी बढ़ने लगीं। पहली कठिनाई तो यही आई कि वे चलें कैसे क्योंकि दोनों के शरीर सीने पास धड़ से इस तरह जुड़े हुए थे जैसे वे गलबहियाँ डाले हुए हों। माँ ने दोनों बच्चों को गिरते पड़ते चलना सिखा ही दिया। साथ ही वह दोनों को इस तरह शिक्षित भी करती रही कि तुम दोनों की जिन्दगी परस्पर सहयोग और सद्भाव पर ही अवलंबित है। सहयोग और सद्भाव पर तो यह सारी दुनिया टिकी हुई है क्योंकि सभी मनुष्य और प्राणी जगत् एक दूसरे से किसी न किसी प्रकार आपस में सम्बद्ध हैं। लेकिन प्रकृति ने चाँग और इंग के साथ तो यह विवशता ही जोड़ दी थी इसलिए उनके लिए तो सहयोग सद्भाव से रहना और भी जरूरी, अनिवार्य था। सो उन्होंने अपनी माँ की सीख को गाँठ में बाँध लिया और उसी के सहारे 63 वर्ष की जिन्दगी पार कर ली।
आरम्भ में उन्हें चलना सीखने में बड़ी कठिनाई हुई थी पर धीरे धीरे उन्होंने न केवल अपनी इस कठिनाई पर काबू पा लिया बल्कि साथ साथ नदी में तैरना और नाव चलाना भी सीख लिया। सन् 1828 में एक अंग्रेज व्यापारी राबर्ट हंटर की निगाह इन दो अद्भुत जुड़वा किशोरों पर पड़ी जिस समय हंटर ने चाँग और इंग को देखा उस समय वे दोनों नदी में तैर रहे थे। पहले तो हंटर ने समझा कि यह जल का कोई विचित्र जीव है लेकिन जब दोनों भाई पानी से निकल कर एक नाव में सवार हो गये तो बड़े गौर से देखने पर वह समझ सका कि ये दोनों जुड़वा भाई हैं। आज तक उसने इस तरह के जुड़वा भाई न तो कहीं देखे थे और न ही ऐसे व्यक्तियों के बारे में सुना था।
हंटर के व्यापारी दिमाग में तुरंत एक योजना आई और वह चाँग तथा इंग के माता पिता से मिल कर प्रकृति के इस अजूबे का व्यावसायिक लाभ उठाने लगा। वह नोक दंपत्ति को कुछ दे दिला कर चाँग और इंग को अपने साथ अमेरिका ले गया। अमेरिका पहुँचते ही हंटर ने बोस्टन के हरवार्ड मेडिकल कॉलेज के प्रो॰ जान वारेन तथा अन्य डाक्टरों से दोनों भाइयों का मेडिकल परीक्षण कराया। डाक्टरों ने प्रमाणित कर दिया कि ये दोनों किशोर नैसर्गिक रूप से जुड़वा हैं। इस के बाद हंटर ने अमेरिका और ब्रिटेन में चाँग और इंग के कई एक प्रदर्शन किये तथा लाखों रुपये कमाये।
बाद में समझ आने पर चाँग और इंग ने हंटर से सम्बन्ध तोड़ कर स्वतन्त्र रूप से प्रदर्शन करना आरम्भ किया। जल्दी ही वे मालामाल हो गये। 1833 से सन् 1839 तक दोनों ने अमेरिका में सैकड़ों प्रदर्शन किये। इस बीच दोनों भाइयों की मुलाकात जार्जिया के एक समृद्ध किसान की लड़कियों एडलीड और लैसी से हुई। यह मुलाकात जल्दी ही प्रेम परिणय में बदल गई। विवाह के लिए कठिनाई यह थी कि दोनों भाई जुड़वा थे इसलिए दोनों ने आपरेशन करवा कर अलग अलग हो जाने की बात सोची। डाक्टरों ने यह आपरेशन बहुत पेचीदा और जान जोखिम का बताया। परन्तु चाँग और इंग के मन में विवाह की कामना इतनी प्रबल हो गई थी कि उन्होंने जोखिम उठाना स्वीकार कर लिया। एडलीड और लैसी, जो स्वयं भी चाँग तथा इंग से प्रेम करने लगी थीं उनसे आपरेशन के लिए मना किया और इसी स्थिति में विवाह करने के लिए तैयार हो गई।
उनके विवाह का समाचार अनेकों प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया। बड़े भव्य और शानदार समारोह में चाँग और इंग तथा एडलीस और लैसी का विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इस दंपत्ति युगल ने 21 बच्चों को जन्म दिया जिनमें से 18 जीवित रहे। विवाहित जीवन को सामान्य ढंग से व्यतीत करने के लिए दोनों भाइयों ने मर्यादाएँ और नियम बाँध लिये थे तथा आजीवन अपने बनाये नियमों का पालन करते रहे उन दोनों के जीवन में सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि चाँग और इंग आपस में बहुत ही कम बोलते थे फिर भी बिना बोले हीवे एक दूसरे के मन की बात समझ जाते थे। उन दोनों की मृत्यु सन् 1874 में सेटी-एयरी (उत्तरी कोरोलीना) में एक साथ हुई। 63 वर्ष तक प्रकृति की विलक्षण विशेषता को साथ लिये सामान्य ढंग से जीवन जीने वाले इन दोनों भाइयों का सचित्र विवरण एनी वालेस ने ‘द टू’ पुस्तक में लिखा है।
इसी प्रकार का एक उदाहरण भारत में भी इसी शताब्दी के आरम्भ में सामने आया। शायद लोगों को इस बात का पता ही नहीं चलता यदि मैसूर के आईफेरे गाँव में जन्मी गंगम्मा और गौरम्मा को यदि उनके माता पिता मैसूर रियासत के राजा के पास न लाते। 1915 में इन दोनों बहनों का जन्म एक साथ हुआ। उन के सभी अवयव अलग थे पर पीठ के नीचे वाला हिस्सा आपस में जुड़ा हुआ था। लोगों ने इन लड़कियों के जन्म को किसी राक्षसी का अवतार बताया जिसके चार हाथ, चार पैर, चार आँखें, चार कान, दो नाक, दो मुँह, दो सिर और दो धड़ थे। भयभीत होकर माता पिता उन्हें राजा के पास ले गये। महाराजा को भी ये लड़कियाँ बड़ी विचित्र लगीं। उन्होंने अपने विद्वान दरबारियों से परामर्श किया कि ये लड़कियाँ जुड़वा कैसे पैदा हुईं? उन के जन्म से परिवार पर क्या असर पड़ेगा आदि आदि प्रश्नों पर विचार करने के साथ यह भी सोचा कि हिन्दू परिवारों में एक तो वैसे ही लड़कियाँ भार रूप होती हैं उस पर जुड़वा लड़कियाँ और भी ज्यादा विपत्ति तथा परेशानी की जड़। इसलिए मैसूर नरेश ने उन लड़कियों को अपने पास रख लिया।
बड़ी होने पर माता पिता ने उन्हें वापस माँगा तो राजा ने गौरम्मा और गंगम्मा को उन्हें सौंप दिया। चाँग और इंग की तरह इन लड़कियों का भी प्रदर्शन किया गया। सन् 1925 से आरम्भ हुआ उनका प्रदर्शन गंगम्मा और गौरम्मा की जीवन पर्यन्त चला। उन्हें लाखों लोग देखते और प्रकृति के इस चमत्कार को देखकर दाँतों तले अँगुली दबा लेते। सन् 1937 में इन दोनों बहनों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में भी ले जाया गया, जो पेरिस में आयोजित की गई थी। ये दोनों बहिनें सन् 1952 तक जीवित रहीं। यद्यपि उनका जीवन क्रम चाँग और इंग की भाँति नहीं रहा फिर भी प्रकृति की विलक्षणताओं के इतिहास में उनका अपना स्थान तो है ही।
वैज्ञानिक आज तक इस गुत्थी को नहीं सुलझा सके हैं कि यमज बच्चे आम तौर पर बहुत कम जीते हैं और उन में भी एक दूसरे के साथ जुड़े हुए बच्चों के जीवित रहने की संभावना तो बिलकुल नहीं है। फिर सिद्धाँत और शरीर विज्ञान के सामान्य नियम के विपरीत चाँग तथा इंग और गंगम्मा तथा गोरिम्मा क्रमशः 63 तथा 37 वर्षों तक कैसे जीवित रहीं। इसे प्रकृति की एक अनबूझ पहेली ही कहना पड़ेगा और ऐसी अनेकानेक पहेलियाँ हैं, जिन्हें बूझ पाना सर्वज्ञ होने का दावा करने वाले मनुष्य के लिए अभी संभव नहीं है।

